ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

कोयला खनन में विदेशी निवेश

वाणिज्यिक कोयला खनन में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति से उत्पादन और पर्यावरण संबंधित खतरे पैदा हो सकते हैं

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

सरकार ने नीतिगत बलदपब करते हुए कोयला खनन और बिक्री में आॅटोमेटिक मार्ग से 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दे दी है। यह अनुमति कोयला खनन विशेष प्रावधान अधिनियम, 2015 और खनन व खनिज संवर्धन एवं नियमन अधिनियम, 1957 के प्रावधानों को अनुपालन की स्थिति में रहेगी। पहले यह छूट सिर्फ उन खदानों के लिए थी जिनके कोयले का इस्तेमाल इसे निकालने वाली कंपनी ही कर रही थी। बिजली, स्टील और सीमेंट कंपनियां इसका लाभ ले रही थीं। कोयला वाॅशरीज में 100 फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति थी लेकिन ये कंपनियां सिर्फ उन्हीं कंपनियों को तैयार कोयला बेच सकती थीं जिन्होंने प्रसंस्करण के लिए कोयले की आपूर्ति की हो। खुले बाजार में इन्हें बेचने की अनुमति नहीं थी। लेकिन अब नई नीति के तहत विदेशी कंपनियों को खुले बाजार में कोयला बेचने के काम में भी 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति मिल गई। कोयला के वाणिज्यिक इस्तेमाल वाली गतिविधियों में भी निवेश के लिए यह अनुमति मिल गई है।



नई नीति कई वजहों से महत्वपूर्ण है। पहली बात यह कि कोयला भंडार के मामले में अग्रणी देशों में भारत एक है। भारत के पास 286 अरब टन कोयले का भंडार है। कोयला खनन के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। भारत में बिजली जरूरतों को पूरा करने में कोयले का सबसे अधिक योगदान है। सीमेंट और धातु उद्योगों में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसका मतलब यह हुआ कि ये उद्योग अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भूमिका निभाता है।



भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले का आयात भी करता है। कोल इंडिया लिमिटेड मांग को पूरा नहीं कर पा रहा है। कोयले की अपर्याप्त आपूर्ति की वजह से बिजली बनाने वाली इकाइयां पूरी क्षमता भर उत्पादन नहीं कर पा रही हैं। इससे आयात की स्थिति पैदा हो रही है। घरेलू बाजार के मुकाबले अधिक कीमत पर भी कोयले का आयात होता है। 2018-19 में भारत ने 13.5 करोड़ टन कोयले का आयात किया था। गैर-तटीय बिजली संयंत्रों के लिए 12.5 करोड़ टन कोयले के आयात पर भारत ने 8 अरब डाॅलर खर्च किए थे। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ा। नई उदार नीतियों के क्रियान्वयन से यह माना जा रहा है कि घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। यह भी माना जा रहा है कि इससे भारत में खनन के लिए नई तकनीक आएगी और इससे लागत में कमी होगी।



तीसरी बात यह है कि नई नीति से इस उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। अब तक भारत के कोयला उद्योग पर सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड का एकाधिकार है। कोयले के खनन और बिक्री का अधिकार सिर्फ इसे ही था। बाद में कुछ और निजी और सार्वजनिक कंपनियों को अपने इस्तेमाल वाले खदानों से कुल उत्पादन का 25 फीसदी बेचने की अनुमति मिली। कोल इंडिया लिमिटेड का 70.96 फीसदी स्वामित्व सरकार के पास है। 2018-19 में देश के कुल कोयला उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 83 फीसदी थी। इसमें से 81 फीसदी कोयला सिर्फ बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों को गया। प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए कोल इंडिया लिमिटेड को अपनी कार्यकुशलता में सुधार करते हुए लागत को कम करना होगा।



चौथी बात यह है कि नई खनन नीति की वजह से कोयला खदानों के आवंटन, नीलामी, पर्यावरणीय मंजूरी आदि नीतियों में भी बदलाव की बात चलेगी। क्योंकि सिर्फ एफडीआई के नियम बदलने से अपेक्षित लक्ष्य नहीं हासिल होंगे। नई कंपनियों के आने के बाद समयबद्ध ढंग से मंजूरी मिलने की प्रक्रिया भी सुनिश्चित करनी होगी ताकि अनिश्चितताएं कम हों। ऐसा इसलिए क्योंकि विदेशी कंपनियां उन क्षेत्रों में निवेश करने से बचना चाहती हैं जिनमें जोखिम अधिक हों। इस क्षेत्र में जमीन अधिग्रहण और अन्य मंजूरियों से संबंधित समस्याएं हैं जिनकी वजह से विदेशी कंपनियों का प्रवेश बाधित हो सकता है।



अपने इस्तेमाल वाले कोयला खदानों में निजी निवेश कम ही हुआ है। क्योंकि इसमें उत्पादन से संबंधित जोखिम रहा है। इस उद्योग में प्रवेश करने वालों को नए कोयला खदान हासिल करने होंगे और उन्हें विकसित करना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि वाणिज्यिक परिचालन की स्थिति में पहुंचने में उन्हें वक्त लगेगा। इससे उन पर आर्थिक बोझ आएगा। इसके अलावा पर्यावरणीय मंजूरी, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और जमीन की उपलब्धता से संबंधित समस्याओं की वजह से भी खनन में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का लाभ मिलने में वक्त लगेगा। मुनाफे से संबंधित दिक्कतों की वजह से नई कंपनियां निवेश से हिचक सकती हैं।



हालांकि, प्राकृतिक संसाधनों के सतत विकास के दृष्टिकोण से देखा जाए तो अंधाधुंध खनन से पर्यावरण असंतुलन का खतरा बढ़ेगा। क्या विदेशी निवेश की इच्छा की वजह से राज्य सरकारों द्वारा वन अधिकार कानून, 2006 के प्रावधानों की अवहेलना की जाएगी। यह कानून जंगल के संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का अधिकार सुनिश्चित करता है। अगर सरकारें ऐसा करती हैं तो इससे आदिवासी समाज के जीवनयापन पर काफी नकारात्मक असर पड़ेगा। क्या विदेशी निवेश की चाह में जमीनी स्तर के लोगों के अधिकारों की अनदेखी की जाएगी? इन शंकाओं को मिटाने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि खनन कंपनियों का ठीक से नियमन हो और पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन के साथ-साथ खदानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित कराया जाए।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top