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एक साथ चुनाव बनाम जवाबदेही

क्या चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का एक माध्यम है या फिर एक सार्थक लोकतांत्रिक प्रक्रिया?

 

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भारतीय जनता पार्टी के लिए ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ बेहद प्राथमिकता वाला विषय है। 19 जून, 2019 को सर्वदलीय बैठक में जिस तरह से भाजपा ने इस विषय को उठाया, उससे उसकी सोच का पता चलता है। भाजपा चाहती है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के विचार पर सहमति बने। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दलों और कुछ क्षेत्रीय दलों में इस विषय को लेकर सहमति है। लेकिन कुछ विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध यह कहकर किया है कि इससे संवैधानिक लोकतंत्र और संघवाद पर नकारात्मक असर पड़ेगा। बहुत लोगों का संदेह यह है कि एक साथ चुनाव कराने से सत्ताधारी दल में तानाशाही प्रवृत्ति आ जाएगी। इसलिए इस विषय पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है।

एक साथ चुनाव कराने का विचार नया नहीं है। चुनाव आयोग ने यह बात 1982 में किया था और विधि आयोग ने 1999 में। हाल के दिनों में यह बात नीति आयोग और विधि आयोग की ओर से यह बात कही गई है। इस विचार को प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों और संबोधनों के जरिए भी पूरी ताकत से आगे बढ़ाने की कोशिश की है। बुनियादी तौर पर देखें तो एक साथ चुनाव की बात कार्यकुशलता बढ़ाने और खर्च घटाने के आधार पर की जा रही है। कहा जा रहा है कि एक साथ चुनाव कराने से अलग-अलग चुनाव कराने के मुकाबले चुनावी खर्च कम हो जाएगा। 1969 से अलग-अलग चुनाव होते आए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि बार-बार चुनावों की वजह से जो आदर्श आचार संहिता लगती है उससे नीतिगत निर्णय बाधित होते हैं और एक साथ चुनाव कराने से इस समस्या का भी समाधान हो जाएगा। ये तर्क प्रबंधन से संबंधित अधिक लगते हैं न कि संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों से संबंधित।

एक साथ चुनाव कराने की बात अगर लागू हो जाती है तो कई विधानसभाओं का कार्यकाल समय से पहले खत्म करना पड़ेगा। इसका मतलब यह हुआ कि लोकतांत्रिक जनादेश को कम करके आंका जाएगा। अगर यह काम बगैर अनुच्छेद-356 का इस्तेमाल किए हुए आपसी सहमति से भी किया जाता है तो भी इससे संघीय सिद्धांत कमजोर होंगे। देश में जब अलग-अलग चुनाव शुरू हुए तो इसके पीछे उस वक्त की केंद्र सरकार की दूसरी राजनीतिक ताकत के साथ संबंधों में आ रहे बदलाव भी इसकी एक वजह बने थे। ऐसा इसलिए भी हुआ था कि राज्यों में काम कर रहे स्थानीय दल स्थानीय स्तर के मुद्दों को सुलझाने की प्रति लोगों को अधिक प्रतिबद्धत लगने लगे। एकसाथ चुनाव कराने से यह विविधता खत्म होगी और फिर से केंद्रीकरण को बढ़ावा मिलेगा। इससे संसाधनों और शक्तियों के मामले में एक पार्टी ताकतवर हो जाएगी। लोकसभा चुनावों के आगे-पीछे जो विधानसभा चुनाव होते हैं वे केंद्र सरकार पर भी दबाव बनाने में उपयोगी साबित होते हैं। अलग-अलग समय पर चुनाव होने से केंद्र सरकार पर जनविरोधी नीतियों में सुधार का दबाव बनता है और सरकार को जनता की मांगों को मानना पड़ता है।

इसमें कार्यपालिका की विधायिका के जरि जनता के प्रति जवाबदेही का भी एक आयाम है। क्योंकि एक साथ चुनाव कराने की बात के साथ ही निश्चित कार्यकाल की बात भी जुड़ी हुई है। तब ही एक साथ चुनाव कराने की योजना को बरकरार रखा जा सकता है। क्योंकि ऐसे प्रावधान के बगैर तब एक साथ चुनाव कराने की योजना नाकाम हो जाएगी जब किसी राज्य सरकार या फिर केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए। इसके समाधान के लिए रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव का सुझाव दिया जा रहा है। जिसमें अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के साथ ही वैकल्पिक सरकार बनाने का प्रस्ताव भी पेश करना जरूरी होगा। राष्ट्रपति शासन और बचे हुए कार्यकाल के लिए चुनाव कराने की बात भी आ रही है। इनमें से कोई भी बात संविधान में नहीं है। निश्चित कार्यकाल और स्थायित्व पर अधिक जोर दिया जा रहा है लोकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता को दरकिनार किया जा रहा है। यहां से यह बात भी निकलती है कि क्या जवाबदेही से अधिक सर्वोच्चता स्थायित्व को दिया जाना चाहिए। अगर इस तरह की बातों को माना जाता है तो राष्ट्रपति केंद्रित व्यवस्था बनाने की दिशा में चल रही कोशिशों को और गति मिल जाएगी। एक साथ चुनाव कराने में फायदे की स्थिति में अधिक संसाधनों वाली राष्ट्रीय पार्टियां रहेंगी और राजनीतिक मुकाबला व्यक्तियों के मुकाबले में तब्दील हो जाएगा।

प्रबंधन के लिहाज से उपयोगी यह विचार लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने वाला है। क्योंकि इस सोच के मूल में यह विचार है कि चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का एक माध्यम है। यही सोच जब अति पर पहुंचती है तो फिर चुनाव को ही शासन की राह में बाधा माना जाता है। ऐसा सोचने वाले लोगों को मानना है कि जनता का काम सिर्फ पांच साल में वोट देकर सारी जिम्मेदारी कार्यपालिका को देकर पीछे हट जाने का है। राममनोहर लोहिया कहते थे कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं कर सकतीं। धरना-प्रदर्शन के अलावा अलग-अलग राज्यों में होने वाले चुनावों के जरिए भी जनता अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करके लोकतंत्र की सेहत के संदर्भ में संकेत देती है। अंततः हमें यह समझना चाहिए कि चुनावों के जरिए जनता की संप्रभुता की ताकत दिखाई जाती है। इस पर कोई बहस कर सकता है कि पैसे और मीडिया के प्रभाव वाले चुनावों में अब इसके लिए कितनी संभावना बची है लेकिन एक साथ चुनाव कराने की बात तो ऐसी किसी संभावना को ही जड़ से खत्म करने वाली है।

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