ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

जीरो बजट खेती की मृगतृष्णा

क्या ‘जीरो बजट खेती’ की जोर-शोर से बात करके सरकार शासन संबंधित खामियों को छिपाने का काम कर रही है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

मराठी कृषि विज्ञानी सुभाष पालेकर को 2016 में पदम श्री मिलने के बाद जीरो बजट प्राकृतिक खेती चर्चा में आया। अधिक वाणिज्यिक लागत वाली खेती और इससे उपजने वाली समस्याओं को देखते हुए कई लोगों ने प्राकृतिक खेती को समाधान के तौर पर देखा। पहली बात तो यह कही गई कि बीज, खाद और रसायनों की खरीद बंद करने से उत्पादन लागत में काफी कमी आएगी। दूसरी बात यह कही गई कि ये खर्चे कम होने से कर्ज पर किसानों की निर्भरता कम होगी और वे कर्ज के दुष्चक्र से निकल पाएंगे। इन्हीं बातों को आधार पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने की बात कर रही है। आर्थिक समीक्षा 2018-19 और बजट 2019 में यह दिखता है। लेकिन क्या कुछ सच्चाइयों को पीछे छोड़ देना आसान होगा?



खबरों के मुताबिक जब पालेकर को 2016 में सम्मान मिला तब तक उनके प्रयोग के तकरीबन एक दशक हो गए थे। इसके बारे में कुछ रिपोर्ट और पालेकर की किताब के अलावा इसके आर्थिक आयामों पर कोई भी स्वतंत्र और समग्र अध्ययन सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं हैं। 81 देशों के 182 किसान संगठनों के गठजोड़ ला विया कैंपेसिना यानी एलवीसी ने 2016 में एक केस स्टडी किया था। इसमें बताया गया कि कर्नाटक में पालेकर के साथ जो किसान काम कर रहे हैं, वे मझोले किसान हैं। इससे इस पद्धति की समावेशिता का प्रश्न स्पष्ट नहीं होता है। वहीं इसे बड़े पैमाने पर ले जाने और सतत बनाने पर भी सवाल हैं। इसी रिपोर्ट में जीरो बजट खेती वाले उत्पादों को बेचने की दिक्कतों का भी जिक्र है। कुछ मीडिया रिपोर्ट में यह बात भी आई है कि इस पद्धति से खेती करने वाले कई किसान पारंपरिक अधिक लागत वाली खेती पर अधिक मुनाफा हासिल करने के लिए लौट गए।



अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस पद्धति का लाभ छोटे किसान कैसे उठा पाएंगे। तो फिर सरकार इसके जरिए 2020 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात कैसे कर रही है? अगर इस तरह की खेती में मझोले किसान शामिल हैं तो इसे आगे बढ़ाने की अपनी अलग राजनीति से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक तौर पर देखा गया है कि मझोले किसानों ने राजनीतिक दलों के चुनावी जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाई है। खास तौर पर उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र में। दबाव की इस राजनीति में छोटे किसानों, सीमांत किसानों और कृषि मजदूरों के नहीं शामिल होने से कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव नहीं हो पाए। इन परिस्थितियों में सरकारी नीतियां हमेशा ‘शांत करने वाले’ रहे हैं न कि ‘बदलाव लाने वाले’ रहे हैं।



याद रहे कि पालेकर की इस पद्धति को 2016 में तब मान्यता मिली जब दिसंबर, 2015 में जमीन अधिग्रहण कानून, 2013 में से अनिवार्य सहमति के प्रावधान और सामाजिक प्रभाव को हटाने के लिए आए अध्यादेश की वजह से बड़ा राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन हुआ था। जमीन के ‘स्वामित्व’ का मुद्दा अभी अधर में लटका हुआ है, ऐसे में कृषि तकनीक में बदलाव से किसानों का क्या भला होने वाला है? जीरो बजट खेती का मतलब यह नहीं है कि किसानों की कोई लागत ही नहीं लगेगी। इसका मतलब यह है कि उत्पादन लागत को एक साथ दो फसलें उगाकर निकाला जा सकता है। एक साथ एक से अधिक फसल उपजाने को बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि एक फसल को बढ़ावा देने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो रहा। इससे स्वघोषित ‘किसानपरस्त’ सरकार के बारे में काफी कुछ पता चलता है।



जीरो बजट खेती के जरिए सरकार पारंपरिक तरीकों पर लौटने की बात करके सरकार राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारना चाहती है। ऐसा करने से जो माहौल बनता है उसमें लोग सरकार से कठिन सवाल नहीं पूछते। ऐसा करके सरकार शासन संबंधित अपनी खामियों को छिपाने का काम कर रही है। अगर जीरो बजट खेती से लागत कम होती तो फिर कभी इस मामले में आगे रहने वाला आंध्र प्रदेश पर्यावरण के अनुकूल जीरो बजट खेती योजना पर तकरीबन 17,000 करोड़ रुपये क्यों खर्च कर रहा है? वैश्विक वित्तीय संस्थाओं, कृषि कंपनियों और पर्यावरण बाॅन्ड के जरिए आने वाला यह पैसा इस नीति के अंतर्विरोधों को जाहिर करता है। इससे यह शंका भी पैदा होती है कि जीरो बजट खेती के तौर पर नव-उदारवादी सरकार को एक नया औजार मिल गया है जिसके जरिए वह काॅरपोरेट जगत को फायदा पहुंचाएगी और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर अपने खर्च कम करेगी।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top