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प्रेस किसके प्रति जवाबदेह है?

भारतीय प्रेस परिषद को अपने दायित्वों और लक्ष्यों का परीक्षण करना चाहिए

 

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भारतीय मीडिया से संबंधित दो हालिया मामले यह बताते हैं कि मीडिया का जमीनी बने रहना कितना जरूरी है। एक लोकतांत्रिक सरकार के मूल में चुनावों के जरिए जनता की अभिव्यक्ति है। ऐसे में मीडिया को सरकार और सरकारी नियंत्रण से इतनी दूरी रखनी चाहिए कि उसकी आवाज को सुना जा सके। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में पुलिस ने एक पत्रकार पर इसलिए मुकदमा दर्ज किया कि उसने मध्याह्न भोजन योजना के तहत स्कूल में बच्चों को नमक-रोटी दिए जाने की खबर दी। इसके पहले जम्मू कश्मीर के एक पत्रकार द्वारा वहां सूचनाओं के प्रसार पर लगाई गई पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष ने हस्तक्षेप की पहल की।

दोनों मामलों से विडंबना का पता चलता है। पहले मामले में यह दिखता है कि समस्या के समाधान के बजाए इसे सामने लाने वाले पर ही निशाना साधा जा रहा है। वहीं दूसरे मामले में यह दिखता है कि जिस संस्था का गठन प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए हुआ है, वहीं संस्था अपने लक्ष्यों के उलट काम कर रही है।

पीसीआई का अस्तित्व इस सोच पर आधारित है कि एक लोकतांत्रिक समाज में प्रेस को स्वतंत्र और जिम्मेदार होना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आजादी का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। लेकिन सवाल यह उठता है कि प्रेस किसके प्रति जवाबदेह है? निश्चित तौर पर प्रेस देश की जनता के प्रति जवाबदेह है। प्रेस परिषद के गठन की एक वजह के तौर पर यह कहा गया था कि सरकारी नियंत्रण प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए यह उचित समझा गया कि प्रेस के ही लोग कुछ आम लोगों के साथ मिलकर निष्पक्ष ढंग से इसका नियमन करें। प्रेस परिषद की आलोचना दशकों से ‘दंतविहीन’ संस्था कहकर होती है। हालांकि, कुछ मामलों में इसकी भूमिका की तारीफ भी होती है। पंजाब में जब 1990 के दशक की शुरुआत में आतंकवाद की समस्या थी तो उस वक्त प्रेस परिषद की भूमिका की तारीफ की जाती है। अयोध्या मंदिर आंदोलन के वक्त भी प्रेस परिषद ने सांप्रदायिकता फैलाने वाले कवरेज पर अखबारों को फटकार लगाने का काम किया था।

लेकिन कश्मीर के मामले में अपने हस्तक्षेप को सही ठहराने के लिए प्रेस परिषद के अध्यक्ष ने राष्ट्र हित और एकता को मुद्दा बनाया। कश्मीर टाइम्स के कार्यकारी संपादक ने सुप्रीम कोर्ट से यह मांग की है कि 5 अगस्त से सूचनाओं के प्रवाह और पत्रकारों की आवाजाही पर लगाई गई रोक हटाई जाए। इस तरह की पाबंदियों से कोई सूचना नहीं आ रही है और इसने मीडिया को लाचार बना दिया है। ऐसा करके सरकार लोगों के अधिकारों का हनन कर रही है। क्योंकि लोगों को उन्हें प्रभावित करने वाले निर्णय के बारे में जानने का हक है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह राष्ट्र हित नहीं है कि किसी खास मुद्दे पर लोगों को अपनी राय बनाने के लिए उन्हें जरूरी सूचनाएं मिलें? यह अब तक स्पष्ट हो गया है कि कश्मीर घाटी में जमीनी स्तर पर जो हो रहा है, उसकी जानकारी भारतीय मीडिया को नहीं मिल रही है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रेस का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। यह इतिहास 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से भी पुराना है। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास त्याग और बलिदान से भरा हुआ है। उस दौर के कई पत्रकार समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इन लोगों के पास जो भी थोड़े संसाधन थे, उसे लगाकर इन्होंने अंग्रेजी समेत अन्य भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। इनमें से कई को अंग्रेजों की सरकार के दमन का सामना भी करना पड़ा।

यह अच्छा है कि प्रेस परिषद के अध्यक्ष के निर्णय की आलोचना कई पत्रकारों और मीडिया संस्थानों ने की। मीडिया में यह खबर भी आई कि अदालत में आवेदन देने से पहले सभी सदस्यों से विचार-विमर्श नहीं किया गया। मीडिया को यह मांग करनी चाहिए कि इस मामले में वस्तुस्थिति न सिर्फ पत्रकार समुदाय के सामने स्पष्ट की जाए बल्कि जनता को भी सब सच-सच बताया जाए।

स्वतंत्र पर रिपोर्टिंग करने वाली मीडिया को दो काम करने होते हैं। यह जनता को शासन से संबंधित विषयों पर निर्णय लेने के लिए सूचना देती है। साथ ही यह लोगों को अपनी शिकायतों और सुझावों को अभिव्यक्त करने का मंच मुहैया कराती है। खास तौर पर उन लोगों को जो यह मानते हैं कि उनकी आवाज कमजोर है या उनकी आवाज को नहीं सुना जा रहा है। निश्चित तौर पर राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए ये बेहद अहम कार्य हैं?

 
 

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