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लोकतंत्र के छोटे स्वर

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लोकतंत्र के छोटे स्वरों के पक्ष में जो बात की जा रही है, उसे तीन वजहों से गलत कहा जा सकता है। पहली बात तो यह कि कई लोग छोटे स्वरों के पक्ष में की जा रही बात को आधुनिक लोकतंत्र के अनुकूल नहीं मानते हैं। क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र में सभी को बराबरी का अधिकार दिया जाता है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। दूसरी बात यह कि सैद्धांतिक तौर पर सरकार के बारे में माना जाता है कि वह देश के हर नागरिक के लिए बोलती है। अगर संवैधानिक स्थिति यह है तो फिर बड़े और छोटे स्वरों की बात लोकतंत्र में क्यों होनी चाहिए? अगर दूसरी बात सही है तो सत्ताधारी पार्टी को देश के सभी लोगों की बात करनी चाहिए। उनकी भी जिन्होंने उसके पक्ष में वोट नहीं किया है। इसे बड़े और छोटे स्वरों के बीच की दूरी को खत्म करने वाला होना चाहिए। जब विपक्षी दलों और सामाजिक आंदोलन खुद को छोटा स्वर मानने लगें तो इसमें ऐसी बात का कोई मतलब नहीं होना चाहिए जो विपक्षी की बात से अलग हो। इसके बावजूद हम स्वतंत्र आवाजों को भारतीय लोकतंत्र में देखते हैं।



लोकतंत्र में यह वादा किया जाता है कि बराबर आवाजों को सशक्त करने का काम इसमें होता है। लेकिन हाशिये पर पड़े लोगों को की आवाज लोकतंत्र में अपरिहार्य है। आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और मजदूरों की आवाज अपेक्षाकृत छोटी है। हम अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में न्याय, बराबरी और सम्मान की कराह लगाते हुए इन आवाजों को अक्सर सुनते हैं। इन आवाजों को कई बार सनक से भरा भी बताया जाता है। लेकिन ये आवाजें उठती हैं बहुसंख्यक आबादी और सरकारों की नाकामी से। इन्हें इन आवाजों को सुनना चाहिए।



हमें संवेदना के साथ यह समझना चाहिए कि ये आवाजें लोकतंत्र को नीचा दिखाने के लिए नहीं उठती हैं बल्कि अपनी त्रासदी बताने के लिए सामने आती हैं। वे लोकतंत्र को संवेदनशील बनाने की कोशिश करते हैं। इन लोगों को लोकतंत्र और सरकार के लिए खतरा मानना गलती होगी।  ये लोग हिंसा, उपेक्षा और जातिवाद के शिकार हैं। ये लोग सवाल यह पूछते हैं कि स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और बाजार की नाकामी की वजह से क्यों पीछे छोड़ दिए गए। ये लोग अपनी बात बहुसंख्यक आबादी और सरकार के सामने रखना चाहते हैं। ये मानते हैं कि हर व्यक्ति में मानवता के लिए जगह अब भी बची हुई है चाहे वह हठी लोग ही क्यों न हों।



इसी तरह छोटे स्वर अपनी ‘कर्कशता’ में भी तार्किक लगते हैं। खास तौर पर उस संदर्भ में जब सरकारें आंतरिक सुधार के लिए कुछ ऐसी आवाजों को खुद उभारती हैं। या फिर सरकार कई बार मजबूत आवाजों को सुनने का भी काम करती है। जैसे हाल ही में आरक्षण के मसले पर किया गया। नैतिकता का तकाजा यह है कि सरकारों को उन आवाजों पर ध्यान देना चाहिए जो लगातार कमजोर होती गई हैं। इन छोटे स्वरों को सुनने में मुख्य विपक्षी दल भी नाकाम रही है। विपक्षी पार्टियां छोटे स्वरों के समान मुद्दों पर एकजुट नहीं रही हैं। इन दलों ने सत्ताधारी दल से अलग राजनीतिक विकल्प बनने की कोशिश की है न कि वैकल्पिक राजनीति करने की। वैकल्पिक राजनीति में छोटे स्वरों को लगातार मजबूती देने का काम किया जाता है। विपक्षी ताकतों को न सिर्फ इन स्वरों के साथ खड़ा रहना चाहिए बल्कि इन आवाजों को और आगे बढ़ाने की दिशा में भी काम करना चाहिए। 



जो लोग अपनी हर दिन खराब होती स्थिति से रोज संघर्ष कर रहे हैं, उन पर वैकल्पिक राजनीति का असर पड़ता है। इसमें छोटे स्वरों को आगे बढ़ाने वाले जनप्रतिनिधि होते हैं न कि एक दल से दूसरे दल में जाने वाले नेता। उनके लिए विधायकों का पलायन कोई मतलब नहीं रखता। मतदान पेटी के जरिए उनकी जिस राजनीतिक आवाज को अभिव्यक्ति मिलती है, उसका अपने उत्पाद पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। आजकल इसमें ‘अमीर’ निकलते हैं जिनमें सामाजिक और लैंगिक फर्क नहीं है। वैकल्पिक राजनीति दल-बदल की राजनीति को छोटे स्वरों के लिए निष्प्रभावी कर सकती है और इसे अंततः सामूहिक लोकतांत्रिक आवाज में मिलना होगा।



- गोपाल गुरू

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