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संघवाद का महत्व

कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाने का निर्णय शब्दों के आडंबर पर आधारित है

 

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केंद्र सरकार की ओर से जम्मू कश्मीर से संबंधित विशेष प्रावधान हटाने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का निर्णय अचानक लिया गया। इसकी तारीफ भी हुई है और आलोचना भी। सिविल सोसाइटी, बौद्धिक वर्ग और विपक्ष की ओर से जिन बातों के आधार पर इसकी आलोचना हुई, उसकी काफी चर्चा हुई है। उसे फिर से दोहराने की जरूरत नहीं है। विपक्ष के नजरिए से कश्मीर के मसले को देखने पर संवैधानिक कायदों और विचार-विमर्श वाले लोकतंत्र के मूल्यों का अवमूल्यन दिखता और साथ ही आधिकारिक भाषा के प्रावधानों की अवहेलना भी।



केंद्र सरकार की ओर से इसे सही ठहराने के लिए जो तर्क दिए गए, वे भी अनापेक्षित नहीं है। इसमें यह दावा किया जा रहा है कि इस निर्णय से इस क्षेत्र का विकास होगा। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए के प्रावधानों को विकास में बाधा मान रही थी। कश्मीर को भारत से ‘एकीकृत’ करने के इस निर्णय को केंद्र सरकार और उसके समर्थकों की ओर से केंद्र और राज्य में मजबूत सरकार के लिए जरूरी निर्णय के तौर पर देखा गया।



मजबूत राष्ट्र की इस बात में एकीकरण, क्षेत्र के विकास और घाटी के लोगों के भले को लेकर शब्दों का आडंबर बुना गया है। केंद्र सरकार और राजनीति वर्ग की ओर से भी इसी तरह की बात हो रही है। इसमें अतीत की सच्चाइयों को दरकिनार करके विकास के एक माॅडल के नजरिए से चीजों को देखा जा रहा है। भारतीय संघवाद में जो राज्य में शामिल हैं उनमें क्षेत्रीय तनाव आंतरिक तौर पर भी है और विभिन्न राज्यों के बीच भी। हमें यह समझने की जरूरत है कि संघवाद में शामिल राज्यों की महत्ता इस बात में है कि समरसता और शांति बनी रहे न कि इन क्षेत्र में रहने वाले लोग अलग-थलग महसूस करें और मुश्किल में रहें।



शक्तियों के केंद्रीकरण से कल्याण नहीं बढ़ता। अगर ऐसा होता तो भारत में मजबूरी में गांवों से शहरों का पलायन नहीं दिखता। वह भी ऐसे शहरी भारत में जो अपने लोगों को अच्छा जीवन नहीं दे सकता। उत्तराखंड जैसे कई राज्यों में इस तरह का पलायन का परेशान करने वाला चेहरा दिखता है। हजारों गांवों ने इस संकट का सामना किया है। कई गांवों में तो लोग हैं ही नहीं। इसलिए भौगोलिक क्षेत्र का महत्व इस बात में निहित है कि वह किसी ढंग से इंसानों को और प्रकृति को विकसित होने का अवसर मुहैया करा रहा है।



केंद्र सरकार दावा कर रही है कि उसके इस निर्णय से नए अवसर पैदा होंगे। लेकिन वह इस बात से अनजान दिख रही है कि शहरी जगहों का समान वितरण वह सुनिश्चित नहीं कर पाई है। जबकि आर्थिक लेन-देन के लिए ये उपलब्ध हैं। लेकिन इस लेन-देन तक आम लोगों की पहुंच नहीं है। शहरी विकास को लेकर जो अनुभव है, उससे पता चलता है कि इन जगहों पर बहुत-अमीर शहरी वर्ग ने कब्जा जमा लिया है और इस तक आम लोगों की पहुंच नहीं है। आधिकारिक तौर पर जो कहा जा रहा है, उसमें अन्याय के प्रति घाटी के लोगों की आवाज का कोई मतलब नहीं है। उनकी अपेक्षा यह थी कि केंद्र सरकार कम से कम उन्हें बताती कि अनुच्छेद 370 के संदर्भ में वह उनके लिए क्या निर्णय लेने जा रही है।



इस तरह से शक्तियों के केंद्रीत करने से मौजूदा सरकार की बेचैनी का पता चलता है। वह चाहती है कि सभी ताकत उसके हाथ में हों। इस तरह के निर्णय के परिणामों का अंदाज लगाया जा सकता है। नियंत्रण की इच्छा कई बार भारी भी पड़ जाती है। क्योंकि जिस ढंग से कश्मीर के संघर्ष के केंद्रीकरण की कोशिश की गई है, उससे सरकार कृषि, रोजगार, शहरी शासन जैसे विषयों पर चल रहे संघर्षों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाएगी। संघवाद में शक्तियों के बंटवारे से संघर्षों के समाधान की संभावना होती है। राज्यों को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने से समाधान नहीं होता। लेकिन मौजूदा सरकार केंद्रीकरण के जरिए संघर्षों का समाधान करना चाहती है। विकेंद्रित संघर्षों को नजरंदाज करने से इसके फिर से सर उठाने का खतरा बना रहता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रभावित होने वाला किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं। पारस्परिक संघवाद से केंद्र सरकार इन संघर्षों पर समान रूप से ध्यान देने को बाध्य होगी। इंसानी विकास की स्थितियां पैदा करने से संबंधित संघवाद समानता के मूल्यों पर आधारित होती है और इससे सभ्यतागत भौगोलिक स्थान जीने के लायक बनते हैं।

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