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अनुच्छेद 370 पर ‘फिर से सोचने’ का विचार

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निर्णय लेने की प्रक्रिया में पूर्वाग्रह आम तौर पर पहली बार विचार करने के दौरान आते हैं। इसमें तार्किक सोच नहीं आती। कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने पर जनता दल यूनाइटेड जैसी कुछ छोटी पार्टियां हैं जिन्होंने फिर से विचार करके केंद्र सरकार के निर्णय का समर्थन किया है। कांग्रेस पार्टी के भी कुछ लोगों ने ऐसा ही किया है। केंद्र सरकार की विरोधी होने का दावा करने वाली बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी ने भी दूसरी बार विचार करके इस मसले पर केंद्र सरकार का समर्थन किया है।



इस निर्णय के इन नए समर्थकों ने दूसरी बार विचार करने के बाद अपनी राय बदली है। ये लोग पहले कश्मीर के विशेष प्रावधानों का समर्थन करते थे। इन नए समर्थकों की सोच में आए बदलाव से आत्म-संदेह और आत्म-सुधार का तत्व भी है। ये समर्थक ऐसा महसूस कर सकते हैं कि उनसे गलती हो ही नहीं सकती। इन नए समर्थकों में एक बात समान है। इन सभी को पहली बार में लगा कि कश्मीर के लिए विशेष प्रावधानों का समर्थन करना एक गलती है और दूसरी बार इस पर विचार करने पर इन्हें लगा कि इस गलती को सुधारना चाहिए। यहां एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या अनुच्छेद 370 के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों का हटाने में कुछ गलत नहीं है? आत्म-सुधार की प्रक्रिया में लिए गए ऐसे निर्णय की नैतिक ताकत क्या है?



दूसरी बार विचार करने के बाद इन नए समर्थकों ने जो निर्णय लिए हैं उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए. उम्मीद की जा रही थी कि ये पार्टियां सरकार को बताएंगी कि उसके निर्णय से न सिर्फ पर्यटकों पर अमरनाथ यात्रा पर गए श्रद्धालुओं के लिए दिक्कतें पैदा हो सकती हैं बल्कि घाटी में रहने वाले लोगों की भी बुरी स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, जो लोग इस निर्णय का समर्थन कर रहे हैं उनके पास भी मानवतावादी तर्क हैं। इन स्थितियों में उम्मीद की जाती है कि पार्टियां और लोग भी व्यक्तिगत तौर पर राजनीतिक निर्णयों में नैतिकता वाला रुख अपनाएं। इसका मतलब यह हुआ कि जब सरकार अनुच्छेद 370 को हटाने जैसा बड़ा निर्णय लेती है तो सुरक्षा की बात सर्वोपरी होनी चाहिए।



हम एक ऐसी व्यावहारिक राजनीति के दौर में हैं जहां पार्टियों को मुश्किल में पड़े जिन वर्गों के लिए खड़ा होना था, वे खड़ी नहीं हो पा रही हैं। ये पार्टियां अपने राजनीतिक निर्णयों को ठीक से समझ नहीं पा रही हैं। इसलिए ये वाजिब लोकतांत्रिक आंकाक्षाओं की संवैधानिक रक्षा नहीं सुनिश्चित कर पा रही हैं। अभी की राजनीति में ये छोटी पार्टियां दुर्भाग्य से अधिक अस्थिरता दिखा रही हैं और इस वजह से देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मुश्किलों का सामना कर रहे वर्गों के लिए खड़ा नहीं हो पा रही हैं।



ये पार्टियां दावा करती हैं कि लोकतांत्रिक उपेक्षा झेलने वाले समूहों के लिए ये काम करती हैं। लेकिन ये वंचित वर्ग की आकांक्षाओं को समझने में नाकाम रही हैं। ये पार्टियां फिर से विचार करने की प्रक्रिया में ये समझ नहीं पा रही हैं कि उनकी और वंचित वर्गों की आवाज को हासिल करके ही ये सरकार मजबूत बनी है। दोबार विचार करने के बाद यह समझ में आना चाहिए कि मजबूत सरकार और मातहत पार्टियों एवं नेताओं के बीच किस तरह का तार्किक संबंध है।



दूसरी बार ठीक से विचार तब होगा जब सही ढंग से राजनीतिक निर्णयों को परखा जाए। इससे पार्टियां और जनप्रतिनिधि सरकार को लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि अपने पहले के विचार को सही ढंग से चुनौती दी जाए। यह मानकर चलने से सही ढंग से दोबार विचार नहीं हो पाता कि हमसे कोई गलती ही नहीं हो सकती। यह प्रक्रिया सामाजिक-राजनीतिक सुधार के लिए जरूरी है। ताकि लोकतांत्रिक संविधान का शासन सुनिश्चित हो सके।

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