ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

एकीकरण पर एकपक्षीय सोच

.

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार भारत के संदर्भ में ‘वाइब्रेंट’, ‘मजबूत’ और ‘एकीकृत’ जैसे शब्दों का प्रयोग अपनी शक्तियों के इस्तेमाल को राजनीतिक वैधता देने के लिए करती है।



हालांकि, इस मामले में दिलचस्प यह है कि केंद्र सरकार के मुख्य प्रवक्ता ने हाल ही में एक और अधिक सुरक्षित रास्ता अख्तियार किया है। अब वे ‘एक देश, एक संविधान’ की बात कर रहे हैं। सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसके साथ-साथ सभी संविधान के मूल्यों से बंधे हुए हैं। इससे यह संकेत भी निकलता है कि सरकार यह मान रही है कि सरकार और शासक वर्ग का नैतिक विकास भी स्वतंत्रता, बराबरी और इंसानी गरिमा जैसे नैतिक मूल्यों पर आधारित है। ये सभी मूल्य संविधान के मूल में हैं।



नियमन के संदर्भ में संविधान के महत्व की बात करना कुछ वैसा ही जैसा आपसी संदेह, वैमनस्य और मतभेदों को दूर करने की कोशिश ताकि संवैधानिक मूल्यों के हिसाब से एकीकरण हो सके। किसी भी सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण के तौर पर उसकी वह असमर्थता काम करती है जो उसे एकीकरण के लिए जरूरी कार्य करने से रोकती है। क्योंकि इस प्रक्रिया में यह तथ्य उजागर होने का जोखिम है कि एक बड़ा सामाजिक और भावनात्मक तौर पर वंचित है। इससे एकीकरण को लेकर एकपक्षीय सोच सामने आती है। विडंबना यह है कि एकीकरण को लेकर किया जाने वाला दावा तब तक अधूरा है जब तक विकास की प्रक्रिया में खास सामाजिक वर्गों का वंचित बने रहना जारी है।



इस स्थिति में एकीकरण को लेकर सही सोच नहीं विकसित हो पाती। क्योंकि इसमें एकीकरण सिर्फ बाहरी परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाता है। एकीकरण की चिंता आंतरिक स्थितियों में सुधार को लेकर नहीं दिखती। ‘एक देश, एक संविधान’ की बात संविधान के कुछ अनुच्छेदों पर आधारित है। इन प्रावधानों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि एकीकरण के लिए सामाजिक भेदभाव को खत्म करना जरूरी है। इसलिए न सिर्फ इन संवैधानिक प्रावधानों के दार्शनिक आधारों पर ध्यान देना जरूरी है बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि इनके जरिए कैसे अस्पृश्यता जैसी सामाजिक सच्चाइयों को बदला जा सकता है।



संवैधानिक मूल्यों पर अमलीकरण तब ही होगा जब नागरिकों की सामाजिक सोच भी सकारात्मक तौर पर बदली जाएगी। तब ही लोग वैमनस्य वाले कृत्यों से खुद को रोक पाएंगे। नागरिकों से इतनी न्यूनतम अपेक्षा तो रखनी ही चाहिए। आदर्श स्थिति तो यह है कि लोग खुद ही नैतिक जिम्मेदारी लेकर अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए एक-दूसरे का महत्व समझें। इसे इस तरह से भी कहा जा सकता है कि लोग खुद इस मामले में सजग रहें और सुनिश्चित करें कि सामाजिक संबंध दूसरे के प्रति नफरत का भाव नहीं पैदा करें।



हालांकि, यह दिलचस्प है कि सरकार के ‘समर्थक’ होने का दावा करने वाले लोग एकीकरण को लेकर एकपक्षीय सोच के शिकार हैं। सच्चाई तो यह है कि इनमें से कुछ लोग सरकार की एकपक्षीय सोच के लिए भी जिम्मेदार हैं। ये लोग समाज के ‘हम और वे’ में बांट रहे हैं। इसके लिए सामाजिक बहिष्कार और सार्वजनिक हमलों का सहारा लिया जा रहा है। गोहत्या और अंतरजातीय विवाहों को बहाना बनाया जा रहा है। जो लोग ऐसे लोगों के पक्ष में खड़े हैं, वे भी कहीं न कहीं अन्याय में साझीदार हो जा रहे हैं।



यहां ध्यान रखने की बात यह है कि सामाजिक वैमनस्य रोजगार आदि को लेकर संघर्ष से संबंधित नहीं है। ऐसी परिस्थितियां अभी की राजनीतिक व्यवस्था में नहीं हैं। अल्पसंख्यक समुदाय और बहुसंख्यक समुदाय के बीच ऐसी प्रतिस्पर्धा नहीं चल रही है। इसके बावजूद दोनों में तनावपूर्ण संबंध हैं। इसकी वजह ‘मजबूत’ भारत के विचार में तलाशी जा सकती है। व्यक्तिगत हित और राष्ट्र हित में संतुलन बैठाने वाली सोच की जगह पूर्णता वाली सोच ने ले ली है। सच्चाई यह है कि ऐसे ‘चिंतित नागरिकों’ ने अपनी दृष्टि कम समय के सांकेतिक लक्ष्य ‘मजबूत’ भारत में सीमित कर ली है। इससे लंबी अवधि के लक्ष्य पीछे छूट रहे हैं। इन लक्ष्यों में प्रबुद्ध भारत में सम्मान के साथ होने वाला समावेशन शामिल है जहां लोग खुद ही भला-बुरा सोचने की क्षमता रख सकें और बेहतर इंसान साबित हो सकें।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top