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एक और सांस्थानिक हत्या

पायल तड़वी की मौत से पता चलता है कि किस तरह से उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को अनदेखा किया जा रहा है

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मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल की 26 साल की रेजीडेंट डाॅक्टर पायल तड़वी की मौत से पता चलता है कि मेडिकल काॅलेजों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उन्हें कथित तौर बीवाईएल नायर अस्पताल से संबद्ध टोपीवाला नैशनल मेडिकल काॅलेज की तीन वरिष्ठ रेजीडेंट डाॅक्टरों के उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा था। इस वजह से उन्होंने आत्महत्या की। उनके परिवार ने काॅलेज प्रशासन से औपचारिक शिकायत किया था कि कैसे उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

तड़वी की मौत के बाद सांस्थानिक मशीनरी हरकत में आई। तीन डाॅक्टरों और उनके यूनिट के प्रमुख को निलंबित किया गया। रैगिंग रोकने वाली समिति ने जांच शुरू की। उनकी मौत के एक हफ्ते बाद समिति ने यह पाया कि तड़वी को वाकई भेदभाव और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ रहा था। अनुसूचित जाति से होने की वजह से और एससी/एसटी कोटे में दाखिला की वजह से उन्हें कई तरह की टीका-टिप्पणी का शिकार होना पड़ रहा था। उसी मेडिकल काॅलेज के एससी/एसटी समुदाय के कई डाॅक्टर और छात्र और सामने आए हैं जो अपने इसी तरह के अनुभव बता रहे हैं।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रतिनिधि यह कहते हैं कि मेडिकल क्षेत्र में कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता है। इसलिए इसे दूर करने पर कोई खास ध्यान देने की जरूरत नहीं है। जबकि मेडिकल काॅलेजों में अगड़ी जाति के लोगों की ओर से पिछड़ी जाति के विद्यार्थियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। थोराट समिति ने 2007 की रिपोर्ट में बताया था कि एम्स जैसे संस्थानों में भी जातिगत भेदभाव बहुत सामान्य है। इस रिपोर्ट को आए हुए दस साल होने के बावजूद तड़वी की खुदकुशी यह बताती है कि संस्थानों में अब भी इस तरह के भेदभाव सामान्य हैं।

संस्थानों में चल रहे रैगिंग को लेकर संस्थानों ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई है। छात्रों और जूनियर डाॅक्टरों का उत्पीड़न सामान्य है। ऐसा करने वालों को भी इस बात का डर नहीं होता कि उनके खिलाफ कुछ होगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को 2013 से 2017 के बीच रैगिंग की 3,022 शिकायतें मिली हैं। वहीं बहुत सारी ऐसी घटनाएं हुई होंगी जिनकी शिकायत नहीं की गई होगी। यूजीसी ने अपनी रिपोर्ट में यह बताया है कि 84.3 फीसदी छात्र शिकायत नहीं दर्ज कराते। क्योंकि उन्हें काॅलेज प्रशासन पर विश्वास नहीं होता है। साथ ही उनके मन में यह डर भी रहता है कि उनके सीनियर उनके करिअर पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं और कैंपस में उन्हें बहिष्कृत किया जा सकता है।

जो छात्र एससी/एसटी कोटे के तहत दाखिला हासिल करते हैं, उनके मन में और डर पैदा किया जाता है और वे शिकायत करने से बचने लगते हैं। यही वजह है कि तड़वी और उनके अभिभावकों की कई शिकायतों के बावजूद काॅलेज प्रशासन ने कुछ नहीं किया। यहां तक की शिकायत मिलने की भी बात नहीं कही। यह भी पता चला कि इस काॅलेज की रैगिंग प्रतिरोधी समिति की पिछले डेढ़ साल में कभी बैठक तक नहीं हुई। तड़वी के परिजनों का कहना है कि शिकायत के बाद उनका उत्पीड़न और बढ़ गया। इस तरह की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं करने से दूसरों को शिकायत करने का हौसला नहीं मिलेगा। बहुत सारे विद्यार्थी चुपचाप या तो सहते रहेंगे या काॅलेज छोड़ देंगे। या फिर स्थितियां बहुत खराब होने पर अपना जीवन खत्म करने का निर्णय ले लेते हैं। जब तक काॅलेज प्रशासन और शिक्षकों में एससी/एसटी समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ता है तब तक स्थितियों में जरूरी सुधार नहीं होगा। तड़वी के मामले में जो हुआ, वह कई संस्थानों की कहानी है।

इस घटना के बाद हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की मौत की घटना का फिर से स्मरण हुआ। उनकी खुदकुशी को सांस्थानिक हत्या बताया गया था। उस घटना के बाद एक रोहित अधिनियम की मांग उठी थी जिसके जरिए वंचित समुदायों के छात्रों को सुरक्षा देने का प्रावधान करने का प्रस्ताव था। हालांकि, ऐसा कोई भी कानून तब ही प्रभावी होगा जब संस्थान और इनके लोग सामाजिक भेदभाव को स्वीकार करके स्थितियों में सुधार के लिए काम करेंगे। रैगिंग से बढ़ते-बढ़ते गंभीर उत्पीड़न तक बढ़ा भेदभाव हिंसा को जन्म दे रहा है और मानवाधिकारों का हनन कर रहा है। इससे सम्मान के साथ शिक्षा हासिल करने का हक छीना जा रहा है। इस बात को समझकर इसके समाधान करने की दिशा में बढ़ना तड़वी, वेमुला और चुपचाप उत्पीड़न का सामना कर रहे हजारों छात्रों के साथ न्याय होगा।

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