ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

दल-बदल का तर्क

दल-बदल से व्यक्ति हित तो सध सकते हैं लेकिन इससे लोकतांत्रिक चेतना को नुकसान पहुंचता है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

कांग्रेस ओर जनता दल सेकुलर के 15 विधायकों के इस्तीफे से कर्नाटक की गठबंधन सरकार के लिए संकट पैदा हो गया है। भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया जा रहा है कि इसके पीछे वही है और भाजपा खुद सत्ता में आने के लिए ऐसा कर रही है। हालांकि, हाल के दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो पता चलता है कि कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है, वह हमारे लोकतंत्र के नैतिक संकट का सिर्फ एक उदाहरण है।

जब से भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में वापस लौटा है तब से राजनीतिक ताकत को और मजबूत करने के लिए पूरी ताकत से काम हो रहा है। यह राज्यों में और राज्यसभा में दल-बदल के तौर पर दिख रहा है। बहुमत हासिल करने के लिए सत्ताधारी दल चुनावी जनादेश की अनदेखी कर रहा है। इसमें कोई यह तर्क दे सकता है कि ऐसा करने वाली भाजपा कोई अकेली पार्टी नहीं है। इस तरह के दल-बदल से भाजपा राज्यसभा में सामान्य बहुमत हासिल करके अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है। लेकिन अगर थोड़ा और गहराई से देखें तो ऐसा करके ‘विपक्ष मुक्त राजव्यवस्था’ बनाने की कोशिश की जा रही है। सत्ताधारी दल ने विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने उन्हें अपने दल में शामिल कराने की रणनीति में महारत हासिल कर ली है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि विपक्षी पार्टियां इन दबावों से क्यों नहीं निपट पा रही हैं? क्यों उनकी ओर से सत्ताधारी दल की जो आलोचनाएं हो रही हैं, उन्हें लोगों का समर्थन नहीं मिल रहा है?

चुने हुए प्रतिनिधि जिस तरह से अपनी दलगत निष्ठाएं बदल रहे हैं, उससे पता चलता है कि यह उस तरह का राजनीतिक दौर है जिसमें विचारधारा का कोई महत्व नहीं है। चुनावी राजनीति में यह स्वीकार्य हो गया है कि सत्ता हासिल करके पैसे कमाने हैं और कमाए हुए पैसे से सत्ता हासिल करना है। मुख्य विपक्षी पार्टियों ने भी ऐसा होने में योगदान दिया है। राजनीतिक दल एक राजनीतिक संगठन से अधिक हितों के नेटवर्क के तौर पर काम कर रहे हैं। ऐसे में खास वैचारिक एजेंडे के साथ काम कर रही भाजपा के लिए दूसरे दलों के नेताओं को अपने दल में लाना आसान हो जाता है। इन नेताओं में यह क्षमता नहीं है कि वे सत्ता से नजदीक रहे बगैर राजनीति कर सकें।

इससे आम लोगों में भी इस बात को लेकर उदासीनता पैदा हुई है कि उनके जनादेश का खरीद-फरोख्त किया जा रहा है। हालांकि, जब किसी पार्टी के खिलाफ लड़ने वाला कोई सांसद या विधायक वापस उसी पार्टी में चला जाता है तो जनता को ऐसे लोगों से जवाब मांगना चाहिए। कर्नाटक में जिस तरह से चुनाव के साल भर के अंदर इस्तीफा दिया गया, उस पर भी सवाल उठना चाहिए। क्योंकि यह तो सार्वजनिक जिम्मेदारियों से भागने जैसा है। ऐसे प्रतिनिधियों पर जनदबाव बनाने के लिए उनके निर्वाचन क्षेत्रों में लोगों को विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। जबकि हमने कई बार यह देखा है कि दल-बदल करने वाले नेता फिर से चुनाव जीत जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इस तरह के दल-बदल के प्रति लोगों में गुस्सा क्यों नहीं है और वे इतने उदासीन क्यों हैं?

एक तरफ तो इन मुद्दों पर विपक्ष लोगों को गोलबंद करने में सक्षम नहीं है। वहीं दूसरी तरफ पिछले पांच सालों में मीडिया और विश्लेषकों ने ऐसी कोशिशों को ‘चाणक्य नीति’ और ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताकर महिमामंडित करके ऐसी चीजों को सही ठहराने की कोशिश की गई है। इसके बावजूद इसके प्रति विरोध का स्वर क्यों नहीं उठ सकता? क्यों मतदाता अपने मतों के निरादर पर चुप हैं। अगर वे आवाज उठाएंगे तो इससे लोकतांत्रिक संस्कृति मजबूत होगी। क्यों मतदाता ये नहीं समझ पा रहे हैं कि यह दल-बदल उनके मतों की नैतिक क्षमता को निष्प्रभावी बना रहा है?

इस तरह की चुप्पी से नागरिक अपने राजनीतिक अधिकारों को सिर्फ वोट देने तक सीमित कर रहे हैं। पहले भी उल्लेख किया गया है कि राजनीतिक हितों के औजार के तौर पर पार्टियों के उभरने से मतदाता गैरराजनीतिक हुए हैं। क्या मतदाताओं ने खुद इस तरह की राजनीति को स्वीकार कर लिया है? यह प्रश्न इस संदर्भ में प्रासंगिक हो जाता है कि जनप्रतिनिधि बगैर लोकतंत्र के प्रति कोई जवाबदेही समझे सत्ताधारी पार्टी का रुख कर ले रहे हैं। मतदाताओं में भी इन चीजों के प्रति जवाबदेही कम होने से सत्ताधारी दल को अपने एजेंडे पर आगे बढ़ने का साहस मिलता है क्योंकि उसे किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ता। ऐसे में चुनौती जनता के लिए है कि वह अपनी लोकतांत्रिक चेतना को जगाए और विपक्षी दलों पर यह दबाव बनाए कि वे वास्तविक विपक्ष की राजनीति करें।

Updated On : 23rd Jul, 2019

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top