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निराशा के खिलाफ

चुनावी हार के बाद जवाब देने में फिसलन से बचने के लिए विपक्ष को क्या करना चाहिए?

 

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भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जीत आकार और अंतर के मामले में बड़ी है। हालांकि, इस जीत पर अतिरेक में किसी तरह की प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। क्योंकि इससे गंभीर विश्लेषण नहीं हो पाएगा। गंभीर विश्लेषण के लिए वक्त की जरूरत होती है। इसमें लोकतंत्र के विभिन्न साझीदार शामिल होते हैं। हालांकि, हम देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के समर्थक अति उत्साह के साथ जश्न मना रहे हैं। वहीं विपक्ष में निराशा का माहौल है। जिस बड़े पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल एनडीए ने इस जीत के लिए किया उस संदर्भ में यह भी देखा जाना चाहिए कि आखिर विपक्ष में इतनी निराशा क्यों है। क्योंकि एक स्वस्थ्य लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष को होना भी जरूरी है।

निराशा का यह माहौल विभिन्न ढंग से दिख रहा है। विपक्षी खेमे में आपस में आरोप-प्रत्यारोप का माहौल है। कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी पार्टियां भाजपा के मजबूत गढ़ में सेंध लगाने में नाकाम रही हैं। 2014 के बाद से भाजपा से सीधे मुकाबले में कांग्रेस ने लगातार सीटें गंवाई हैं। हाल ही में जिन तीन राज्यों में कांग्रेस को कामयाबी मिली थी, उन राज्यों में भी कांग्रेस की हार चिंताजनक है। कर्नाटक, महाराष्ट्र और अमेठी में भी मजबूत किलों को कांग्रेस नहीं बचा पाई है। इस तरह का प्रदर्शन लोकतांत्रिक तौर पर चिंता की बात है। विपक्ष को एकजुट करने की नाकामी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उत्तर प्रदेश और बिहार की सामाजिक सच्चाइयों के साथ गठबंधन करने में पार्टी नाकाम रही।

भाजपा के प्रदर्शन में उत्तर और दक्षिण का एक स्पष्ट विभाजन दिखता है। यह विश्लेषण खुद को धोखा देने जैसा है। भाजपा ने न सिर्फ कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में सफलता हासिल की बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि क्षेत्रीय स्तर पर विकल्प देने की स्थिति कमजोर पड़ी है। यह भी देखना होगा कि गैर-भाजपा और गैर-एनडीए वोट कितने हैं। पिछले पांच साल में 31 फीसदी बनाम 69 फीसदी की बात चलती थी। मौजूदा चुनावी व्यवस्था की सच्चाइयों की अनदेखी करके भाजपा के खिलाफ विमर्श गढ़ने की कोशिश की गई थी। इसमें चुनावों से संबंधित अंकगणित पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया।

यह विपक्ष के लिए भी जरूरी है कि वह खुद का मान-मर्दन में न लगे और न ही जनता के चरित्र पर कोई अंतिम निर्णय सुनाए। यह भाजपा को मिले वोटों को देखते हुए ठीक नहीं है। कई राज्यों में भाजपा को 50 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं। मध्य भारत के राज्यों में भाजपा बड़े अंतर से चुनावों में जीती है। प्रथम दृष्टया इससे पता चलता है कि भाजपा के एजेंडे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा का लोगों ने समर्थन किया। लेकिन इसके लिए जनता को कसूरवार ठहराने का काम नहीं चलना चाहिए। क्योंकि इससे राजनीति से दूरी बना लेने का खतरा पैदा होता है। इससे शक्तिविहीन सच का महिमामंडन होने लगता है। हमें यह भी समझना चाहिए कि कई बार लोगों को भी ठग लिया जाता है। अब नई जनता तो आ नहीं सकती है, इसलिए विपक्ष को इन्हीं लोगों को एकजुट करना होगा। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने भाजपा और एनडीए के पक्ष में मतदान किया है।

भाजपा के एजेंडे और राजनीतिक परियोजना के सामाजिक चरित्र को इस पार्टी ने भारतीय समाज में स्थापित करने की कोशिश की है। विपक्ष को निष्पक्षता और सदभाव के मसले पर अपना सामाजिक आधार तैयार करनाहोगा। इसके लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की जरूरत है। खुद को ही सही या गलत मानना और खुद का मान-मर्दन करने से बाहर निकलकर काम करना विपक्ष के लिए बेहद जरूरी है।

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