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अपरिवर्तनवादी दौर में परिवर्तन की राजनीति

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भारत की मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन की बात करने वाली राजनीति बदलाव ला सकने में खुद को सही नहीं मानती बल्कि यह कहकर काम चलाती है कि लोग वोट देने की क्षमता को नैतिक शक्ति से नहीं जोड़ रहे हैं। उदाहरण के लिए एक मतदाता की नैतिक शक्ति में यह निहित है कि वह हर तरह की हिंसा को खारिज करे। भीड़ की हिंसा से दो बातें निकलती हैं। एक क्षेत्र में किसी व्यक्ति या किसी संस्था के द्वारा की जाने वाली हिंसा दूसरे क्षेत्र को भी प्रभावित करती है। एक संदर्भ में होने वाली हिंसा और लोगों के उत्पीड़न का असर दूसरे क्षेत्रों के लोगों पर भी पड़ता है और वे घबराते हैं। लोगों में इस बात को लेकर संदेह पैदा हो रहा है कि उन्हें आजादी मिली हुई भी है या नहीं। वे इस बात को लेकर आशंकित है कि आजादी पर बंदिशें लगाने के लिए मौजूदा सरकार और अपरिवर्तनवादी शक्तियां अगला कदम क्या उठाएंगी। नैतिक भय के इस माहौल को दूर करने का काम सरकारी संस्थाओं ने नहीं किया है। इससे यह पता चलता है कि मतदान की सीमित ताकत है। सिर्फ मतदान का अधिकार यह सुनिश्चित नहीं करता कि लोगों को उनके अधिकार मिल ही जाएंगे।



मतदान का अधिकार पर्याप्त नहीं है। दरअसल, यह अधिकार अपरिवर्तनवादी तत्वों की मदद पहुंचाने का काम भी करता है। इसलिए नैतिक ताकत के जरिए लोगों में यह क्षमता विकसित करने की जरूरत है कि वे हर तरह की हिंसा को खारिज कर सकें। नैतिक क्षमताओं से मतदान के वक्त सही और गलत का निर्णय हो पाता है। बुनियादी आजादी और अहिंसा इसके दो आधार स्तंभ हैं। ऐसे में सवाल यह उठना चाहिए कि मतदान में नैतिक क्षमताओं की कितनी भूमिका होती है? इस सवाल का सकारात्मक जवाब नहीं दिया जा सकता। क्योंकि जिस तरह की हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, उसमें लोग मूक दर्शक बनकर बैठे लगते हैं। जब जनता अपनी नैतिक ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पाए और सरकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंसा को बढ़ावा दे तो उस स्थिति में कोई तो हो जो हस्तक्षेप करे। इस संदर्भ में परिवर्तन की इच्छा रखने वाले लोगों द्वारा तथ्यों की तलाश जैसे पहलों को समझा जाना चाहिए।



दिलचस्प यह है कि परिवर्तन की इच्छा रखने वाले तत्व हस्तक्षेप तो कर रहे हैं लेकिन वे सरकार का विरोध करने तक सीमित हो जा रहे हैं। वे लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इनमें कुछ हैं जो जनता से संवाद करते हैं। ये लोग अक्सर हस्तक्षेप करना चाहते हैं कि क्योंकि समाज का कोई खास तबका अपनी नैतिक भूमिकाओं के निर्वहन में अक्सर नाकाम होता है। ये लोग सरकार के सामने आवाज उठाते हैं और सरकार इन्हें नजरअंदाज करती रहती है। परिवर्तनकामी लोगों की प्रतिक्रियावादी रुख की वजह से यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर उन्हें ये-विरोधी और वे-विरोधी कहकर निशाना बनाते हैं।



यहां जरूरी यह है कि नैतिक ताकत के सही या गलत होने को लेकर अंतर्विषयी समझौते हों और इसके जरिए भीड़ की हिंसा को खारिज किया जाए। अहिंसा को लेकर आम सहमति बनाने के बजाए दोनों पक्ष एक-दूसरे को हिकारत की नजर देखने पर अधिक यकीन कर रहे हैं। हिंसा को तुरंत और हर रोज खारिज किया जाना चाहिए। इसे चुनाव तक नहीं टाला जाना चाहिए। अगर इसे लंबे समय तक टाला जाता है तो अपरिवर्तनवादी लोगों को इससे काफी अवसर मिल जाएगा। ऐसी स्थिति में सच को चुप कराने के लिए विचारों की ट्रोलिंग शुरू हो जाती है। लेकिन सहमति बनाने के लिए यह जरूरी है कि वास्तविक स्थितियों को समझा जाए। इसके लिए इस बात पर सहमति बनानी होगी कि किसी घास हिंसक घटना का अहिंसा पर क्या असर पड़ा। दुनिया में किसी भी ऐसे समाज ने प्रगति नहीं की है जहां की राजनीतिक शक्तियों ने हिंसा को बढ़ावा देकर शासन किया है।

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