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लोकतंत्र का आदर्श नमूना

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भारत के औपचारिक और सांस्थानिक राजनीति में सत्ताधारी दल या सत्ता में आने की संभावना वाले दल में दूसरे दल के लोग शामिल होते आए हैं। यह नियमित तौर पर चलता रहता है। इसका लोकतंत्र की नैतिक गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है। इस तरह की गुणवत्ता आदर्श संवैधानिक नमूनों पर निर्भर करती है। इसमें यह बात निहित है कि दूसरे दल में शामिल होने से पहले उन्होंने अपने मतदाताओं से कितनी रायशुमारी की है। लेकिन यह बात इस पर निर्भर करती है कि वे उन लोगों की आकांक्षाओं के लिए कितना खड़े होते हैं जिन्होंने उन्हें चुना है। यही प्रतिबद्धता लोकतंत्र के एक आदर्श नमूने का निर्माण करती है। नैतिक अपेक्षाएं उन जन प्रतिनिधियों से होगी जो नैतिक मूल्यों को तरजीह देते हैं और लोभ में डालने वाली बातों से दूर रहते हैं। दल-बदल ने इन सभी चीजों को गड़बड़ कर दिया है।



दल-बदल नैतिक तौर पर आपत्तिजनक है। क्योंकि ऐसा करने से जनादेश का अपमान होता है। इसमें दल-बदल करने वाले और वे जिस पार्टी में शामिल होते हैं, दोनों कसूरवार हैं। व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर किए जाने वाले दल-बदल से आत्मसम्मान का नुकसान होता है। व्यावहारिक राजनीति की बात करके दल-बदल करने वाले नेताओं में प्रतिबद्धता की कमी होती है। प्रतिबद्धता ही एक नेता को दल-बदल को बढ़ावा देने वाली पार्टी की कोशिशों को बेअसर करने की ताकत देती है।



इस तरह की प्रतिबद्धता को आदर्श उदाहरण कहा जा सकता है। अपनी सीमाओं और दल-बदल को बढ़ावा देने वाली पार्टी की सीमाओं से आगे बढ़ जाने से लोकतंत्र की गुणवत्ता बढ़ती है। इन सीमाओं से पार जाने के लिए नैतिक पहल जरूरी होती है। इन सीमाओं से पार पाने से पार्टी भी लोक संस्था के तौर पर गरिमा हासिल करती है। जो लोग दल-बदल में शामिल हैं, वे वैचारिक वजहों से ऐसा नहीं कर रहे हैं। इसमें एक पार्टी अपना प्रभुत्व और श्रेष्ठता साबित करने के काम में लगी है। ऐसी पार्टी दल-बदल को एक औजार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। दल-बदल के जरिए दूसरे दलों के नेताओं को आत्मसात करने का काम चल रहा है। ऐसा करने वाले लोग अपने आत्मसम्मान से समझौता कर रहे हैं। एक ऐसे बराबरी वाले राजनीतिक परिदृश्य की जरूरत है जहां आत्मसम्मान वाले आदर्श उदाहरण पेश किए जा सकें। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि बराबरी वाला राजनीतिक परिदृश्य सुनिश्चित हो। इसका प्रावधान देश के संविधान ने पहले से किया हुआ है।



दल-बदल कराने वाली पार्टियों की सीमा दूसरे दलों के नेताओं को अपने दल में शामिल कराने तक सीमित है। वे दल-बदल करने वालों को कोई नैतिक ताकत नहीं देते। ऐसी पार्टियां दल-बदल सिर्फ इसलिए नहीं कराती हैं कि वे दूसरे दल से आने वाले लोगों का असली महत्व समझती हैं बल्कि उनके लिए आने वाले व्यक्ति की उपयोगिता होती है। हमने अब तक ऐसा दल-बदल नहीं देखा जहां दूसरे दल में आने वाला व्यक्ति अभिव्यक्ति की आजादी को हासिल करता दिख रहा हो। दल-बदल की वजह से नेता एक उत्पाद में बदल जा रहे हैं। वे दल-बदल की वस्तु बन जा रहे हैं और उनकी स्वायत्त पहचान नहीं रह रही है। वे अपने लिए, अपनी पार्टी के लिए और राजव्यवस्था के लिए उच्च नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में नहीं सक्षम हैं। दल-बदल करने वाले एक ऐसा उत्पाद बन जा रहे हैं जो सत्ताधारी या भविष्य की सत्ताधारी पार्टी में शामिल होने के लिए उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में दल-बदल करने वाले एक खास श्रेणी के उत्पाद बन जाते हैं। इनमें जाति, विचारधारा, भाषा और क्षेत्र आदि का महत्व नहीं रहता। ऐसे में प्रभुत्व वाली पार्टी एक श्रेणी के उत्पादों को दूसरे उत्पादों से बदलने की स्थिति में रहती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि अगर लोकतंत्र की नैतिक गुणवत्ता आदर्श नमूनों के आधार पर नहीं बल्कि विभाजनयोग्य नमूनों के उत्पादन से तय हो।



-गोपाल गुरू

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