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5जी गाथा की पड़ताल

हुआवे पर अमेरिका पर लगा गया प्रतिबंध बाजारी प्रतिस्पर्धा की रणनीति है या फिर डिजिटल जगत को सरकार द्वारा नियंत्रित करने की रणनीति है?

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

आर्थिक एकीकरण के 40 साल बाद अमेरिका और चीन अपने मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व में आर्थिक तनावों की एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां दोनों देश संयम को लेकर प्रतिबद्ध नहीं दिख रहे हैं। सच तो यह है कि दोनों देशों के नेता वस्तुओं, पूंजी, व्यक्ति और तकनीक के स्तर पर अलग-अलग होने की वकालत कर रहे हैं। अमेरिका ने चीन के निवेश पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। चीन से आने वाले युवा छात्रों को रोकने का काम भी अमेरिका विज्ञान और इंजीनियरिंग की पढ़ाई में कर सकता है। ऐसे में वैश्विक नवाचार तंत्र एक एकीकरण खतरे में है। अमेरिका और चीन एक-दूसरे को इससे अलग करना चाह रहे हैं। इस कड़ी में हाल ही में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने चीनी दूरसंचार कंपनी हुआवे पर कई तरह के प्रतिबंधों की घोषणा की है।

1987 में हुआवे की शुरुआत हांगकांग से आयात करके टेलीफोन स्विचिंग उपकरण बेचने से हुई थी। अब यह दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है जो दूरसंचार उपकरणों की आपूर्ति करती है। अत्याधुनिक दूरसंचार उपकरणों की आपूर्ति में इसका मुकाबला नोकिया और इरिक्सन जैसी कंपनियों से है। हुआवे की हालिया पहचान पांचवी पीढ़ी के दूरसंचार यानी 5जी नेटवर्क लगाने को लेकर बनी है। पूरी दुनिया में जितना 5जी नेटवर्क विकसित होना है, उसका 33 फीसदी अकेले चीन में 2025 तक विकसित होना है। वहीं अमेरिका और पश्चिम यूरोप की हिस्सेदारी तकरीबन 25 फीसदी होगी। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया में भविष्य की जो तकनीक है उसके केंद्र में चीन और वहां की कंपनी हुआवे रहेगी। चीन ने 2018 में कुल 53,435 पेटेंट फाइल किए हैं। इनमें दस फीसदी सिर्फ इस कंपनी के हैं। डिलोआइट के मुताबिक 2015 से 2018 के बीच चीन ने 5जी के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने में अमेरिका से 24 अरब डाॅलर अधिक खर्च किए हैं।

पहले की तकनीक के मुकाबले 5जी नेटवर्क पर और तेज गति से डाटा का संचार होगा। डाटा संचार में देरी को कम करने के लिए काफी पैसे खर्च करने होते हैं। हुआवे ने हाइबरनिया अटलांटिक के साथ मिलकर लंदन और न्यूयाॅर्क को जोड़ने के लिए अटलांटिक समुद्र में 3,000 मील की हाइबरनिया एक्सप्रेस फाइबर आॅप्टिक लिंक बिछाने की शुरुआत 2011 में की थी। पांच मिलिसेकेंड की देरी को कम करने के लिए 40 करोड़ डाॅलर का निवेश किया गया। इसी तरह से 5जी नेटवर्क के तहत भी जो शुरुआती बुनियादी ढांचा विकसित होना है, उस पर काफी पैसे खर्च होने हैं। यह तय है कि 5जी के आने के बाद पैसे कमाने के अतिरिक्त स्रोत विकसित होंगे लेकिन यह तय नहीं है कि इसमें कितनी हिस्सेदारी सेवा देने वाली कंपनी की होगी।

4जी के संदर्भ में अमेरिका में शुरुआत में निवेश करने वाली कंपनियों के अनुभव से यह बात सामने आई कि इससे इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों को विशेष लाभ नहीं हुआ। इससे कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा और इंटरनेट आधारित सेवा देने वाली कंपनियों ने अधिक पैसे बनाए। जबकि इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों में आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ने से प्रति उपभोक्ता इनकी औसत आय कम हुई।

इस संदर्भ में 5जी लागू करने में नेटवर्क की साझीदारी उपयोगी हो सकती है। लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी इसके लिए तैयार नहीं हैं। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने कम होती आमदनी के बावजूद गति ओर नेटवर्क क्षमता को मूल्यों की प्रतिस्पर्धा का आधार बना लिया है? चीन में हर दस वर्ग मील में 5जी नेटवर्क घनत्व 5.3 है जबकि अमेरिका में यह 0.4 है। चीन में 10,000 लोगों पर 5जी नेटवर्क साइट की संख्या 14.1 है जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 4.7 है। यह सबको मालूम है कि 5जी से डाटा के नए इस्तेमाल के रास्ते खुलेंगे। इससे चीन के प्रतिस्पर्धियों की परेशानी बढ़ी है।

नेटवर्क विकसित करने को लेकर चल रही तनातनी को जिंदा रखकर अमेरिका और उसके सहयोगी डिजिटल जगत में सरकार के हस्तक्षेप की जमीन तैयार कर रहे हैं। एक तरफ सब्सिडी है जिससे उन्हें वैश्विक बाजार में मूल्यों के मामले में लाभ मिलेगा। लेकिन बड़ी समस्या सरकार द्वारा की जाने वाली जासूसी है जो विशाल डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के जरिए की जा सकती है। इससे समकालीन राजनीतिक तंत्र के वैचारिक संकटों के बीच के संबंध और धुंधले दिखते हैं। चीन खुले तौर पर डाटा संप्रभुता और सीमाओं के पार के इसके प्रवाह को रोकने में सरकार की भूमिका की बात कर रहा है। अमेरिका और यूरोपीय संघ इसी दिशा में चुपचाप काम कर रहे हैं। ऐसे में इनके वास्तविक राजनीतिक संबंधों के बारे में क्या पता चलता है। क्या ये लंबे समय के एक-दूसरे के विरोधी हैं या फिर रणनीतिक प्रतिस्पर्धी?

 
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