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नागवार न्याय

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भारत की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकारें दोनों आरक्षण के दायरे में विस्तार के काम में जुटी हुई हैं। इसके लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची से भी खिलवाड़ किया जा रहा है। इन सरकारों ने आरक्षण के विस्तार के लिए आर्थिक पिछड़ेपन को आधार बनाया है। लेकिन यह आधार इसलिए अपर्याप्त कहा जा सकता है क्योंकि इसमें आर्थिक आधार पर काफी अधिक पिछड़े समूह आरक्षण के दायरे में आने से वंचित हो रहे हैं। ऐसे में सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्यों यह फर्क 10 फीसदी और 13 फीसदी जातियों पर रुक जा रहा है? अगर इस बात को ही आधार बनाना है तो शुरुआत उन समूहों से होनी चाहिए जो आर्थिक तौर पर सबसे अधिक पिछड़े हुए हैं। ऐसे सवालों का जवाब नई आरक्षण व्यवस्था की राजनीति से मिलता है। इस राजनीति के मुताबिक मौजूदा सत्ताधारी पार्टी की चुनावी सफलता में अल्पसंख्यकों की कोई खास भूमिका नहीं होगी।
इसके अतिरिक्त नई आरक्षण नीति का एक और गड़बड़ आयाम है। आरक्षण के नए प्रावधान संविधान की ‘प्रगतिशील’ मूल्यों के भी खिलाफ है जिसकी परिकल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी। आरक्षण के संबंध में मूल संवैधानिक परिकल्पना यह थी कि इससे नियुक्तियों में अनुसूचित जाति के लोगों के प्रति पूर्वाग्रहों को नियंत्रित किया जा सकेगा। यही वजह है कि अमेरिका के उलट भारत ने आरक्षण को अपनाया न कि सकारात्मक कार्रवाई को। सकारात्मक कार्रवाई से हर हाल में सकारात्मक परिणामों की गारंटी नहीं दी जा सकती। आरक्षण की नई व्यवस्था में जाति आधार पूर्वाग्रह नियंत्रित हो जाएंगे क्योंकि चयन करने वाले और जिनका चयन होना है, दोनों एक ही सामाजिक वर्ग के होंगे। ऐसे में सवाल यह है कि चयन करने वाले और निराकार पैमाने अपनाएंगे या जाति के अंदर उपजातियों का पूर्वाग्रह काम करेगा।


इस तरह का आरक्षण देने वाली सरकारें और इसके लाभार्थी दोनों इसे समझने में नाकाम रह रहे हैं कि इसका लाभ सिर्फ सरकारी क्षेत्र में मिलेगा। इसका मतलब यह भी हुआ कि ये दोनों अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार कर रहे हैं कि बाजार और निजी क्षेत्र इस तरह के भेदभाव की वजहें हैं। इस तरह की नीति निजी क्षेत्र को इन आरक्षणवादियों के सवालों से बचा रही है और उन्हें सरकारी नौकरियों पर अतिनिर्भर बना रही है।

हालांकि, जाति के एक निश्चित परिप्रेक्ष्य में अगर सैद्धांतिक तौर पर कहें तो आरक्षण का दायरा बढ़ाने का एक फायदा भी है। इसके पीछे अगड़ी जातियों, गैर-दलित और गैर-पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में विकल्प देने की सोच काम कर रही है। हालांकि, इस तरह की सोच आंतरिक और बाहरी स्तर पर गैरसमावेशी हो सकती है। अगर आरक्षण प्रतिस्पर्धा की सोच से लागू होगा तो इसमें आंतरिक स्तर पर एक भेद पैदा होगा। यह सीमित स्तर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में हुआ है। इस बारे में पारंपरिक सोच यह कहती है कि इससे लोग जाति आधारित सोच से बाहर निकलकर एक व्यक्ति के तौर पर खुद को देखना शुरू कर सकेंगे। इससे एक व्यक्ति दूसरे से जाति के आधार पर प्रतिस्पर्धा नहीं करेगा बल्कि क्षमताओं के आधार पर वह मुकाबले में होगा। हालांकि, यह स्वतः नहीं होगा। आधुनिकता की चुनौतियों से नाकामी की स्थिति में जाति आधारित संसाधनों की भूमिका बनी रहेगी। इसे ‘आधुनिकता का दंभ’ कहा जा सकता है और इसमें व्यक्तिगता सफलता को आरक्षण के जरिए नियंत्रित नहीं किया जा सकता है।

वहीं दूसरे स्तर पर न्याय के इस विस्तार से आरक्षण के लाभार्थियों के प्रति जो एक तरह का सामाजिक भेदभाव था, वह खत्म होगा। अगड़ी जाति के लोग सामाजिक न्याय और दलित का इस्तेमाल एक-दूसरे के पर्यायवाची के तौर पर करते आए हैं। नए आरक्षण के पहले आरक्षणविरोधियों को ऐसा करते हुए देखा जा सकता था। अब यह उम्मीद की जा रही है कि नई आरक्षण व्यवस्था के लाभार्थी ज्यादा समावेशी और बराबरी वाला सामाजिक दृष्टि अपना पाएंगे। एक अवधारणा के तौर पर सामाजिक न्याय की समान रूप से प्रतिष्ठा बढ़ेगी। भविष्य में हम इसे सिर्फ दलितों और आदिवासियों के संदर्भ में ही नहीं देखेंगे। इस तरह का समतावादी रवैया इस अवधारणा के प्रति राहत लेकर आएगा और इससे तनावपूर्ण सामाजिक संबंधों में सुधार होगा।



 

Updated On : 23rd Jul, 2019

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