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राजनीति के बारे में सोचने की समस्याएं

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केंद्र की सत्ता में बेहद सुविधा के साथ काबिज भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार देश की राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संबंधित संवेदनशील मसलों पर निर्णय लेने की जल्दबाजी में है। केंद्र सरकार इसलिए भी ये निर्णय ले रही है क्योंकि उसके सामने कोई मजबूत और स्पष्ट विपक्ष नहीं है। मीडिया में चुनावी राजनीति और चुनावों के बाद की घटनाओं की व्याख्या बेहद सतही ढंग से हो रही है। वे अपनी सीमाओं में बंधे हुए नजर आ रहे हैं। इससे ऐसा लगता है कि समकालीन भारत की राजनीति के बारे में जो सोच है, उसमें गहरी समस्याएं हैं।



चुनावों के बाद के परिदृश्य की सबसे बड़ी समस्या यह दिख रही है कि बहुत गुणा-भाग वाली सोच गहन सोच पर हावी है। गुणा-भाग वाली सोच न सिर्फ सत्ता पक्ष पर बल्कि विपक्ष पर भी हावी है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि पिछले कुछ सालों में सत्ताधारी दल ने बहुत गुणा-भाग वाले निर्णय लिए हैं। इस तरह की सोच में सत्ताधारी दल के सदस्य ‘आम लोगों’ को कच्चे माल की तरह चुनावों के लिए इस्तेमाल करते हैं। चुनावों के बाद ये लोग आम लोगों को भ्रम वाले विषयों में उलझाए रखते हैं। जो लोग अपनी सत्ता बरकरार रखने के प्रति दिलचस्पी रखते हैं, वे चिंतनशीलता की जगह गुणा-गणित वाली सोच को तरजीह देते हैं।



हालांकि, राजनीति के बारे में विपक्ष की सोच भी अलग नहीं है। कांग्रेस भी इसी तरह से सोचती है। यही वजह है कि उसकी पूरी राजनीतिक सोच इस बात तक सीमित हो गई है कि पार्टी का अध्यक्ष कौन होगा। जबकि उससे अपेक्षा यह थी कि वह आम लोगों के अच्छे-बुरे के सोच को तरजीह देगी। कुछ लोग कांग्रेस के ‘विलंबित ख्याल’ के बारे में अवश्य चिंतित हैं। खास तौर पर आंतरिक मसलों पर बहुत अधिक समय खराब करने के संदर्भ में। यह जरूरी है कि सत्ताधारी दल के उलट विपक्षी पार्टी अपने आंतरिक मसलों पर निर्णय लेने में वक्त ले। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है। लेकिन बहुत अधिक विलंब करना भी ठीक नहीं है। इससे राजनीतिक भटकाव की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में लोकतंत्र की जरूरत महसूस करने वाले लोग भी वाॅटसएैप के दुष्प्रचार का शिकार होने के खतरे का सामना करते हैं। क्योंकि ऐसा दुष्प्रचार करने वाला का एक ही मकसद होता है कि किसी भी तरह से सत्ता में बने रहना है। ऐसे में मूल सवाल यह पैदा होता है कि क्यों हमें राजनीतिक दलों और नेताओं की जरूरत है?



प्रतिनिधियों वाले लोकतंत्र में राजनीतिक पहल सभी लोगों पर नहीं बल्कि कुछ लोगों पर निर्भर करता है। इसमें हर कोई शासन नहीं कर सकता। लेकिन हर कोई अपने शासक को कह सकता है कि शासन उत्तराधिकार पर आधारित नहीं है बल्कि यह किसी पार्टी या नेताओं के समूह के कार्यों पर आधारित है। हालांकि, ऐसे शासक कई बार शासन पर एकाधिकार समझने लगते हैं। राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा तब और बढ़ जाती है जब लोग आलोचनात्मक प्रतिक्रिया देने की जगह सिर्फ आज्ञापालन में लग जाते हैं। सवाल यह भी है कि क्या लोगों में आलोचनात्मक राय देने की क्षमता है।

गहराई से सोचने की क्षमता को संज्ञानात्मक शांति से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। राजनीति को लेकर गहरी सोच ब्रेकिंग न्यूज और सनसनी तक सीमित हो गई है। इससे आम आदमी की गहराई से सोचने की क्षमता प्रभावित हो रही है। सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों की गति के प्रति मोह की वजह से नेता आम लोगों पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित कर पा रहे हैं। इसके लिए वे अपनी विचारधारा को सवालों के परे ले जा रहे हैं। यह सच है कि वाॅट्सएैप जैसे माध्यम किसी को न सिर्फ सूचनाओं के संसार में ले जा रहे हैं बल्कि संभवतः ज्ञान का माध्यम भी बन रहे हैं। लेकिन ये माध्यम खुद में किसी को गहराई में ले जाने में सक्षम नहीं हैं। एक किसी व्यक्ति की नैतिक जरूरतों पर निर्भर करता है कि वह कितनी गहराई में जाना चाहता है और जटिल सवालों का जवाब तलाशना चाहता है। ये माध्यम उपयोगी भी हो सकते हैं और मुश्किलें पैदा करने वाले भी। गहरी सोच को आगे बढ़ाने और इसके प्रति हतोत्साहित करने, दोनों में इन माध्यमों का इस्तेमाल हो सकता है। अस्थायी तौर पर ही सही लेकिन ‘वाॅटसएैप लहर’ राजनीति की दिशा तय कर रही है। लेकिन जब तक लोगों में सोचने की क्षमता बची है तब तक ये लहरें ज्ञान के सागर पर प्रभुत्व नहीं जमा सकती हैं।

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