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एग्जिट पोल और बाजार का खेल!

बाजार को सिर्फ स्थिरता नहीं बल्कि इसे ताकत भी चाहिए

 

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सेंसेक्स ने पहली ाश्र 40,000 अंकों का आंकड़ा पार कर लिया। सेंसेक्स में यह उछाल 20 मई से शुरू हुई थी। उसके एक दिन पहले एग्जिट पोल के नतीजे आए थे। सेंसेक्स की यह उछाल इसलिए खास लग रही है क्योंकि आधार थोड़ा कमजोर है और वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार के अनुमान प्रतिकूल हैं। लेकिन जब 6 जून को रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की घोषणा की तो बाजार में 400 अंकों की गिरावट दर्ज की गई।

हाल के दिनों में बाजार में आई इस उछाल के बारे में कहा जा सकता है कि एग्जिट पोल से अधिक बाजार पर न तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार और न ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 की सरकार की किसी नीति का असर रहा। ऐसा क्यों? शेयर बाजार की चाल दो बातों पर निर्भर करती है। पहली तो यह कि जिन कंपनियों के शेयरों का व्यापार होता है, उनके दीर्घावधि से संबंधित बुनियादी संकेतक कैसे हैं। दूसरी बात यह है कि तात्कालिक तौर पर क्या अनापेक्षित झटके आ रहे हैं। ऐसे में उछाल को अटकलों पर आधारित अल्पकालिक और मजबूत संकेतकों पर आधारित दीर्घकालिक के तौर पर देखना होगा। लेकिन अब दोनों में अंतर करना मुश्किल हो गया है। आज जो उछाल अटकलों पर आधारित लगती है, उसमें कल कंपनी को मुनाफा मिलने लग जाता है। लेकिन फिर भी यह सवाल उठता है कि आखिर पिछले कुछ हफ्तों में ऐसा क्या हुआ कि शेयर बाजार में तेजी लगातार दिखी?

पहली बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार के आसानी से बहुमत पा लेने का अनुमान हर एग्जिट पोल में लगाया गया। दूसरी बात यह कि इससे निवेशकों को यह लगा कि स्थायी सरकार होने से दीर्घकालिक तौर पर उपयुक्त कारोबारी माहौल बना रहेगा। लेकिन यह उम्मीद पर्याप्त नहीं थी। खास तौर पर उस सरकार से जो अपने पहले कार्यकाल में आर्थिक मोर्चे पर अपेक्षित नतीजे देने में कामयाब नहीं रही हो। एक अक्षम सरकार की वापसी निवेशकों के लिए अच्छी खबर नहीं है। तो फिर ऐसा क्यों हुआ? निवेशकों को यह उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी के ‘मजबूत’ नेतृत्व में आर्थिक सुधार से संबंधित वैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं जो सामान्य तौर पर नहीं उठाए जाते। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश के साथ-साथ श्रम सुधारों को नाम इस श्रेणी में लिया जा सकता है। मोदी ने जिस तरह से विमुद्रीकरण का अलोकप्रिय फैसला किया था, उसे देखते हुए काॅरपोरेट जगत को उनसे इन कदमों की उम्मीद दूसरे कार्यकाल में है।

तीसरी बात यह कि भारतीय अर्थव्यवस्था की तात्कालिक प्रदर्शन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि दुनिया में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में भारत की अर्थव्यवस्था है। यह हैरान करने वाली बात है। क्योंकि पिछली तिमाही से आर्थिक प्रदर्शन ठीक नहीं है। इसके बावजूद निवेशक जोखिम ले रहे हैं। इसकी एक वजह यह है कि इन्हें उम्मीद है कि तेल की घटती कीमतों की वजह से अधिक समावेशी मौद्रिक नीति अपनाई जाएगी। बाॅन्ड पर कम रिटर्न मिलने से शेयर में निवेश बढ़ जाता है। यह भी उम्मीद थी कि ब्याज दर कम होने से काॅरपोरेट और घरेलू निवेश बढ़ेगा। इससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। लेकिन रिजर्व बैंक ने मिश्रित संकेत दिए हैं। ब्याज दर कम करने के साथ-साथ रिजर्व बैंक ने अपेक्षित विकास दर को भी संशोधित करके कम कर दिया है। नाॅन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के नगदी के संकट पर रिजर्व बैंक की ओर से कुछ नहीं कहा गया।

चौथी बात यह है कि 2019 में विदेशी निवेश बड़े पैमाने पर आया है। इसमें एक हिस्सा तो निवेश के मूल स्रोत की वजहों से है। चीन और अमेरिका में चल रहा व्यापार युद्ध, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में धीमी सुधार, अमेरिका की मौद्रिक नीतियों में नरमी की संभावना और अमेरिका में बाॅन्ड पर कम हुआ रिटर्न इसकी वजहों में शामिल हैं। जहां तक निवेश आकर्षित करने वाली वजहों की बात है तो ये घरेलू निवेशकों को प्रभावित करने तक सीमित हैं।

बाजार का रुख सही है या नहीं लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि कम समय में होने वाले उतार-चढ़ाव टिकते नहीं हैं। अगर शेयर बाजार का सूचकांक जरूरत से अधिक स्तर पर है तो यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है। खास तौर पर अस्थिर वैश्विक माहौल में। इससे निपटने के लिए बाजार अर्थव्यवस्था को मानने वाले अल्प अवधि के कैपिटल गेन कर की वकालत करते हैं। लेकिन साथ ही साथ नीतियां ऐसी भी नहीं होनी चाहिए जिससे शेयर बाजार हतोत्साहित हो। क्योंकि इसके जरिए अविभाज्य पूंजी का विभाजन होता है और निवेश का जोखिम घटता है। कायदे से तो सरकार को अर्थव्यवस्था की लगाम अपने हाथ में रखनी चाहिए। इसके लिए सक्रिय वित्तीय नीति अपनानी चाहिए। न कि काॅरपोरेट और घरेलू निवेश को अप्रत्यक्ष रूप से ब्याज दरों मे बदलाव करके प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। दुर्भाग्य से मौजूदा सरकार राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम की बात बुरी से बुरी परिस्थिति में करती है। इससे अर्थव्यवस्था बाजार के उतार-चढ़ावों और कंपनियों के निर्णयों से प्रभावित होती है, जो जरूरी नहीं है कि हर बार अर्थव्यवस्था की तकदीर से सही ढंग से संबंधित हों।

Updated On : 20th Jun, 2019

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