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नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की व्याकुलता

नागरिकता को मानवता की चिंताओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता

 

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असम में नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर यानी एनआरसी के प्रकाशन के बाद से प्रदेश की राजनीति गर्म हो गई है। एनआरसी के समर्थकों में सत्ता पक्ष भी शामिल है। लेकिन इसके साथ-साथ इसके समर्थक इस बात से दुखी है कि जितने लोगों के बाहर रहने की उम्मीद उन्हें थी, वास्तविक संख्या उससे कम है। भारतीय जनता पार्टी की समस्या यह भी है कि जिन वर्गों में उसका आधार था, उस वर्ग के लोग भी इससे बाहर रह गए हैं। हालांकि, इस बात पर खुशी होनी चाहिए कि बाहर रहने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। आम तौर पर इस तरह के रजिस्टर से जो लोग बाहर रह जाते हैं उन्हें बहुत ही मुश्किल परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। उनके सामने वैसे केंद्रों में रहने की स्थिति भी पैदा हो जाती है जो मानवाधिकारों के हनन के लिए बदनाम रहे हैं। लेकिन सत्ता पक्ष इन परेशानियों को लेकर संवेदनशील नहीं है। वास्तव में एनआरसी का विचार ही विभाजन की सोच से उभरा है और इससे असम के समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ना तय है।

एनआरसी को लेकर पूरी बहस देश का होने और बाहरी होने के बीच सीमित है। इसमे तारीख को लेकर विवाद है। जमीन पर दावेदारी को लेकर विवाद है। कुल मिलाकर इन वजहों से सामाजिक तनाव बढ़ा है। इससे आपसी संदेह बढ़ रहा है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। सत्ताधारी पक्ष ने एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने के लिए किया। एनआरसी को लेकर जो बहस चली उसमें घुसपैठिया और कीड़े-मकोड़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। ऐसा करके सामाजिक विभेद को मजबूत करने की कोशिश की गई। एक-दूसरे से डर पैदा करने का काम हुआ।

भेदभाव वाली प्रक्रिया अपनाई गई। ऐसे मानक अपनाए गए कि खास वर्ग को इससे बाहर रखा जाए। अलग-अलग लोगों से अलग-अलग दस्तावेज मांगे गए। जन्म से नागरिकता निर्धारण के सिद्धांत की अनदेखी की गई। इससे अलग करने की प्रक्रिया सांस्थानिक बन सकती है। सत्ता पक्ष ने इसका इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया। यही वजह है कि आज देश में कई जगह से एनआरसी की मांग उठने लगी है। असम की जो ऐतिहासिक स्थिति रही है, उसे देखते हुए क्या ऐसी मांग दिल्ली, तेलंगाना और महाराष्ट्र के लिए सही ठहराई जा सकती है? इन मांग के पीछे एक खास तरह की सनक काम कर रही है। जिसमें एक खास वर्ग को निशाने पर लेने की कोशिश है। इस बात को लेकर अटकलें चल रही हैं कि पूरे देश में एनआरसी होगा और जो इसमें शामिल नहीं होंगे उनके लिए विशेष कैंप बनेंगे। इससे लोगों में डर और असुरक्षा पैदा हो रहा है। बहुत लोगों को यह लग रहा है कि कहीं वे दोयम दर्जे के नागरिक न बन जाएं। इस तरह की मांग सत्ता पक्ष की राजनीति के लिहाज से तो अनुकूल है लेकिन अगर ये मांग और तेज होती है तो इससे भारत जैसे विविध और गैरबराबरी वाले देश में असंतोष तेजी से पैर फैला सकता है।

बुनियादी तौर पर नागरिकता जैसे विषयों पर निर्णय लेते वक्त लोगों के जीवन और जीवनयापन से संबंधित आयामों का ध्यान रखा जाना चाहिए। क्या हम संवैधानिकता पर पुरानी पहचान को हावी होने देना चाहते हैं? या फिर संविधान की मूल भावना को छोड़कर इसके आधार पर प्रक्रियागत बातों को अधिक तरजीह देना चाहते हैं? हमें यह समझना होगा कि मानव सभ्यता में पलायन हमेशा से हुआ है और हमारे वक्त में यह कई वजहों से कई गुना बढ़ा है। नागरिकता और इससे संबंधित अधिकारों की अवधारणा मानवता को ध्यान में रखकर तैयार होनी चाहिए न कि सरकार को केंद्र में रखकर। मानवता के एक वर्ग को पुरानी पहचान के आधार पर इन अधिकारों से वंचित करने से भारत एक नस्लीय लोकतंत्र में सिमट जाएगा और इसके थियोक्रेसी में तब्दील होने का खतरा भी बना रहेगा। ऐसे में जरूरत यह है कि नागरिकता से संबंधित पहचान को संविधान के गणतंत्रीय आदर्शों के अनुकूल रखा जाए।

 
 

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