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आर्थिक मंदी का सामना

अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए विस्तारवादी निर्णयों की जरूरत है

 

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चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी की दर घटकर 5 फीसदी पर पहुंच गई। हाल के सालों में यह सबसे कम है। खपत और निवेश दोनों में कमी की वजह से यह स्थिति आई है। पहली तिमाही में निजी खपत की दर 3.1 फीसदी रही। जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह दर 7.3 फीसदी थी। 2016-17 की आखिरी तिमाही में भी यह दर घटकर 4.1 फीसदी पर आ गई थी। यह विमुद्रीकरण के तुरंत बाद हुआ था। पूंजी निर्माण दर के मामले में भी यही स्थिति है। पिछले साल की पहली तिमाही के 13.3 फीसदी के मुकाबले चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह दर 4 फीसदी रही।

कृषि, खनन और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों का भी यही हाल है। इसमें भी सबसे बुरी हालत विनिर्माण क्षेत्र की है। इस क्षेत्र का जीवीए 0.6 फीसदी रहा। जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह दर 12.1 फीसदी थी। औद्योगिक उत्पादन की भी स्थिति खराब है। कपड़े में 0.1 फीसदी की विकास दर है तो चमड़े के उत्पादों में 0.2 फीसदी है। वहीं कागज और कागज के उत्पादों में यह दर नकारात्मक -14.2 फीसदी हो गई है। यही हाल कोक और रिफाइंड पेट्रोलियम के मामले में भी है। रबर और प्लास्टिक उद्योग की भी ऐसी ही स्थिति है। इलेक्ट्रिक उपकरणों की स्थिति भी खराब है। इन सब क्षेत्रों में बुरी स्थिति का नकारात्मक असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऐसी आशंका है कि यह स्थिति मध्यमकालिक तौर पर रहने वाली है।

विकास दर में कमी तो कुछ समय से दिख रही थी। खास तौर पर नवंबर, 2016 में विमुद्रीकरण के निर्णय के वक्त से ही। गलत ढंग से लागू किए गए जीएसटी ने भी स्थितियों को खराब करने का काम किया। अगर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो अर्थव्यवस्था की मंदी कुछ समय तक बनी रह सकती है। खास तौर पर सउदी अरब के सबसे बड़े तेल उत्पादक अरामको पर हुए ड्रोन हमलों के बाद उत्पादन पर पड़े नकारात्मक प्रभावों के संदर्भ में।

2017-18 के लिए जो श्रम सर्वेक्षण आया है, उससे भी आर्थिक मंदी के संकेत मिल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 5.8 फीसदी पुरुषों और 3.8 फीसदी महिलाओं के पास रोजगार नहीं है। वहीं शहरी क्षेत्रों में 7.1 फीसदी पुरुषों और 10.1 फीसदी महिलाओं के पास कोई रोजगार नहीं है। 1972-73 के बाद हुए नमूना सर्वेक्षणों में यह अब तक के सबसे खराब आंकड़े हैं।

बेरोजगारी का बढ़ते संकट के बीच विनिर्माण क्षेत्र की स्थिति खराब हुई है। इसका कई जगह असर पड़ रहा है। वाहन क्षेत्र में बिक्री घटी है। इस वजह से बड़ी कंपनियां जैसे मारूति सुजुकी, अशोक लिलेंड और टाटा मोटर्स ने गैर कामकाजी दिनों की संख्या बढ़ा दिया है। ऐसे दिनों की मजदूरी नहीं मिलती। इन कंपनियों ने छोटी कंपनियां को ठेके भी घटा दिए हैं। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि अनौपचारिक क्षेत्र की क्या स्थिति है।

अग्रिम कर संग्रहण में भी गिरावट आई है। इस साल मध्य सितंबर तक इसमें 6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह दर 18 फीसदी थी। 2016-17 में इसी अवधि के लिए यह दर 14 फीसदी थी। ये कर आय पर लिए जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि औपचारिक क्षेत्र का भी हाल बुरा है। इस वजह से यह संदेह पैदा हो रहा है कि दूसरी तिमाही में भी स्थिति अच्छी नहीं रहने वाली है।

भारतीय रिजर्व बैंक लगातार रेपो दरों में कमी ला रहा है। अगस्त में इसमें 0.35 फीसदी की कटौती की गई। यह उम्मीद थी कि बैंक इसका लाभ ग्राहकों तक पहुंचाएंगे। इससे कर्ज की मांग बढ़ेगी। लेकिन ऐसा नहीं होते देखकर रिजर्व बैंक ने बैंकों को यह कहा कि कर्ज की दरें वे रेपो दर से जोड़ने का काम करें। वहीं बैंकों का संकट यह है कि उनके पास जमा में कमी आ रही है क्योंकि लोग बचत के दूसरे माध्यमों में पैसे डाल रहे हैं।

सरकार ने भी राहत पैकेज की घोषणा की है। दस बैंकों को आपस में मिलाने के साथ-साथ बैंकों में 50,000 करोड़ रुपये लगाने की घोषणा सरकार ने की है। साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर लगने वाले सरचार्ज को वापस लेने और वाहन, रियल एस्टेट और निर्यात के लिए भी कुछ घोषणाएं सरकार ने की हैं। 400 जिलों में कर्ज मेला के आयोजन के साथ-साथ काॅरपोरेट कर दरों को 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी करने की घोषणा भी सरकार ने की है।

ये सभी छोटी कोशिशें हैं। अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। इसके लिए कई वजहें जिम्मेदार हैं। इसलिए इस स्थिति से उबरने के लिए बड़े कदमों की जरूरत है। ऐसे कदम जिन्हें विस्तारवादी कहा जा सके। ताकि खपत के साथ निवेश को भी बढ़ावा मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कदमों की जरूरत खास तौर पर है। कर राजस्व घटने की स्थिति में सार्वजनिक कार्यों पर होने वाले खर्च को बढ़ाना बड़ी चुनौती है। लेकिन इसके लिए वित्तीय समेकन की नीति को नए सिरे से देखने की आवश्यकता है।

 
 

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