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लोक संस्थाओं की गरिमा

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राजनीतिग परिदृश्य में ‘अपमान’ शब्द से सामना होना अगर पेचीदगी वाला नहीं तो दिलचस्प जरूर है। यह इस मामले में दिलचस्प है क्योंकि इसे लोक संस्थानों और इनमें बैठे लोगों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल भारत के प्रधानमंत्री ने किया। उन्होंने अपमान की दुखद नैतिक स्थिति और झारखंड की ‘निर्दोष’ सरकार के बीच संबंध स्थापित करने के मकसद से ये बात कही। इससे दिलचस्प पड़ताल की स्थिति बनती है। सवाल उठता है कि क्या लोक संस्थाओं को अपमानित किया जा सकता है और अगर हां तो फिर किन स्थितियों में इसे नैतिक तौर पर सही कहा जा सकता है?

लोक संस्थाओं में नैतिक संवेदनशीलता निहित नहीं होती जिससे उनमें अपमान का भाव आए। ऐसा इसलिए क्योंकि ये सिर्फ भौतिक संरचना हैं। इसी तरह से यह कहना अजीब होगा कि सांस्थानिक प्रक्रियाएं मानवीय अपमान से बाधित हुईं। हां, इनका गलत इस्तेमाल जरूर हो सकता है। हालांकि, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि इन प्रक्रियाओं के इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है कि स्थिति कितनी अपमानजनक हो सकती है। इसलिए सार्वजनिक चरित्र वाली इन संस्थाओं को भावात्मक चरित्र ऐसा है कि ये किसी व्यक्ति से संबंधित नहीं हैं। इन दो आयामों से पता चलता है कि संस्थाओं के अपमान का इनसे कोई संबंध नहीं है। अगर यह स्थिति है तो फिर कोई यह स्वीकार कैसे कर सकता है कि ‘सरकार का अपमान हुआ।’

अपमान की बात को तभी स्वीकार किया जा सकता है कि जब संस्थाएं व्यक्ति केंद्रित हो जाएं और सरकार से लोकतंत्र और गणतंत्र का तत्व खत्म हो जाए। या फिर उन्हें सिर्फ एक आदमी या कुछ व्यक्तियों के समूह के अधीन स्थायी तौर पर कर दिया जाए। एक व्यक्ति के नकारात्मक भाव और सम्मान के भाव संस्थाओं तक पहुंचते हैं। इस संदर्भ में कहें तो अपमान की भाषा इन संस्थानों के साथ जुड़ गई है। संस्थाएं सार्वजनिक जीवन में रह रहे लोगों के नैतिक दावों के मूर्त रूप हैं।

लेकिन यह दावा करना कि ‘संस्थाओं को अपमानित किया जा रहा है’, अपूर्ण दावा है। यह तब सही हो सकता है जब यह वाजिब वजहों पर आधारित हो। इसे दूसरे तरह से देखें तो अपमान एक अनुचित नैतिक अपमान है जो वैसी सरकार के संदर्भ में किया जाए जिसका सुशासन के मामले में अच्छा रिकाॅर्ड रहा हो। ऐसी स्थिति में उस सरकार के अच्छे कार्यों का कोई सम्मान नहीं दिखता। इस संदर्भ में अपमान उस सरकार के प्रति असम्मान के भाव का प्रदर्शन है जिसके बारे में साक्ष्य हों कि उसने जनता के लिए अच्छे कार्य किए हैं।

इसलिए अपमानित होने का दावा बिल्कुल से मनगढ़ंत दावा नहीं है। इसे वाजिब तर्कों के साथ कहा जाना चाहिए और जिसमें न्याय के सामान्य सिद्धांत भी शामिल हों। अगर ये दावे वाजिब तर्क पर आधारित नहीं हैं तो फिर इन्हें बेबुनियाद और पूर्वाग्रह से ग्रस्त आरोप कहा जा सकता है। वाजिब तर्क तब ही उभर सकते हैं जब सरकार ठीक से काम करे। इस मामले में आशय झारखंड सरकार से है। राजव्यवस्था इसी बात पर टिकी है कि वह टैक्स चोरी करने वालों और भीड़ का हिस्सा बनकर लोगों पर हमले करने वालों पर कार्रवाई करे। भीड़ की हिंसा रोकने के मामले में सरकारों द्वारा त्वरित स्तर पर उठाए जाने वाले कदमों से लोगों के मन में संस्थाओं का सम्मान बढ़ेगा। उदार व्यवस्था में यह सरकार के लिए जरूरी है कि लोग उसका सम्मान करें। सरकारों के लिए दंडित करने की कार्रवाई भी अगर नैतिक दुविधा ले आए तो अपमान के आरोपों को बल देने वाले आधार नहीं टिकते। हमें यह मानना होगा कि यह भाव अभी कई राज्य सरकारों में है। झारखंड की सरकार इनमें एक है। भीड़ की हिंसा पर उचित कार्रवाई किए बगैर अपमान का दावा नहीं टिकता और इससे आलोचनात्मक मूल्यांकन की स्थिति भी नहीं बनती। इसके लिए निर्णय लेने वाली जगहों पर बैठे हुए लोगों को पीछे हटना पड़ेगा।

इससे स्वमूल्यांकन और स्वपरीक्षण की स्थिति पैदा होगी। सत्ताधारी दल को नियमित तौर पर ऐसा करते रहना चाहिए। पीछे हटने का मतलब यह नहीं है संवैधानिक कायदों से पीछे हटना जो नागरिकों की सुरक्षा बौर बेहतरी के लिए बने हैं। बल्कि यह एक ऐसा अवसर है जिसके जरिए सरकार अपने प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हुए बेहतर शासन दे सकती है। इससे विपक्ष के पास भी वे तर्क नहीं बचेंगे जिनके आधार पर वह सत्ताधारी दल की आलोचना करती है। पीछे हटकर अपने प्रदर्शन पर खुद नजर डालने से वाजिब और वैध आलोचनाओं को अपमान का विषय बनाने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी।

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