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विलय के उन्माद से परे

भारत में बैंकिंग क्षेत्र में छोटी ईकाई का विकल्प अब भी बेहतर है?

 

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पिछले डेढ़ दशक में भारत ने सार्वजनिक क्षेत्र की कई बैंकों का आपस में विलय देखा है। लेकिन अप्रैल, 2019 से अगस्त, 2019 के बीच तेजी से विलय का काम हुआ। अप्रैल, 2019 में विजया बैंक और देना बैंक का विलय बैंक आॅफ बड़ौदा में करने की घोषणा हुई। पिछले दिनों वित्त मंत्री ने चार और विलय की घोषणा की। ओरिएंटल बैंक आॅफ काॅमर्स और यूनाइटेड बैंक आॅफ इंडिया का विलय पंजाब नैशनल बैंक में होना है। सिंडिकेट बैंक का विलय केनारा बैंक में हो रहा है। आंध्रा बैंक और काॅरपोरेशन बैंक का विलय यूनियन बैंक आॅफ इंडिया। इलाहाबाद बैंक में इंडियन बैंक का विलय होना है। इससे सरकारी बैंकों की संख्या आधी हो जाएगी। विलय के बाद बैंकों का आकार बढ़ जाएगा। पीएनबी का आकार अभी से डेढ़ गुना हो जाएगा। वहीं केनारा बैंक और यूनियन बैंक दोगुने हो जाएंगे। लेकिन क्या इससे सरकारी बैंकों का कामकाज ठीक हो जाएगा?



आकार और कामकाज में सुधार से संबंधित तथ्य बिल्कुल स्पष्ट नहीं हैं। खास तौर पर उनसे संबंधित जिनका आकार 10 अरब डाॅलर से अधिक हो। बड़े आकार के बैंक होने का मतलब यह नहीं है कि उसका प्रदर्शन भी अच्छा हो जाएगा। क्योंकि पहले भी बैंकों ने अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। इस सरकार के पिछली कार्यकाल में 2017 में भारतीय स्टेट बैंक में कुछ बैंकों का विलय हुआ। स्टेट बैंक का कारोबार 52 लाख करोड़ रुपये का है और बाजार में इसकी हिस्सेदारी 22 फीसदी है। लेकिन बुल वैल्यू के मामले में यह एचडीएफसी के मुकाबले एक तिहाई पर है। जबकि कारोबार और बाजार हिस्सेदारी के मामले में एसबीआई एचडीएफसी से तकरीबन तीन गुना आगे है।



परिचालन के मामले में विलय से सुधार जरूर हो सकता है। पहली बात तो यह कि बैंकों की संख्या कम होने से निर्णय लेने में कम वक्त लगेगा। बैंकों में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति के मामले में भी वित्त मंत्रालय पर दबाव कम होगा। वहीं आपस में समन्वय का काम भी आसान होगा। इससे एनपीए की समस्या में भी मदद मिल सकती है। लेकिन क्या इससे बैंकों के खर्च कम होंगे या क्या शाखाओं की संख्या कम होने के बावजूद बैंकों से छंटनी नहीं होगी?



बैंकिंग क्षेत्र में कार्यक्षमता का तात्पर्य इस बात से है कि कोई बैंक अपने संसाधनों को आमदनी में कैसे बदलता है। इस लिहाज से देखें तो सरकार बैंकों का कामकाज काफी बुरा दिखता है। विलय के बाद जो बड़े बैंक बन रहे हैं, वे अधिक कर्ज दे पाएंगे। लेकिन कम संख्या में बड़े बैंक होने के जोखिमों से भी नहीं इनकार किया जा सकता। ऐतिहासिक तौर पर भारत में सरकारी बैंकों में बड़े कारोबारी घरानों को कर्ज देने का पूर्वाग्रह दिखा है। इसकी संभावना कम ही लग रही है कि यह सोच बदलेगी। बल्कि आशंका इस बात की है कि बैंक अपनी वित्तीय स्थिति ठीक करने के लिए ऐसे लोगों को और अधिक कर्ज देंगे। ऐसे में ये विलय कैसे कामयाब होंगे, ये देखा जाना बाकी है।



लेकिन क्या यह सरकार विलय को सफल बनाने की कोशिश इसलिए कर रही है ताकि बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुधरे? या फिर इसके जरिए सिर्फ सुधार का माहौल बनाने की कोशिश हो रही है? जबकि मूल मुद्दों का समाधान नहीं हो रहा है। विलय को लेकर जो संदेह थे, उसका समाधान सरकार ने नहीं किया। मूल सवाल तो यही है कि हमें बड़े बैंक क्यों चाहिए जब हम मौजूदा बैंकों का प्रबंधन ही ठीक से नहीं कर पा रहे हैं? सरकारी बैंकों में बुरे कर्जों की समस्या कैसे पैदा हुई, यह सबको मालमू है। अगर प्रबंधन मौजूदा संपत्तियों का ठीक से प्रबंध नहीं कर पा रहा है तो और अधिक संपत्तियों का सही प्रबंधन इससे कैसे होगा?

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