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दिखावे का खेल

हिंदी को प्रोत्साहन देने की बात में कोई दम नहीं है क्योंकि इसके जरिए सिर्फ दिखावे के काम हो रहे हैं

 

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जून के महीने में दिल्ली में थोड़े समय के लिए धूल भरी आंधी आती है। इस बार की आंधी में आधी सदी पहले पड़े धूल भी उड़े। चुनावों के बाद आई नई शिक्षा नीति में पुराने तीन भाषा के फार्मूले पर विवाद छिड़ गया। इसमें हिंदी को शामिल किए जाने का विरोध तमिलनाडु से होने लगा। इसके बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने विवादित पैराग्राफ को नई शिक्षा नीति के मसौदे से हटा लिया। ऐसे में नई पीढ़ी के पाठकों के लिए तीन भाषा के फाॅर्मूले के पुराने मामले को समझना प्रासंगिक है।

कुछ मौके ऐसे होते हैं जब पुराने दस्तावेज ज्यादा समकालीन लगने लगते हैं। तीन भाषा का फाॅर्मूला शिक्षा आयोग द्वारा तैयार की जा रही नीति के वक्त चर्चा में आया था। 1964 से 1966 के बीच के इस आयोग की अध्यक्षता डीएस कोठारी ने की थी। इसके सदस्य सचिव जेपी नाइक ने रिपोर्ट तैयार किया था। उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों की शिक्षा की समस्याओं का अहसास था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि तीन भाषाओं का फाॅर्मूला केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने 1956 में तैयार किया था। बाद में इसे सरल रूप में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन ने 1961 में स्वीकार किया। कोठारी आयोग ने कहा, ‘इसे स्वीकार करने के पीछे शैक्षणिक से अधिक राजनीतिक और सामाजिक वजहों को आधार बनाया गया।’

कोठारी आयोग की रिपोर्ट में भाषा पर विस्तार से जिस खंड में चर्चा हुई थी, उसमें राजनीतिक अनिवार्यताओं और शैक्षणिक जरूरतों के बीच संतुलन साधने की कशमकश दिखती है। इसमें कहा गया, ‘तीन भाषा फाॅर्मूले को लागू करने से कई तरह की समस्याएं आईं और यह बेहद सफल नहीं कहा जा सकता। इसके लिए कई बातें जिम्मेदार हैं। स्कूली पाठ्यक्रम में भाषाओं का बोझ बढ़ गया। हिंदी क्षेत्रों में एक और आधुनिक भारतीय भाषा बढ़ने का उत्साह कम रहा। गैर-हिंदी क्षेत्रों में हिंदी पढ़ने को लेकर प्रतिरोध रहा। पांच से छह साल तक दूसरी और तीसरी भाषा बढ़ाने से आर्थिक बोझ भी बढ़ा। जहां तक तीसरी भाषा का सवाल है तो कई क्षेत्रों में छात्रों को इससे कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि उन्हें इसे पढ़ने के लिए उपयुक्त माहौल नहीं मिला।’ विभिन्न विकल्पों और एक असहमति पर विचार करने के बाद कोठारी आयोग ने कहा, ‘हम यह मानते हैं कि प्रारंभिक स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ने से बच्चों को अपनी मातृभाषा सीखने की प्रक्रिया बाधित होगी और इससे उसका बौद्धिक विकास भी प्रभावित होगा। निकट भविष्य में अपनी भाषा सीखने पर जोर देना चाहिए। अतिरिक्त भाषा सीखने पर न्यूनतम जोर दिया जाना चाहिए।’

अब 21वीं सदी के दूसरे दशक के अंत में लौटते हैं। कोठारी और नाइक ने शिक्षा में जिन बदलावों का अनुमान नहीं लगाया था और जिन्हें जरूरी नहीं समझा था, वे बदलाव भी शिक्षा के क्षेत्र में हो चुके हैं। सरकारी स्कूलों पर निजी स्कूल हावी हैं। वे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देने पर बहुत अधिक जोर दे रहे हैं। प्रशिक्षित शिक्षकों का घोर अभाव है। शिक्षकों का प्रशिक्षण पूरी तरह से व्यावसायिक हो गया है। शिक्षकों की नियुक्ति में कई सांस्थानिक खामियां हैं। कोठारी, नाइक और उनके सहयोगी होते तो इस स्थिति पर हैरान होते। उन लोगों ने शिक्षा की परिकल्पना सरकार को केंद्र में रखकर की थी। लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल गई है। राजनीतिक अनिवार्यताओं की जगह बाजार के दबावों ने ले ली है। राजनीतिक अनिवार्यताएं सिर्फ दिखावे के लिए हैं। इन्हें बस मीडिया में उछाला जाता है। हिंदी के प्रोत्साहन में वास्तविक तत्व नहीं है बल्कि सिर्फ दिखावा है। तीन भाषा के फाॅर्मूले में हिंदी की भूमिका की बात करके राष्ट्रवाद के पुराने माॅडल को दोहराने की कोशिश की गई है। ऐसे में जब विरोध वहीं से आया जहां से उम्मीद थी तो तुरंत ही हिंदी नहीं थोपने की बात करके मामले को पुराने ढंग से रफा-दफा करने का काम किया गया।

शिक्षा में भाषा से संबंधित मसलों पर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभावों की आलोचना अक्सर हुई है। नए मसौदे में भी यही दोहराया गया है। इसमें भी कहा गया है कि जहां तक संभव हो शिक्षा मातृ भाषा में ही दी जानी चाहिए। नीतियों पर होने वाले विमर्श में पुराने और नए अभिजात्य वर्ग में संकेतों का आदान-प्रदान होता है। जहां तक हिंदी का सवाल है तो इसमें इस भाषा को राष्ट्रवाद से जोड़े जाने की बात अब खत्म हो गई है क्योंकि देश को जोड़ने के दूसरे भावनात्मक मुद्दे प्रभावी साबित हुए हैं।

 
 

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