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बेस्ट पर निजीकरण का खतरा

मुंबई में हुई बेस्ट बसों की हड़ताल से भारत के शहरी परिवहन व्यवस्था की खामियों का पता चलता है

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

8 से 17 जनवरी, 2019 तक मुंबई की सड़कों पर बृहन्नमुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई ऐंड ट्रांसपोर्ट यानी बेस्ट की बसें नहीं दिखीं. ये बसें इस शहर की एक पहचान हैं. हर रोज लाखों की संख्या में लोग इन बसों में यात्रा करते हैं. इन बसों की हड़ताल की वजह से लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. जिन क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन का दूसरा कोई साधन नहीं है, वहां के लोगों को काफी दिक्कतें हुईं. कई छात्र अपनी परीक्षा देने नहीं जा पा रहे थे.
 
बृहन्नमुंबई इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई ऐंड ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग वर्कर्स यूनियन की हड़ताल के दो पक्ष हैं. पहली बात तो यह कि पिछले कुछ समय का यह सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है. लोगों की सहानुभूति श्रमिकों के साथ रही. शिव सेना से संबद्ध यूनियन ने ध्यान भटकाने की कोशिश जरूर की लेकिन श्रमिक संयुक्त कार्य समिति के नेतृत्व में टिके रहे. उनके मांग सही होने के साथ-साथ उन्हें लोगों की सहानुभूति इसलिए मिली क्योंकि लोगों को लगा कि ये जन हित के लिए लड़ रहे हैं. दूसरी बात यह कि बाॅम्बे उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भले ही ये बसें सड़कों पर लौट आई हों लेकिन आम लोगों में यह धारणा बैठ गई है कि आने वाले समय में या तो इसका निजीकरण कर दिया जाएगा या फिर इसकी अनदेखी की जाएगी ताकि दूसरे परिवहन माध्यमों को फायदा मिले. इन दोनों में से कोई भी स्थिति मुंबई में रहने वाले लोगों के लिए ठीक नहीं होगी.
 
बेस्ट बसें मुंबई और इसके उपनगरों मीरा-भयंदर, नवी मुंबई और ठाणे में सेवाएं देते हैं. पिछले कुछ दशकों से बेस्ट की हालत बहुत खराब है. सरकारी सेवाओं पर निजी कंपनियों को तरजीह दी जा रही है. वैसे तो यह काम पूरे देश में चल रहा है लेकिन बेस्ट के मामले में यह मामला और गंभीर है. बेस्ट की डिपो की प्राइम जगहों की जमीन के प्लाॅट बेच दिए गए. मुनाफा नहीं होने की बात कहकर कई रूट पर बसें बंद कर दी गईं. कर्मचारियों की संख्या लगातार घटती गई. 
 
बेस्ट का उदाहरण यह बताता है कि हमारे यहां के शहरी नियोजन और गवर्नेंस में कितनी खामियां हैं. रूटों को रद्द करना और बुनियादी ढांचे में निवेश नहीं करने से नुकसान अधिक होता है. यह हर कोई जानता है कि विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन सरकारी मदद के बिना नहीं चल सकता. बेस्ट के अधिकारियों को भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आमदनी के वैकल्पिक स्रोत क्या हो सकते हैं. ताकि नुकसान भी कम हो और निवेश भी बढ़े. बेस्ट में काम करने वाले लोग यह मांग भी कर रहे हैं कि बेस्ट के बजट को बृहन्नमुंबई नगर निगम के बजट में मिला दिया जाए. यह एक महत्वपूर्ण मांग है. इस पर विचार होना चाहिए. 
 
लेकिन दूसरे भारतीय शहरों की तरह यहां भी सड़क परिवहन की योजनाओं में कार केंद्रीत परियोजनाओं पर ही ध्यान दिया जा रहा है. यात्रा करने वालों की संख्या में कमी की बात भी की जाती है. लेकिन इससे खराब नियोजन का संकेत मिलता है. यह कोई नहीं मान सकता है कि अधिकांश शहरी लोग रोज की आवाजाही के लिए जानबूझ कर निजी परिवहन माध्यमों को वरीयता दे रहे हैं. सड़कों पर बढ़ते जाम और पैदल यात्रियों की जगह न के बराबर बचने से भी दिक्कतें पैदा हुई हैं. वाहन उद्योग को काफी रियायत दी जा रही है. इससे यह माहौल बना है कि बसों में यात्रा करने में काफी वक्त लगता है. सिर्फ मुंबई में नहीं पूरे भारत में दोपहिया वाहनों पर निर्भरता बढ़ी है. इससे यातायात की व्यवस्था और चरमराई है. एक कुशल सार्वजनिक परविहन कभी भी निजी परिवहन से अच्छा होता है.
 
2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने बेस्ट के क्राॅस यूटिलिटी माॅडल को बरकरार रखने की योजना को खारिज कर दिया था. इसके बाद से फंड की कमी हो गई और निवेश भी कम हुआ. इसमें काम करने वालों लोगों की संख्या भी घटी. सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाएं भी कम की गईं. इसके बाद से बीएमसी ने दूसरी कंपनियों से बसें किराये पर लेने की वकालत की है. हालिया हड़ताल के दौरान बीएमसी अधिकारियों ने फिर से यह बात दोहराई और कहा कि आंशिक निजीकरण से ही बेस्ट को बचाया जा सकता है. लेकिन दूसरे शहरों के प्रयोगों को देखते हुए यह बेहतर विकल्प नहीं कहा जा सकता. निजी बसों के परिचालन में मुनाफा पर सबसे अधिक जोर होता है न कि यात्रा करने वालों की जरूरतों पर. निजी परिचालक अपने कर्मचारियों को भी काफी कम पैसे देते हैं और यात्री सुरक्षा को दरकिनार करते हुए काफी अधिक सवारी ढोते हैं.
बेस्ट की हड़ताल नीतिगत बदलावों की ओर ध्यान आकृष्ट करती है. कोई भी भारतीय शहर व्यापक सार्वजनिक परिवहन तंत्र के बिना ठीक से काम नहीं कर सकता. सरकार को भी कार केंद्रीत नीति से ध्यान हटाना होगा. लेकिन सबसे अहम है कि राज्य और स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक परिवहन को बेहतर करने के लिए जरूरी निवेश करने भर संसाधन हों ताकि यातायात संबंधित समस्याओं का समाधान हो सके. 
 
यह आसान कार्य नहीं है और इसके लिए यह जरूरी है कि नागरिक मंच और श्रमिक संगठनों की सहभागिता हो. साथ ही मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति हो. देश में शहरीकरण की गति को देखते हुए बेस्ट के उदाहरण से देश के दूसरे शहरों को भी सबक लेना चाहिए. इस हड़ताल ने यह दिखाने की कोशिश की है कि कैसे श्रमिकों के सामूहिक कार्यों से शहरों और शहरी जीवन के चरित्र को तय किया जा सकता है.

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