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हड़ताल से आगे

स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए डाॅक्टरों को सुरक्षा की मांग से आगे जाना चाहिए

 

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कोलकाता के एक अस्पताल में एक मरीज की जान चली जाने के बाद उसके परिजनों ने दो डाॅक्टरों पर हमला कर दिया। यह मामला बढ़ते हुए पूरे देश में डाॅक्टरों की हड़ताल में तब्दील हो गया। इसकी शुरुआत कोलकाता के नील रतन सरकार मेडिकल काॅलेज ऐंड हाॅस्पिटल के जूनियर डाॅक्टरों की हड़ताल से हुई। ये अस्पताल में सुरक्षा बढ़ाने की मांग कर रहे थे। ममता बनर्जी सरकार ने शुरुआत में जरूरी कदम नहीं उठाए। उलटा मुख्यमंत्री ने डाॅक्टरों को अल्टीमेटम दे दिया और इसके बाद कई वरिष्ठ डाॅक्टरों के इस्तीफे का सिलसिला शुरू हो गया। फिर यह विरोध पूरे देश में फैला और 17 जून, 2019 को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने देशव्यापी हड़ताल का आह्वान कर दिया। ओपीडी सेवाओं समेत सारे गैर-अनिवार्य चिकित्सा सेवाएं बाधित हुईं और मरीज अपने हाल पर रह गए।



बहुत समय नहीं हुआ जब 2017 में इसी तरह की स्थिति महाराष्ट्र में पैदा हो गई थी। एक डाॅक्टर पर हमले के बाद महाराष्ट्र रेजीडेंट डाॅक्टर्स संघ ने पांच दिनों की हड़ताल की थी। सुरक्षा बढ़ाने की उनकी मांग को सरकार ने मान लिया था। ऐसा लगता है कि पिछले दो साल में हमने कोई सबक नहीं लिया और सुरक्षा की समस्या जस की तस बनी हुई है। सुरक्षा और ऐसे हमलों से निपटने के लिए कठोर कानून की डाॅक्टरों की मांग सही है लेकिन इससे समस्या का दीर्घकालिक समाधान नहीं होगा।



कोलकाता में हड़ताल कर रहे डाॅक्टरों ने एक शिकायत प्रकोष्ठ की भी मांग की है। उनकी मांग यह भी है कि एक केंद्रीय कानून बने जिसके जरिए स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा के मामलों में कठोर सजा का प्रावधान हो। भारतीय मेडिकल संघ भी इन्हीं मांगों को उठा रही है। हालांकि, पश्चिम बंगाल में पहले से एक ऐसा कानून है लेकिन इसका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। हाल के अध्ययनों से यह पता चला है कि डाॅक्टरों और अन्य चिकित्सा कर्मियों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आम होती जा रही हैं। एक अध्ययन में तो यह भी बताया गया है कि नर्सों को सबसे अधिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। वहीं एक अन्य अध्ययन में बताया गया है कि डाॅक्टर मानते हैं कि लंबे समय तक मरीजों को इंतजार करना पड़ता है, इस वजह से वे हिंसक हो रहे हैं।  2018 में भारत एक अस्पताल में हुए अध्ययन में यह बताया गया कि स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसक घटनाएं होती हैं लेकिन इसकी शिकायत कम दर्ज हो पाती है। क्योंकि उनमें इस बात को लेकर जागरूकता का अभाव है कि ऐसी स्थिति में शिकायत कैसे दर्ज कराई जाए। इससे भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की गंभीर समस्याओं का पता चलता है।

किसी भी तरह की हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि ये घटनाएं किन परिस्थितियों में हो रही हैं। भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की समस्याएं कोई दबी-छिपी नहीं हैं। जिस वक्त ये हड़ताल जारी थी, उसी वक्त बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से 100 से भी अधिक बच्चों की मौत की खबर आई। मरने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस घटना से पता चलता है कि देश में जन स्वास्थ्य का क्या हाल है। मुजफ्फरपुर जिले का कोई भी सरकारी अस्पताल जरूरी मानकों पर खरा नहीं उतरता। इस वजह से यहां इस समस्या ने इतना विकराल रूप ले लिया है और इससे मरीजों के परिजनों में गुस्सा और निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। शिकायत निवारण तंत्र नहीं होने की वजह से असहाय मरीजों के परिजनों और स्वास्थ्यकर्मियों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है और इससे हिंसा की आशंका भी पैदा होती है।



अपर्याप्त स्वास्थ्य संबंधित बुनियादी ढांचा के अभाव में अस्पताल में काम करना डाॅक्टरों के लिए मुश्किल हो जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ मुनाफा आधारित निजी अस्पताल हैं। इनकी वजह से इस क्षेत्र में काम करने का तौर-तरीका बदल गया है। निजी क्षेत्र नियमन के दायरे से बाहर रहते हुए अधिक से अधिक पैसे वसूल रहा है और इनके यहां लापरवाही के कई मामले भी सामने आते हैं। इससे हिंसा की स्थिति पैदा होती है। इन सबने मिलकर कई सालों से डाॅक्टर और मरीजों के आपसी संबंध को प्रभावित किया है। डाॅक्टर अब मरीजों की नजर में मसीहा नहीं रहे। स्वास्थ्य सेवाओं में अब ‘सेवा’ पीछे छूट गया है। डाॅक्टरों में भी संवाद की वह कला नहीं है जिसके जरिए वे गंभीर मरीजों और उनके परिजनों के साथ पूरी संवेदनशीलता से बात कर सकें।



इस संदर्भ में सालों से इस तरह के विरोध-प्रदर्शन में डाॅक्टरों की ओर से सिर्फ सुरक्षा की मांग करना नाकाफी है। असली समस्या व्यवस्थागत है और इसका समाधान भी उसी स्तर पर करना होगा। ऐसा करने के लिए यह जरूरी है कि सरकार सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा से संबंधित कानून पारित करे। इसके अलावा सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन और अन्य संसाधन मजबूत करने के लिए इस क्षेत्र का बजट बढ़ाना होगा। इसके अलावा स्वास्थ्य प्रतिष्ठान कानून का क्रियान्वयन भी करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि सारे अस्पताल इसमें बताए गए नियमों का पालन करें। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि डाॅक्टरों के अंदर से ही इन व्यवस्थागत दिक्कतों को दूर करने की मांग उठनी चाहिए ताकि स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू, कुशल और सुरक्षित रूप से चल सकें।

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