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फोनी चक्रवात के बीच में जाति

प्राकृतिक आपदाओं का सामाजिक भेदभाव पर कोई नियंत्रण नहीं होता

 

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हाल में फोनी चक्रवात के बाद ओडिशा में जिस तरह का जातिगत भेदभाव देखा गया वह 2004 के सुनामी और 2001 के गुजरात भूकंप के बाद के भेदभाव से अलग है। यह सिर्फ विध्वंश की क्षमता की वजह से अलग नहीं है बल्कि नैतिक तौर पर भी अलग है। अगड़ी जातियों के लोगों की ओर से निचली जातियों को लोगों को आश्रय देने के मामले में मानवीय मूल्यों की अनदेखी की बात आई। एक ऐसी घटना मीडिया में आई जिसमें चक्रवात से प्रभावित पुरी जिले के दलितों को न सिर्फ एक आश्रय गृह में प्रवेश करने से रोका गया बल्कि जिस आश्रय गृह में इनमें से कुछ लोग थे, उन्हें भगाया भी गया। इसके बाद इन्हें बरगद के पेड़ के नीचे आश्रय लेना पड़ा। वह पेड़ भी उखड़ गया। इसके बाद 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाले तूफान और मूसलाधार बारिश में इन्हें वहीं खुले में रहने को बाध्य होना पड़ा।

आपदा के दौरान होने वाला यह जातिगत भेदभाव आपदा के बाद के भेदभाव से अलग है। सुनामी के बाद तमिलनाडु में और भूकंप के बाद गुजरात में राहत सामग्री वितरण में जातिगत भेदभाव देखा गया था। बिहार से भी बाढ़ के बाद यह खबर आई थी कि राहत सामग्री का वितरण इस तरह से किया जा रहा है कि यह गरीबों और दलितों तक नहीं पहुंचे। अमीर लोगों की छतों पर खाने और दवाओं के पैकेट गिराए जा रहे थे। दलितों की पहुंच उन छतों तक नहीं थी। हालांकि, यह भी संभव है कि सेना के जवानों ने पानी में ये पैकेट गिराने के बजाए छतों पर गिराना अधिक उचित समझा हो। इसके आधार पर यह कह सकते हैं कि आपदा आधारित भेदभाव ढांचागत है। क्योंकि मानवीय पूर्वाग्रह इस्तेमाल आधारित होता है। यहां इस पर ध्यान दिया गया कि खाना और दवाओं का पैकेट बर्बाद नहीं हो। लेकिन इस संदर्भ में हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या ओडिशा की अगड़ी जाति के लोगों को दलितों को आश्रय गृहों में नहीं घुसने देने का या उन्हें इससे बाहर निकालने का कोई अधिकार है? मीडिया में यह खबर आई कि दलितों को बाहर करने की बात पर यह सफाई दी गई कि आश्रय गृह पहले से ही काफी भरा था और इसमें और लोगों के लिए जगह नहीं थी।

इसका मतलब यह हुआ कि सामूहिक लाभ के लिए दलितों को अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ेगा। अगर कोई इस बचाव को मानता है तो वह कहेगा कि प्रवेश रोके जाने का जाति से कोई मतलब नहीं है। हालांकि, यह भी सच है कि आश्रय गृहों तक दलितों के मुकाबले अगड़ी जातियों लोग जल्दी पहुंचते हैं। लोग पहले आओ और पहले पाओ की बात कर रहे हैं। लेकिन उन आश्रय गृहों का क्या जहां दलित पहले से थे और उन्हें बाहर निकाला गया। इससे पता चलता है कि जातिगत भेदभाव हुआ।

अगर आश्रय की जगह किसी की निजी होती तो अगड़ी जातियों द्वारा दलितों को रोके जाने को कोई सही ठहरा सकता था। लेकिन यहां तो सार्वजनिक स्थानों को निजी स्थानों में बदलने की कोशिश हुई। ऐसा करके दलितों को उनके हक से वंचित किया गया।

आश्रय गृह एक सरकारी स्कूल में था और इसमें प्रवेश का अधिकार दलितों का भी उतना ही था जितनी अगड़ी जातियों का। लेकिन अगड़ी जाति के लोगों को नहीं लगा कि यह अधिकार दलितों का भी है। प्रभुत्व वाली जातियों के भय से दलितों ने अपने अधिकार की रक्षा के लिए आवाज नहीं उठाई। 

अगड़ी जातियों के इस रुख से यह भी पता चलता है कि उन्होंने नैतिकता पर जातिगत पहचान को तरजीह दी। पहली बात तो यह कि उन्होंने यह नहीं माना कि दलितों को भी आश्रय के मामले में बराबरी का अधिकार है। दूसरी बात यह कि उन्होंने नैतिक तौर पर भी दलितों को बराबर का इंसान नहीं माना। अगड़ी जातियों के लोगों ने अपनी जिंदगी बचाने के अधिकार को आगे रखा और अपनी सामाजिक स्थिति का लाभ उठाकर दलितों की जिंदगी को अधर में छोड़ दिया।

प्राकृतिक आपदाएं इंसानों में भेदभाव नहीं करतीं। वे सबको बराबरी से प्रभावित करती हैं। प्रकृति की मार सबके लिए एक समान है। लेकिन इंसान आनी रक्षात्मक क्षमताओं से प्राकृतिक आपदाओं के परिणामों के प्रति भेदभाव का रुख अपनाता है।

 

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