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गलत कामों को प्रोत्साहन

अवसरों को समाहित करने के लिए ठोस कदम उठाए बगैर ‘व्यवहारगत बदलावों’ की बात बेमानी होगी

 

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क्या 2018-19 की आर्थिक समीक्षा के जरिए सरकारी नीतियों के मानवीय होने को लेकर जानबूझकर एक माहौल तैयार करने की कोशिश की जा रही है। खास तौर पर उस सरकार के संदर्भ में जिसका रिकाॅर्ड सामाजिक-आर्थिक शासन के मोर्चे पर बहुत अच्छा नहीं रहा है फिर भी वह चुनाव जीतकर आई है। यह सोच कोई नई नहीं है कि आम लोग बिल्कुल तार्किक ढंग से निर्णय नहीं लेते हैं बल्कि उन्हें इसके लिए थोड़ी राह दिखानी पड़ती है। पिछले कुछ दशकों से दुनिया की कई सरकारें इन व्यावहारिक बातों को आर्थिक नीतियों से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। इसमें कोशिश यह हो रही है कि सरकारी योजनाओं में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाई जाए। मौजूदा सरकार स्वच्छ भारत अभियान और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं को इसका उदाहरण बताती है। हालांकि, इन कार्यक्रमों के भौगोलिक विस्तार की स्थिति चाहे जो भी हो लेकिन लाभार्थियों के स्तर पर इनकी सफलता संदेहास्पद है।

राष्ट्रीय सालाना ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण ने 2018-19 के दौरान जो अध्ययन किया उससे पता चला कि 93 फीसदी ग्रामीण परिवारों में शौचालय है। इसमें से 96.5 फीसदी लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के 90.7 फीसदी गांव खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं। हालांकि, भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी सीएजी ने 2017-18 की अपनी रिपोर्ट में ओडीएफ के पैमाने पर सवाल उठाया था। स्वच्छ भारत मिशन के तहत उन गांवों को भी ओडीएफ घोषित कर दिया जाता है जहां खुले में शौच नहीं दिखता या जहां निश्चित तकनीकी ढंग से इनका निस्तारण कर दिया जाता है। इसमें कहीं यह दर्ज नहीं है कि लोग शौचालय का कितना इस्तेमाल करते हैं।

बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ की भी यही स्थिति है। हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट से यह पता चला कि राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले को भारतीय जनता पार्टी ने बच्चियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सम्मानित किया। लेकिन बालिकाओं की शिक्षा के लिए जरूरी माहौल, शिक्षक प्रशिक्षण, स्कूलों में शौचालयों की उपलब्धता और स्कूल जाने के लिए परिवहन व्यवस्था आदि में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। जिला प्रशासन ने बताया कि बच्चियों का दाखिला 2016-17 में जहां 56,308 था, वहीं यह 2018-19 में यह बढ़कर 95,469 हो गया। लेकिन इस दौरान पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या नहीं बताई गई। 2014 के बाद से राजस्थान में पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस वक्त की भाजपा सरकार ने बीस फीसदी स्कूलों का विलय दूसरे स्कूलों में कर दिया। स्कूल का विलय किसी दूर के स्कूल में करने से लड़कियों के लिए दूर के स्कूलों में जाना मुश्किल हो गया और बड़ी संख्या में लड़कियां पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो गईं।

इस तरह के प्रमाणों के बावजूद लोग इस बात से हैरान है कि आखिर किस तरह के ‘व्यवहारिक बदलावों’ की बात आर्थिक समीक्षा में की गई है। जो बदलाव हुए भी हैं, वे सिर्फ सतही हैं। आयोजनों के उद्घाटन से लेकर प्रमाण पत्रों के वितरण के कार्यक्रमों तक ये बदलाव सीमित दिखते हैं। न कि जमीनी स्तर पर कोई जरूरी बदलाव हुआ है। तो फिर ऐसे में उन उपायों का क्या मतलब रहता है जिनके जरिए लोगों का व्यवहार बदलने की बात की जा रही है। अगर बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के तहत किसी लड़की को स्कूल जाने के लिए साइकिल मिलता है तो भी वह महिलाओं की आवाजाही पर लगी सामाजिक बंदिशों की वजह से इसका इस्तेमाल नहीं कर पाएगी। जबकि साइकिल का लाभ उसी परिवार के लड़के उठा सकते हैं।

भारत में लोगों का व्यवहार सामाजिक-सांस्कृतिक कायदों पर निर्भर करता है। ऐसे में वित्तीय मदद से जरूरी बदलाव नहीं आएंगे। पश्चिम बंगाल में कन्याश्री प्रकल्प योजना के तहत ऐसा किया गया। इस तरह के प्रोत्साहनों से एक तरह का भ्रष्टाचार का पैदा होगा जिसमें बगैर वास्तविक बदलावों के लोग लाभ लेने के लिए कृत्रिम बदलाव दिखाने की कोशिश करेंगे।

सीमित संसाधनों, अवसरों और क्षमताओं के माहौल में ‘इंसान’ और ‘आर्थिक व्यक्ति’ में फर्क कर पाना मुश्किल है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसी स्थिति में सार्वजनिक हित पर अपने हित को तरजीह देना अपने अस्तित्व को बचाए रखने का माध्यम बन जाता है। ऐसी जमीनी स्थितियों की वास्तविकता को विस्तार से समझे बगैर आर्थिक अवसरों, लाभों और क्षमताओं में विस्तार की बात सरकार के स्तर पर कपोल-कल्पना से अधिक साबित नहीं होगी। कब तक सरकार नारों और नामों में परिवर्तन की राजनीति की आड़ में अपनी नाकामियों को छिपाकर रखेगी?

 
 
Updated On : 23rd Jul, 2019

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