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तटों का मनमाफिक इस्तेमाल

सीआरजेड, 2018 में पर्यावरण और मछुआरों के जीवनयापन की कीमत पर मुनाफे को प्राथमिकता दिया गया है
 

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कोस्टल रेगुलेशन जोन यानी सीआरजेड, 2018 अधिसूचना को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मंजूरी दे दी गई है. इसके तहत पहले के कुछ कठोर नियमों को हटा लिया गया है. पहले पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों में विकास गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता था. नई नीति के तहत सीआरजेड की सीमा और विकास प्रतिबंधित क्षेत्रों को घटाया गया है. इसके अलावा आबादी के हिसाब से तटीय इलाकों के वर्गीकरण में भी बदलाव किया गया है. रक्षा या जन उपयोग के लिए ‘रणनीतिक परियोजनाओं’ को विकसित करने के लिए सीआरजेड-1 के संवेदनशील इलाकों को भी नहीं छोड़ा गया है. एक सवाल यह भी उठता है कि नए नियमों से पर्यावरण और मछुआरों पर क्या असर पड़ने वाला है?
 
कमजोर तटीय इलाकों में वाणिज्यिक और औद्योगिक दखल की अनुमति देकर नई सीआरजेड नीति मानव और पर्यावरण के बीच के संतुलन को खराब करने का काम करेगी. इससे सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी बुरा असर पड़ेगा. साथ ही संसाधन आश्रित आबादी पर भी असर पड़ेगा. खास तौर से मछुआरों पर. वह भी ऐसे वक्त पर जब जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र स्तर बढ़ रहा हो और तटीय इलाकों का समुद्र के जरिए कटाव बढ़ गया हो. इससे तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों पर पहले से ही खतरा मंडरा रहा है. पश्चिमी तट और पूर्वी तट के क्षेत्र खास तौर पर जोखिम झेल रहे हैं. ऐसे में नए नियम किसकी चिंताओं का समाधान करते हैं?
 
वास्तविकता तो यह है कि नई नीति से केंद्र सरकार की सागरमाला परियोजना के क्रियान्वयन में सुविधा होगी. 8.5 अरब रुपये का वाणिज्यिक निवेश इस योजना के तहत भारत के तटीय इलाकों में होना है. इसके तहत बुनियादी ढांचा, रियल एस्टेट और पर्यटन को बढ़ावा देने की भी योजना है. नई नीति में कारोबारी घरानों को फायदा पहुंचाने की कोशिश स्पष्ट तौर पर दिख रही है. इसमें तटीय क्षेत्रों की पर्यावरण संबंधित चिंताओं और मछुआरों के जीवन यापन के प्रति चिंताओं की अनदेखी की गई है. 
मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय शहरों में शहरीकरण बढ़ रहा है. जमीन के इस्तेमाल में बदलाव आने के साथ तटीय क्षेत्रों में अतिक्रमण भी बढ़ रहा है. तटीय इलाकों में सड़कों का निर्माण बढ़ा है और इसके साथ ही प्रदूषण भी. अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि इन सबसे मछली पकड़ने में कमी आई है और इससे मछुआरों के रोजगार पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इस वजह से समाज में गैरबराबरी भी बढ़ रही है.
 
नई नीति में मछुआरों के पारंपरिक अधिकारों को नहीं माना गया है. इससे संसाधनों के इस्तेमाल में संघर्ष बढ़ेगा. बड़ी संख्या में मछुआरे हाशिये पर चले जाएंगे. क्योंकि कोई ऐसा कानून नहीं है जो तटीय इलाकों में उनके पारंपरिक अधिकारों को स्वीकार करता है. ऐसे में मछुआरों के संगठनों द्वारा विकास के नाम पर विस्थापन की जो बात की जा रही है, वह निराधार नहीं है. तटों के नजदीक बड़ी विकास परियोजनाओं को लगाने से भी सामुद्रिक जीवन पर नकारात्मक असर पड़ा है. इनकी वजह से भी हजारों मछुआरों का विस्थापन हुआ है. इनके लिए पुनर्वास की कोई नीति नहीं है. ऐसे में करोबारी घरानों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए एक मछुआरों के जीवनयापन पर संकट पैदा किया जा रहा है जो पहले भी असमान समाज की वजह से हाशिये पर जा चुके हैं.
 
राज्य सरकार ने मछुआरों के संगठनों की मांग पर पहले भी ध्यान नहीं दिया है. क्योंकि उसे सिर्फ सीआरजेड नियमों को लागू करना होता है. लेकिन नए नियमों के तहत गवर्नेंस से संबंधित दायित्वों का बंटवारा भी हुआ है. लेकिन ऐसा करने में मछुआरों के संगठनों जैसे नैशनल फिशवर्कर्स फोरम आदि से संवाद नहीं किया गया. इससे काॅरपोरेट जगत के हिसाब से नीतियां बनाने वाली राजनीति ने संसाधनों पर आश्रित लोगों के जीवनयापन का ध्यान नहीं रखा और न ही इसने तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय क्षमताओं का ध्यान रखा. दीर्घकालिक तौर पर देखा जाए तो इसकी भारी कीमत समाज को चुकानी होगी और इससे विकास की पूरी प्रक्रिया बाधित हो जाएगी.

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