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ब्रिक्स में एकजुटता की कमी

क्या ब्रिक्स एक अस्पष्ट भूआर्थिक अवधारणा पर काम करने के लिए एक बहुचर्चित संक्षिप्त नाम भर है?

 

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28 जुलाई, 2019 को रियो डि जेनेरियो में ब्रिक्स के मंत्रिमंडल स्तर की बैठक हुई। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की सदस्यता वाले ब्रिक्स के नवंबर में होने वाले 11वें शिखर सम्मेलन के लिए एजेंडा तय करने की खातिर यह बैठक हुई। वेनेजुएला संकट को लेकर सदस्यों में मतभेद के साथ यह बैठक शुरू हुई। हालांकि, मतभेदों के बावजूद इस समूह के सदस्यों के ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आतंकवाद जैसे विषयों पर शुरू से संवाद की जरूरत पर जोर देना बरकरार रखा है। इसके बावजूद यह देखा जाना है कि क्या ब्रिक्स उम्मीदों पर खरा उतर सकने वाली संस्था के तौर पर विकसित हो पाएगा.



दुनिया की सबसे प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का यह समूह है। लेकिन हमेशा से इसकी संभावनाओं को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना रहता है। ब्राजील के राष्ट्रपति जेर बोलसोनारो की विदेश नीति में आए बदलावों की वजह से इस बार अनिश्चितता दिख रही है। पिछले डेढ़ दशक से ब्राजील की विदेश नीति बहुपक्षीय दुनिया को ध्यान में रखकर चलती रही है। बोलसोनारो के पहले के राष्ट्रपति दक्षिण-दक्षिण सहयोग बढ़ाने की बात इसी आधार पर करते आए हैं। लेकिन अब इस देश ने अपनी नई विदेश नीति में बहुपक्षीय दुनिया की बात को दरकिनार करते हुए पश्चिमी देशों और खास तौर पर अमेरिका से विशेषाधिकार वाले रिश्तों को तरजीह देना शुरू कर दिया है। वह चाहे पलायन पर हुई वैश्विक समझौते से बाहर निकलने का मसला हो या फिर चीन के साथ कूटनीतिक संबंधों में अचानक किए गए बदलावों का। वेनेजुएला में निकोलस माडुरो का तख्तापलट करने में अमेरिकी राजनीतिक और सैन्य हस्तक्षेपों पर निर्भरता से भी यह पता चलता है कि ब्राजील ब्रिक्स की एक कमजोर कड़ी बन गया है।



2008-09 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद अमेरिका की ओर से लगातार यह बात चलाई जा रही है कि आर्थिक स्तर पर अब ब्रिक्स का कोई मतलब नहीं है। इसके लिए ब्रिक्स के सदस्य देशों की जीडीपी में आ रही गिरावट के आंकड़ों को आधार बनाया जाता है। चीन की जीडीपी दर दोहरे अंकों से कम होती हुई सात फीसदी और इससे भी कम पर आ गई है। संक्षिप्त नाम ब्रिक्स का ईजाद करने वाले गोल्डमैन सैक्स ने कहा था कि 21वीं सदी में वैश्विक आर्थिक विकास के ईंजन ये देश ही होंगे। 2015 में इसी संस्था ने ब्रिक्स देशों के लिए बनाए गए कोष को सामान्य उभरते हुए बाजारों का कोष इसलिए घोषित कर दिया क्योंकि 2010 में उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद इसमें 88 फीसदी कमी आई। पारंपरिक वैश्विक गवर्नेंस ढांचे में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं होने की बात करते हुए ब्रिक्स के सदस्य देशों ने 2014 में न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना की थी।



अगर कोई यह कहता है कि समान विचारधारा, राजनीतिक ढांचा या संस्कृति के बजाए वैश्विक गवर्नेंस ढांचे से असंतोष की वजह से ब्रिक्स खड़ा हुआ है तो इसका अस्तित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि यह असंतोष कब तक बना रहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिका से ब्राजील की बढ़ती नजदीकी भी ब्रिक्स के लिए उसी तरह से खतरनाक है जिस तरह से रूस का यह कहना कि वह भूराजनीति में संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका को स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। दोनों ही स्थितियों में नीतियां तुष्टिकरण के लिए बनेंगी। इससे ब्रिक्स और एनडीबी जैसी इसकी संस्थाओं की स्वायत्ता प्रभावित होगी।



इसी तरह से ब्रिक्स के अंदर आर्थिक मसलों पर बढ़ती दूरी की अनदेखी भी ठीक नहीं है। सदस्यों की बीच आर्थिक अंतर की वजह से ब्रिक्स के संस्थानों में अपने प्रतिनिधित्व को लेकर आपस में असंतोष पैदा होने की काफी संभावना है। उदाहरण के लिए चीन ने एनडीबी के 100 अरब डाॅलर के आपात रिजर्व कोष में 40 फीसदी योगदान अकेले देने की बात कही है। ऐसा करके चीन भविष्य में बैंक के कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। इसकी कोशिश ये भी हो सकती है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच और विकासशील जगत में युआन में व्यापार को गति मिले।



एक समूह के तौर पर ब्रिक्स में इस तरह की निहित महत्वकांक्षाओं की वजह से क्या हम ये नहीं कह सकते हैं कि ब्रिक्स की अवधारणा एक संक्षिप्त नाम में उलझकर रह गई है और इससे ‘बहुपक्षीय’ विश्व की अवधारणा आगे बढ़ते नहीं दिख रही है?

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