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भरोसे की राह

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सीमित चुनावों के संदर्भ में गठबंधन की राजनीति के लिए दो शर्तें हैं। इसमें पहली प्रमुख इसलिए हो जाती है क्योंकि यह चुनावी राजनीति में एक पार्टी के प्रभुत्व से संबंधित है। बड़े बहुमत के साथ भाजपा की सत्ता में हुई वापसी से यह जुड़ा हुआ है। संख्या की दृष्टि से देखें तो एक पार्टी का प्रभुत्व कायम हो गया है। हालांकि, क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से यह अब तक नहीं हुआ। भाजपा को उत्तरी भारत के राज्यों से समर्थन मिला और पूर्वोत्तर भारत में इसने अपनी जगह बनाई। दूसरी बात यह है कि गठबंधन राजनीति तब अनिवार्य हो जाती है जब छोटे समूह खुद अपने बूते चुनावी बहुमत नहीं हासिल कर पाते। चुनावी ताकत और सामाजिक आधार पर विपक्ष बेहद कमजोर स्थिति में है। ऐसे में इन छोटी पार्टियों और इनके समर्थकों के बीच एकजुटता और आपसी विश्वास के आधार पर गठजोड़ रहना जरूरी है। पार्टियों के लिए नहीं भी तो जोखिम झेल रहे तबके के लिए विश्वास बेहद अहम है। सत्ताधारी पार्टी के प्रमुख नेताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से यह माना है कि इस तबके का झुकाव विपक्षी दलों की ओर रहा है। ऐसे मतदाता समूहों को जब यह विश्वास रहेगा कि जिस राजनीतिक दल के समूह के पक्ष में ये खड़े हैं वह राजनीतिक सत्ता हासिल कर सकती है तो वे ऐसे समूहों के करीब आएंगे।

हालांकि, जो लोग इन पार्टियों में विश्वास जताते हैं, क्या वे या ऐसी पार्टियां ये विश्वास जगाते हैं कि सामूहिक लक्ष्यों के लिए वे पारदर्शी तरीके से मतदान कर रहे हैं? क्या ये पार्टियां ऐसे मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने के लिए ईमानदार कोशिश करती हैं? हालांकि, चुनावों के बाद जिस तरह से गठबंधन की राजनीति उभर रही है, उससे पता चलता है कि भरोसे की जगह संदेह, असफलता, अस्थिरता आदि ने ले लिया है। गठबंधन बनाने में नाकामी की वजह से इनमें विश्वास जताने वाले लोगों का भी भरोसा हिला है। क्योंकि इसमें चुनावी नाकामी का खतरा दिखा। इससे यह पता चलता है कि या तो गठबंधन से पूरी तरह से विश्वास उठ गया है या फिर काफी संदेह हैं। भरोसे पर आधारित गठबंधन बनाने में नाकाम रहने के बाद सरकार बनाने की बात सिर्फ कहने के लिए ही होती है। गठबंधन और सरकार बनाने में राजनीतिक दलों की नाकामी मतदाताओं का भरोसा तोड़ने सरीखा है। बार-बार मतदाताओं का भरोसा तोड़े जाने से भविष्य में यह जोखिम वाले मतदाताओं के लिए नैतिक बोझ बन जाता है। नैतिक ताकत के तौर पर ‘भरोसे’ का महत्व घटता जाएगा क्योंकि ऐसे मतदाता इन पार्टियों पर भरोसा करने का जोखिम लेना बंद कर सकते हैं।

इसी तरह से बहुमत वाली पार्टी का समर्थन करने वाले मतदाता ऐसी पार्टियों में विश्वास नहीं कायम कर पाएंगे क्योंकि वे ऐसी पार्टियों के साथ हमेशा बने रहते हैं चाहे उनका प्रदर्शन कैसा भी हो। ऐसी स्थिति  में भरोसे की जगह श्रद्धा ले लेती है। इस आधार पर समर्थन करने वाले लोग कारणों पर खास ध्यान नहीं देते हैं। लेकिन वोट देने वाले लोग कारणों को समझते हैं, इसके बावजूद वे श्रद्धा के आधार पर उस पार्टी को भी वोट देते हैं जिसने वादे पूरे नहीं किए। हाल के चुनावों में यह दिखा। इसमें किसानों और बेरोजगार युवाओं ने सत्ताधारी पार्टी के लिए वोट किया। जबकि इन्हें इस पार्टी के लिए इस आधार पर नहीं वोट करना चाहिए था कि इसने अपने वादे पूरे नहीं किए। अगर ये ऐसा करते तो क्या जाता कि उन्होंने खुद पर विश्वास करके ऐसा किया है। ऐसे मतदाता जो किसी एक पार्टी के लिए वोट करते हैं, उन्हें भरोसे का बोझ नहीं उठाना पड़ता क्योंकि उन्हें अपनी पार्टी का चयन करने में कोई जोखिम महसूस नहीं होता। भरोसे से मतदाताओं में स्वायत्ता आती है। लेकिन इसमें यह विश्वास होना चाहिए कि जिस पार्टी या नेता के लिए वे वोट कर रहे हैं, वे चुनावी तौर पर प्रभावी गठबंधन बनाते हुए एक जिम्मेदार सरकार बना पाएंगे। हालांकि, जोखिम लेने को स्वायत्ता और स्वनिर्णय से जोड़ा जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि समान अवसरों की राजनीति में जोखिम के नाम पर अटकलों वाली प्रवृत्ति को महत्व दिया जाए। इसलिए यह विपक्षी पार्टियों की जिम्मेदारी है कि संकट झेल रहे समूहों के जोखिम लेने की प्रवृत्ति की वे आलोचना नहीं करें। मूल सवाल यह है कि क्या विपक्षी दल इस वर्ग के मतदाताओं के परिवर्तनकारी इच्छाओं को गंभीरता से ले पाएंगे? क्या सत्ताधारी पार्टी उन परिस्थितियों को दूर करने का मजबूत साक्ष्य दे पाएगी कि जिससे ऐसे समूहों के लिए जोखिम वाली स्थितियां पैदा हो रही हैं?



गोपाल गुरू

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