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स्वतंत्रता, सत्ता और सच

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भारत एक बार फिर से एक मोड़ पर है. एक तरफ लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने वाले जश्न मनाने में व्यस्त हैं तो दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी के लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि स्वतंत्र सोच की जगह संकुचित होती जा रही है. सत्ता और स्वतंत्रता के बीच   जो बदलाव लाने वाले संबंध हैं और जिससे सच सामने लाने में मदद मिलती है, उसे झटका लगा है। सत्ता और स्वतंत्रता के सौम्य गठजोड़ को मुक्ति के लिए चले सबाल्टर्न संघर्ष अभिव्यक्त किया गया है। अब इसकी जगह बहुलतावादी मूल्यों को स्थापित करने की कोशिशें हो रही हैं। बहुसंख्यक भारत की सोच को आगे बढ़ाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है और इससे भय, नफरत और शोषण की स्थिति पैदा हो रही है। ये सब मिलकर जो सच गढ़ रहे हैं, उसमें बल प्रयोग शामिल है।

जब सत्ता और स्वतंत्रता प्रतिगामी मोड़ लेते हैं तो इससे संकटों का सामना कर रहे समूहों पर काफी प्रतिकूल असर पड़ता है। इन सामाजिक वर्गों के खिलाफ हिंसा में शामिल वर्ग किसी तरह का भय महसूस नहीं करता। यह 2016 में गुजरात के उना में तब दिखा था जब चार दलित युवाओं को सार्वजनिक तौर पर हिंसा का शिकार होना पड़ा था। सरकारी अस्पताल में काम करने वाली दोहरे तौर पर वंचित एक डाॅक्टर की आत्महत्या ऐसी ही एक हालिया घटना है। उच्च शिक्षण संस्थानों में और उनमें भी मेडिकल संस्थानों में कई दलित और आदिवासी छात्रों ने खुदकुशी की है। राजनीतिक सत्ता उस वक्त विभाजनकारी हो जाती है जब इसके जरिए वंचितों के जीवन से खिलवाड़ शुरू हो जाता है। ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि किस तरह से बल प्रयोग हो रहा है। बल प्रयोग में छिपा सच लोकतांत्रिक विरोध को भी स्वीकार नहीं करता। इसमें विमर्श की कोई जगह नहीं होती। न ही यह अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनता है। 

एक ऐसा सच जिसमें अत्याचारों और हिंसा को लेकर चिंता नहीं है, उसमें न तो आत्मा की भाषा के लिए कोई सम्मान का भाव होगा और न ही महात्मा गांधी के लिए। गांधी के लिए सच का मतलब खुद के साथ विमर्श के जरिए नैतिक शुद्धता भी रहा है। इसमें खुद से कड़े सवाल पूछना शामिल है। वहीं जबर्दस्ती के सच में न तो दिमाग लगाया जाता है और न ही इसमें भीमराव अंबेडकर जैसे लोगों के विचारों की कोई जगह नहीं बचती। फिर भी मौजूदा सत्ता इसके पक्ष में दिखती है। अंबेडकर की सत्य की जो धारणा थी, उसमें मजबूत और पारदर्शी विमर्श की जगह थी। इसके जरिए मनमाने दावों का परीक्षण किया जा सकता था। गांधी के लिए स्वतंत्रता और आत्मा का मेल जरूरी है वहीं अंबेडकर इसके दिमाग से मेल की बात करते हैं। गांधी और अंबेडकर की सत्याग्रह की अवधारणा में यह सोच दिखती है। इन चिंतकों के लिए बातचीत और विमर्श बेहद अहम रहे हैं। इसके लिए इन लोगों ने संवाद पर जोर दिया। जाति जैसी सच्चाइयों को सार्वजनिक किया जाना इसका प्रतीक है।

इन सनातन सवालों का सामना एकतरफा खारिज करने के भाव के साथ नहीं होना चाहिए बल्कि पारदर्शी विमर्श के जरिए इनका समाधान होना चाहिए। इसमें अकादमिक जगत के लोगों के साथ-साथ आम लोगों को भी शामिल होना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि कई अहम सवालों के जवाब लोगों के जातिगत और लैंगिक आचरणों में निहित हैं। बौद्धिक लोगों को इन सच्चाइयों से सत्ता प्रतिष्ठानों को अवगत कराना चाहिए। हमें उन बौद्धिक लोगों के प्रति थोड़ा उदार रहना चाहिए जिनके लिए सच बोलना सिर्फ रस्म अदायगी नहीं है बल्कि जो बराबरी जैसे मूल्यों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध बने रहते हैं। ये उनकी खुद की आंतरिक प्रतिबद्धता है जो वे इन मसलों पर बोलते हैं। एक बौद्धिक व्यक्ति की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे सोचने वाले लोगों के साथ ही सोचते हैं। वे लोगों में वैचारिक जुड़ाव के लिए एक पुल की तरह काम करते हैं। इन वजहों से बौद्धिक लोगों को पूरी स्वतंत्रता के साथ अपनी बात रखने का अवसर मिलते रहना चाहिए। नेताओं की ओर से जो भाषण दिए जा रहे हैं, उसकी पुष्टि को लेकर समस्याएं हैं। लोगों को एक-दूसरे के साथ और सामूहिक तौर पर भी अधिक संवाद करना चाहिए ताकि लोग एकजुट होकर बेहतर मानवीय अस्तित्व की ओर बढ़ सकें।



गोपाल गुरू

 

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