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नतीजा तय, स्वतंत्र इच्छाएं

आवश्यक वस्तु अधिनियम को दरकिनार करना आसान नहीं है

 

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15 जून, 2019 को नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की पांचवीं बैठक हुई। इसमें राज्य सरकारों से कृषि क्षेत्र में ढांचागत बदलाव लाने की बात कही गई। कहा गया कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और माॅडल कृषि उपज मंडी समिति अधिनियम यानी एपीएमसी कानून में जरूरी संशोधन किया जाए। भारत के कृषि संकट को देखते हुए इन कानूनों में संशोधन जरूरी है। लेकिन जिस तरह से आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन की बात चल रही है, उस पर चर्चा जरूरी है। इसके प्रावधानों में संशोधन से मांग और आपूर्ति के बीच इस तरह की स्थिति पैदा हो सकती है जिससे एक बाजार की कीमतों से संबंधित संकेत दूसरे बाजार तक पहुंच सकते हैं। इससे किसानों को उपज के बदले अधिक पैसे मिल सकते हैं तो आपूर्ति बढ़ने से उपभोक्ताओं को कीमतों में राहत मिल सकती है।



हालांकि, सुधारों से संबंधित कोई स्पष्टता न तो नीति आयोग ने दिखाई और न ही सरकार ने। इससे आम लोगों के मन में कई तरह के संदेह पैदा हो रहे हैं। क्या इन सुधारों के जरिए ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि इस कानून के जरिए कीमतों में भारी तेजी से उपभोक्ताओं को मिल रही सुरक्षा खत्म हो जाएगी? याद रहे कि इस कानून के रहते हुए भी सरकार कीमतों को नियंत्रित नहीं रख पाती है। जब भी सरकार ने भंडारण की सीमा तय की है तब कीमतों में तेजी देखी गई है। सरकार द्वारा चीनी के भंडारण पर 2003 में जो सीमा तय की गई थी, उसके बाद चीनी की कीमतों में प्रति टन 250 रुपये की बढ़ोतरी हुई। जनवरी से जुलाई, 2014 को भंडारण से संबंधित जो सीमाएं तय की गईं, उस वजह से उड़द, मूंग और मसूर की खुदरा कीमतों में प्रति किलो क्रमशः 14 रुपये, 8 रुपये और 9 रुपये की बढ़ोतरी हुई। वहीं चावल की कीमतों में प्रति किलो एक से दो रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इन बातों से यह पता चलता है कि बफर स्टाॅक बनाकर व्यापार करना एक बेहतर रणनीति है। इसके बावजूद आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन को लेकर तरह-तरह की बातें चल रही हैं।



आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन एक संक्रामक समस्या है। खास तौर पर उन फसलों के बारे में जिनकी कीमतों के निर्धारण में राजनीति की भूमिका होती है। एक बार जब सरकार किसानों को एक कीमत का वादा कर देती है तो इसका मतलब यह होता है कि सरकार को हर हाल में पूरे उत्पाद की खरीदारी सुनिश्चित करना चाहिए। चीनी मिल उद्योग और राजनीति का एक आपसी संबंध है। इस वजह से वे किसी भी ऐसी कोशिश का विरोध करेंगे जिसके जरिए गन्ने की आवाजाही प्रभावित करते हुए चीनी की कीमतों के उतार-चढ़ाव में दखल देने का काम होगा। वे किसानों को केंद्र या राज्य सरकार द्वारा तय की गई कीमत देने से भी मना करते हैं। हालांकि, सरकार चीन मिलों पर सेस लगाकर बफर स्टाॅक बना सकती है। इसका बोझ भी अंततः ग्राहकों पर ही आता है। लेकिन ऐसा तब नहीं होगा जब राजनीति चीनी उद्योग पर निर्भर हो। ऐसे में ‘सहयोगात्मक संघवाद’ के जरिए कृषि सुधार की बातें कम व्यावहारिक लगती हैं। माॅडल एपीएमसी कानून का उदाहरण हमने देखा है। राज्यों ने इसे आधे-अधूरे मन से अपने हिसाब से संशोधन करके अपनाया। ऐसे में राज्य सरकारें आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के लिए कैसे तैयार होंगी, यह देखना होगा।



इसमें अधिक चिंताजनक वह आधिकारिक बयान है जिसमें इन संशोधनों की जरूरत को रेखांकित किया गया है। वह भी खास तौर पर भंडारण सीमा के संदर्भ में। इससे यह उम्मीद की जा रही है कि कृषि क्षेत्र में काॅरपोरेट निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा। इस तरह की व्याख्या बाजार का अतिरिक्त सकारात्मक पहलू देखने का नतीजा है। इसमें पहली सोच यह है कि निजी क्षेत्र कृषि में नवाचार लेकर आएगा और इससे ग्रामीण विकास की रणनीति को नया आयाम मिलेगा। वहीं दूसरी सोच यह है कि इससे बाजार की कार्यकुशलता निजी क्षेत्र के प्रवेश से सुधरेगी। यह आंशिक तौर पर नरेंद्र मोदी के 2014 के उस चुनावी वादे के अनुकूल है जिसमें वे ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ की बात करते हैं। लेकिन इसमें गवर्नेंस को लेकर कोई रोडमैप नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट है नहीं है कि पूरे देश में ये सुधार कैसे होंगे। इसे कोई खारिज नहीं कर सकता कि भंडारण, मोलभाव की स्थिति, जोखिम लेने की क्षमता और सूचनाओं पर नियंत्रण के जरिए बाजार में ताकत दिखाई जाती है। ऐसे में जो अध्ययन हैं वे यही बताते हैं कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में भंडारण संबंधित नियमों में ढील देने से मुनाफा वसूलने का काम सरकार और काॅरपोरेट क्षेत्र के बीच बंट जाएगा न कि कम होगा। ऐसे में दोबारा चुनी गई सरकार की ‘समावेशी’ कृषि सुधारों के मामलों में परीक्षा के दौर से गुजरना होगा। क्योंकि इन सुधारों के लिए आने वाले दिनों में ‘जरूरी माहौल’ बनाना आवश्यक है।

Updated On : 4th Jul, 2019

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