ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

सूखा वर्तमान, सूखा भविष्य?

गहराते जल संकट के बीच सरकार को जल प्रबंधन के मामले में सावधानी दिखानी चाहिए

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

देर से ही सही लेकिन भारत के कई हिस्से में बारिश की शुरुआत हो गई है। इससे लोगों को गर्म हवाओं से राहत मिली है जिसकी वजह से सैंकड़ों की संख्या में लोग मारे गए। इससे जल संकट से भी थोड़ी राहत की उम्मीद हे। चेन्नई और रांची जैसे शहरों में पानी संकट की वजह से लोगों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। लोगों को अपनी जरूरतों को पूरा करने भर भी पानी नहीं मिल रहा था। हालांकि, जल संकट सिर्फ इन शहरों की सच्चाई नहीं है बल्कि देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की स्थिति का सामना कर रहा है।

माॅनसून में देरी और कम बारिश ही सिर्फ इसकी वजह नहीं हैं। सूखे की मार अधिक महसूस इसलिए हो रही है क्योंकि काफी गहराई तक गड्ढा करने के बाद भी थोड़ा पानी तक नहीं मिल रहा है। महाराष्ट्र के नासिक जिले के बर्दे-ची-वाड़ी में रहने वाली महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर कुएं में 60 फुट नीचे उतरकर अपने परिवार के लिए पीने का पानी लाती हैं। भारत जितनी तेजी से भूजल का इस्तेमाल कर रहा है, उतना कोई और देश नहीं कर रहा है। यहां भूजल को सार्वजनिक संपत्ति नहीं समझा जाता। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर ने अपने अध्ययन में बताया है कि पानी के मामले में संपन्न पूर्वी भारत को भी भविष्य में भूजल संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए जल संकट को सिर्फ अकेली समस्या के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जल से संबंधित तनाव जरूरी कदम नहीं उठाने की वजह से बढ़ता जा रहा है।

इसमें भी लिंग, जाति और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव दिखता है। महिलाओं पर पानी लाने का भार होता है। संकट के समय में कई जगहों पर ऐसा दिखा। महाराष्ट्र के ठाणे जिले का डेंगानमल गांव इसका उदाहरण है। यहां के पुरुष दूसरी और तीसरी बार शादी इसलिए करते हैं ताकि उन्हें ‘पानीवाली बाई’ मिले और जो रोज पानी ला सके। ऐसे गांव नदियों और बांधों के करीब हैं। लेकिन यहां का पानी मुंबई भेज दिया जा रहा है। ऐसे में महिलाओं को लंबी दूरी तय करके पानी लाना पड़ता है ताकि उनके परिवार के लोग इसका इस्तेमाल कर सकें।

इसकी उपलब्धता घटती जा रही है और पानी का इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए कीमतों को तय करने में बाजार की बड़ी भूमिका हो गई है। ऐसे में सामाजिक तौर पर संपन्न लोग पानी तक पहुंच को नियंत्रित करने के काम में लगे हैं। वितरण में एक असमानता है। वहीं सही ढंग से इस्तेमाल करने को लेकर भी लोग जागरूक नहीं हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में दिखता है कि आय और सामाजिक स्थिति के आधार पर लोगों की पहुंच पानी तक है। चेन्नई में जब जल संकट पैदा हुआ तो अपार्टमेंट वाले भवन दिन भर में तीन-चार टैंकर पानी के लिए पैसे चुकाने में सक्षम थे लेकिन कम आय वाले परिवार इतने सक्षम नहीं थे। गांवों में रहने वाले लोगों में से सिर्फ 18 फीसदी लोगों को पाइप से पानी मिल रहा है। छोटे किसान सबसे बुरी स्थिति में हैं और उन्हें सूखे की वजह से पलायन करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और यहां तक की उत्तराखंड के कई पहाड़ी क्षेत्रों के वैसे गांवों जो लगातार सूखे का सामना कर रहे हैं, वहां अब लोग ही नहीं हैं।

भारत के शहरों में दूर से पानी लाया जाता है। इसमें काफी पैसे भी खर्च होते हैं। इन शहरों ने झीलों को दरकिनार किया है। चेन्नई में 350 से अधिक झीलें खत्म हो गई हैं। भारत में शहरों के विस्तार में पानी के संकट के हिसाब से तैयारी नहीं की गई। बरसात के पानी के दोबारा उपयोग की तकनीक नहीं अपनाई गई। इस्तेमाल किए गए पानी के शोधन के लिए जरूरी उपाय नहीं किए गए। रियल एस्टेट के व्यापक विस्तार से टैंकर लाॅबी को फायदा हुआ। जल स्रोतों पर अतिक्रमण करके उन्हें ढंक देने से न सिर्फ जमीन के अंदर पानी का रिसना बंद हो गया बल्कि बाढ़ की स्थिति भी इस वजह से विकराल हो जाती है।

शहरों और उद्योगों से जो पानी निकल रहा है, उसे लेकर कोई चिंता नहीं है। इस वजह से देश की कुल जल आपूर्ति का 70 फीसदी प्रदूषित है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि इस वजह से हर साल दो लाख मौतें हो रही हैं। शहरों के पास की अधिकांश खेती गैर-शोधित पानी से हो रही है। इसमें स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले कई जहरीले तत्व होते हैं।

मौजूदा जल संकट की वजह से केपटाउन के ‘डे जीरो’ जैसे संकट की आशंका बढ़ गई है। नीति आयोग ने भी ऐसी आशंकाएं जाहिर की हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में आनन-फानन में जिन समाधानों की बात की जा रही है उससे संकट और बढ़ेगा। नदियों को आपस में जोड़ने से समस्या और बढ़ेगी ही। जल संकट की वजह से खाद्यान्न और स्वास्थ्य संकट भी पैदा होगा। इसलिए जल प्रबंधन का काम बेहद सावधानी से करने की जरूरत है।

यह एक ऐसी स्थिति है जिसे भविष्य में और विकराल होने से रोका जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी यह है कि कम जल में उपजाए जाने वाले फसल लगाए जाएं और कम पानी के इस्तेमाल वाली जीवनशैली अपनाई जाए। जल भंडारण और इस्तेमाल को लेकर प्रभावी नीति बने और खपत से संबंधित रियल टाइम आंकड़े उपलब्ध हों। इंजीनियरिंग और तकनीक आधारित समाधान पर ध्यान केंद्रित करने के बजाए यह स्वीकारोक्ति भी जरूरी है कि जल स्रोतों अगर स्वस्थ्य और प्राकृतिक अवस्था में हों तो उनमें यह क्षमता होती है कि वे पानी फिर से जमा कर सकें और उनमें यह क्षमता भी होती है कि वे जलवायु संबंधित संकटों के असर को भी कम कर सकें।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top