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शिक्षा और सार्वजनिक हित का विचार

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बेहतरी के विचार और शिक्षा आपस में जुड़े हुए हैं। यह नैतिक समझदारी के उच्च स्तर पर आपस में जुड़ा हुआ है। नैतिक हित के दो आयाम हैं। एक है सार्वजनिक हित और दूसरा है व्यक्तिगत हित। सार्वजनिक हित आदर्श है जबकि व्यक्तिगत हित अभी अस्तित्व में दिखता है। सार्वजनिक हित में शांति, समरसता और इंसान के लिए सम्मान पर जोर दिखता है। संविधान भी इन मूल्यों की बात करता है और नई शिक्षा नीति, 2019 में भी इनका उल्लेख मिलता है। हालांकि, ये भी सत्य है कि इन मूल्यों का प्रसार शिक्षा के जरिए होना चाहिए। शिक्षा इस तरह की होनी चाहिए कि ये मूल्य समाज में फैलें। शिक्षकों की गुणवत्ता ऐसी होनी चाहिए कि वे न सिर्फ खुद को बल्कि अपने छात्रों को भी पुरातन मूल्यों से बाहर निकालकर सार्वजनिक हित वाले मूल्यों की ओर मोड़ें।



शिक्षा हमें एक ऐसा अवसर देता है जहां हम सार्वजनिक हितों को स्वीकार करते हुए प्रतिगामी मूल्यों को खारिज कर सकें। चिंतन इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे वैचारिक तौर पर अपने हितों की चिंता करने वाले नेताओं और पार्टियों पर निर्भरता कम होती जाती है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि छात्र ऐसे हों जो खुद वह बौद्धिक क्षमता हासिल कर सकें जिसके जरिए वे निर्णय ले सकें। लेकिन हमें ऐसे शैक्षणिक उपकरण विकसित करने होंगे जिनके जरिए सार्वजनिक हित को बढ़ावा देने वाले मूल्यों का विस्तार हो सके। सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता वाली कक्षाएं एक ऐसा अवसर पैदा करती हैं जिनसे उन मूल्यों को मजबूती मिलती है जो सार्वजनिक हित को बढ़ावा देने वाले हैं।

हालांकि, इस तरह के मूल्यों का प्रसार उतना आसान नहीं है। क्योंकि पब्लिक स्कूल और उच्च शैक्षणिक संस्थाएं कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही हैं। इसमें एक गंभीर समस्या यह है कि जो लोग इन संस्थाओं को सही ढंग से चलाने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें इनकी चिंता नहीं है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि कम साधन वाले अभिभावक भी सरकारी संस्थाओं को छोड़कर निजी शैक्षणिक संस्थानों में अपने बच्चों को भेज रहे हैं। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। गलती इन अभिभावकों की नहीं है। अभिभावकों का एक वर्ग स्थानीय सरकारी अधिकारियों से यह मांग करता है कि उनके बच्चों को स्थायी तौर पर अच्छे शिक्षक मिलें न कि गुणवत्ता वाला मध्याह्न भोजन। ऐसे में एक सवाल हमें खुद से पूछना चाहिएः कैसे निजी संस्थाएं सार्वजनिक हित को बढ़ावा देंगी? जो लोग इस प्रक्रिया से संबंधित रहे हैं वे सिर्फ इस बात से संतुष्ट नहीं होंगे कि निजी संस्थाओं में विविध सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के बच्चों के आने से बहुत अधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में फिर नई शिक्षा नीति, 2019 में जिस स्थिति समानता की बात की जा रही है, वह कैसे संभव हो पाएगा।



हमें उस सामाजिक दूरी को खत्म करने के लिए काम करना होगा जो सामाजिक संबंधों में हैं। ऐसे में इस संरचनात्मक समस्या के समाधान की जो बात नई शिक्षा नीति में निजी स्कूलों और काॅलेजों में बच्चों के दाखिले के जरिए की गई है, वह उचित नहीं लगती। सार्वजनिक हित सिर्फ इससे सुनिश्चित नहीं हो जाता कि पिछड़ी सामाजिक पृष्ठभूमि के बच्चों को शिक्षा तंत्र में शामिल कर लिया जाए। बल्कि इसके लिए ये जरूरी है कि संरचनात्मक असमानता को दूर किया जाए।



यह असमानता कई बातों से दिखती है। गरीब परिवारों के बच्चे बड़े पैमाने पर स्कूली शिक्षा बरकरार नहीं रख पाते। जो काॅलेज में पहुंच भी जाते हैं, उन्हें भी बीच में पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। नई शिक्षा नीति के मसौदे में कहा गया कि शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विस्तार जरूरी है। यह सही है। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सामाजिक दृष्टि का विस्तार हो ताकि एक बेहतर समाज का निर्माण हो सके जिसकी परिकल्पना नई नीति के मसौदे में है। इसमें नीतिशास्त्र की बात भी की गई है जो बेहद महत्वपूर्ण है। इससे लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। लेकिन व्यक्तिगत हितों और सार्वजनिक हितों पर आधारित शिक्षा तंत्र का टकराव चिंताजनक है। नई नीति में इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि कैसे किसी के खुद से व्यावहारिक संबंधों और दूसरों से नीतिपरक संबंधों के फर्क को दूर किया जाए। 

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