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अंतर्विरोधों से भरा आरक्षण

उच्च जाति के आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों को दस फीसदी आरक्षण देने सामाजिक न्याय के सिद्धांत का नैतिक आधार कमजोर पड़ा है
 

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उच्च जातियों के आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों को रोजगार और शिक्षा में दस फीसदी आरक्षण देने का कानून लोकसभा और राज्यसभा से पास हो गया. केंद्र सरकार ने यह कदम 2019 के लोकसभा चुनावों के संदर्भ में उठाया है. इसलिए ज्यादातर राजनीतिक दल इसके विरोध का सियासी जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं. हालांकि, कुछ दलों ने इस कानून को बनाने के लिए अपनाई प्रक्रिया की आलोचना की है. केंद्र सरकार की यह कहकर आलोचना की गई कि इस विधेयक पर विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला. इसके अलावा सरकार ने आरक्षण देने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई, उसकी आलोचना भी की गई. बगैर किसी ठोस आधार के आखिर कैसे सरकार 10 फीसदी के आंकड़े पर पहुंची? अभी इस कानून को न्यायपालिका की कसौटी से पार पाना है लेकिन इससे होने वाले संभावित फायदों पर चर्चा करना प्रासंगिक होगा.
अगर अदालत इस कानून को मंजूरी देती है और इसे सरकार लागू करती है तो ऐसी उम्मीद है कि इससे उच्च जातियों के जरूरतमंद वर्गों को फायदा होगा. एक उम्मीद यह भी है कि इससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा. पहले लोग ये सर्टिफिकेट बनाने का आरक्षण का लाभ लेने की कोशिश करते थे. वहीं आरक्षण का लाभ लेने के लिए सवर्ण जाति के लोगों की वह इच्छा भी खत्म होगी जिसके जरिए वे एससी या एसटी परिवार में अपनाए जाने की इच्छा रखते थे. अब दस फीसदी आरक्षण से सवर्ण जातियों के लोग अपनी जातिगत पहचानों को बचाए रखते हुए आरक्षण का लाभ ले सकते हैं. इससे उन्हें यह लाभ भी होगा कि वे अदालतों में नकली जाति प्रमाण पत्र देने की वजह से जलील होने से बचेंगे. इस 10 फीसदी आरक्षण से अगड़ी जातियों के लोगों को भी एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग की तरह आरक्षण की इच्छा और बढ़ेगी.
 
इस दस फीसदी आरक्षण की वजह से अब उच्च जातियों के लोग यह नहीं बोल पाएंगे कि आरक्षण की वजह से देश का नुकसान हो रहा है. अब तक ये लोग आरक्षण को इसके लिए जिम्मेदार मानते थे. आरक्षण की आलोचना की कोई भी कोशिश करने से अब इन जातियों के लोगों को खुद नुकसान होगा.
 
इन फायदों की वजह से इस कानून की एक प्रमुख समस्या की अनदेखी का खतरा पैदा होता है. दस फीसदी आरक्षण के लिए उन पैमानों को आधार नहीं बनाया गया जिनके आधार पर अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण दिया गया था. सिर्फ आर्थिक आधार पर यह आरक्षण दिया जा रहा है. लाभार्थियों को यह आरक्षण बगैर छुआछूत का शिकार हुए मिलेगा. जबकि अनुसूचित जाति के लोगों को लंबे समय तक यह झेलना पड़ेगा. इसे सभ्यतागत हिंसा माना जाता है जिसे सदियों तक इन वर्गों के लोगों ने झेला. इन उच्च जातियों के लोगों ने गरीबी झेली है लेकिन आर्थिक आधार का इस्तेमाल करके उन आधारों को कमजोर किया जा रहा है जिनके आधार पर अनुसूचित जातियों को आरक्षण मिला था. छुआछूत और सामाजिक अक्षमता को पहले मुख्य आधार माना गया था. छुआछूत संवैधानिक तौर पर खत्म किए जाने के बावजूद इन वर्गों का आरक्षण बरकरार रखा गया क्योंकि जमीनी स्तर पर अलग-अलग ढंग से यह जारी था.
 
यह बात उल्लेखनीय है कि अनुसूचित जातियों का आरक्षण जातिगत पूर्वाग्रहों से लड़ने में बेहद उपयोगी है. आरक्षण की व्यवस्था इसलिए की गई ताकि जातिगत पूर्वाग्रहों का असर नहीं रहे और इन वर्गों के लोगों को भी अवसर मिल सके. इसलिए सकारात्मक कदमों को जातिगत पूर्वाग्रहों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया. क्योंकि इनके जरिए सिर्फ अवसरों में समानता मिलती है न कि परिणामकारी समानता. इसलिए संविधान इन कदमों से आगे बढ़कर आरक्षण की बात करता है.
इस संदर्भ में नए दस फीसदी आरक्षण को देखा जाना चाहिए कि आखिर किस आधार पर यह आरक्षण सरकार ने दिया. वे क्या पूर्वाग्रह हैं जिनके आधार पर सरकार ने इसे अनिवार्य तौर पर लागू करने का निर्णय लिया? जाति आधारित पूर्वाग्रह तो निश्चित तौर पर इसकी वजह नहीं है.
 
छुआछूत में अन्याय का तत्व है. जबकि आर्थिक पिछड़ेपन में सवर्णों को रोजगार नहीं दे पाने की व्यवस्थागत नाकामी. अवसरों की कमी छुआछूत की वजह से नहीं है बल्कि इसके लिए सरकार और बाजार की रोजगार मुहैया कराने की नाकामी जिम्मेदार है. संविधान के कई अनुच्छेदों में अनुसूचित जातियों के लोगों के व्यापक पिछड़ेपन की बात करके आरक्षण की बात कही गई है. जबकि दस फीसदी का नया आरक्षण चुनिंदा पिछड़ेपन पर आधारित है.

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