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प्रजनन दर में कमी और जनसांख्यिकीय लाभ

जनसांख्यिकीय लाभ का उपयोग करने के लिए एक ठोस नीति की आवश्यकता है 

 

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जनसांख्यिकीय बदलावों के दो आयाम हैं। इनमें एक प्रजनन से संबंधित है और दूसरा मृत्यु से। किसी भी आबादी की जनसांख्यिकीय लाभ सुनिश्चित करने में प्रजनन संबंधित आयाम की मुख्य भूमिका होती है। प्रजनन दर में कमी आने से हाल के दशकों में भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर धीमी पड़ी है। आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि कम होने वाली है और कामकाजी लोगों की संख्या बढ़ने वाली है। इसका असर नीतियों पर होगा। जिन राज्यों में प्रजनन दर अधिक थी, वहां भी इसमें गिरावट दर्ज की गई है। 2017 में देश के 22 प्रमुख राज्यों में यह दर 2.2 प्रति महिला थी। असंतुलित लैंगिक अनुपात की वजह से अब भी यह आबादी को स्थिर बनाए रखने वाले 2.1 की दर से अधिक है। हालांकि, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में इसमें काफी विविधता है। प्रजनन दर में आई कमी की वजह आवाजाही में बढ़ोतरी, शादी में देरी, उच्च शिक्षा और महिलाओं की बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता है।



सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस के 2017 के आंकड़े बताते हैं कि इस बारे में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कई विपरीत स्थितियां दिखती हैं। हर आयु वर्ग में प्रजनन दर में कमी आई है। लेकिन शहरी क्षेत्र में अधिक आयु वर्ग की महिलाओं में इसमें बढ़ोतरी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में 35 साल से अधिक उम्र की महिलाओं की प्रजनन दर में कमी आई है। यह भी पता चला है कि प्रजनन दर कम होने में शिक्षा की भी अहम भूमिका रही है। मोटे तौर पर शहरी क्षेत्र में शिक्षित महिलाओं में प्रजनन दर कम है। लेकिन 30 साल से अधिक उम्र की शिक्षित महिलाओं में यह दर अधिक है। जबकि इस आयु वर्ग की कम शिक्षित महिलाओं में यह दर कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि बेहतर शिक्षित महिलाएं शादी और बच्चा पैदा करने के फैसलों को टालने में सक्षम होती हैं। साथ ही उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं भी मिल पाती हैं। शहरी क्षेत्र में इस दर में अपेक्षा से अधिक कमी आ रही है। 2017 में शहरी क्षेत्रों की प्रजनन दर घटते हुए 1.7 पर आ गई। बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को छोड़कर सभी राज्यों में यह दर 2.1 फीसदी से कम या इसके बराबर थी। दस राज्यों के ग्रामीण इलाकों में भी प्रजनन दर 2 से कम है। 



आबादी के मानक बताते हैं कि जनसांख्यिकीय बदलाव भारत में एक समान नहीं रहे हैं। एक तरफ जहां आबादी में बढ़ोतरी धीमी हो रही है तो दूसरी तरफ कामकाजी लोगों की संख्या बढ़ रही है। यह जनसांख्यिकीय लाभ की स्थिति है। इसका मतलब यह हुआ कि कामकाजी लोगों में हो रही बढ़ोतरी जनसंख्या वृद्धि से अधिक है। आम तौर पर जनसांख्यिकीय लाभ की स्थिति 40 से 50 साल तक चलती है और इससे फायदा तब ही होता है जब इसका सही ढंग से इस्तेमाल हो। ऐसा नहीं होने पर यह बोझ में तब्दील हो सकता है। भारत में इस मामले में काफी विविधता है, इसलिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग क्षेत्रों में इससे लाभ की स्थिति बनेगी। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक दक्षिण और पश्चिमी हिस्से में अधिक उम्र वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है इसलिए जनसांख्यिकीय बदलावों का लाभ लेने के लिए पांच-छह साल का वक्त ही उपलब्ध है। वहीं कुछ राज्यों के पास 10 से 15 साल तक का अवसर है। अधिक प्रजनन दर वाले राज्यों में यह अवसर अधिक है। इसलिए भारत के पास इसका फायदा उठाने के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय उपलब्ध है।



निर्भरता अनुपात में भी इस वजह से सुधार हो रहा है। क्योंकि यह माना जाता है कि कामकाजी लोगों की संख्या में बढ़ोतरी से विकास दर को गति मिलती है। लेकिन क्या नीतिनिर्धारकों की ओर से इस स्थिति का लाभ लेने के लिए ठोस नीतियां बनाई जा रही हैं? इसका लाभ तब ही उठाया जा सकता है जब बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल विकास में पर्याप्त निवेश हो। ताकि कामकाजी लोग सक्षम बन सकें। अगर काम करने वाले लोगों के पास पर्याप्त शिक्षा और कौशल होगा तो वे अधिक उत्पादक साबित होंगे। बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी के साथ 45 साल में सबसे अधिक है। इससे पता चलता है कि रोजगार उपलब्ध नहीं हैं। कामकाजी आबादी को रोजगार नहीं मिल पाना दिखाता है कि जनसांख्यिकीय लाभ लेने के लिए उनमें स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि में कमी को दूर करने का काम ठीक से नहीं किया गया है।

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