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झटके झेलनेवालों का राजनीतिक उत्पादन

वैध आलोचकों से जुड़े नहीं होने से अभिव्यक्ति की आजादी सीमित होती है
 
 

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अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन का आयोजन 11 जनवरी को महाराष्ट्र के यवतमाल में हुआ. इसके 92वें संस्करण के उदघाटन के लिए नयनतारा सहगल को बुलाने के फैसले का बचान इसके आयोजक नहीं कर पाए. कई लोगों ने सहगल को बुलाए जाने की आलोचना की. लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देने वाले इस पूरे घटनाक्रम से तीन सवाल पैदा होते हैं. निमंत्रण वापस लेना निश्चित तौर पर निश्चित तौर पर आत्म सम्मान कम करने वाला है. लेकिन इससे किसका आत्म सम्मान कम होगा बुलाने वाले का या जिसे बुलाया गया. दूसरी बात यह कि इस तरह का यू टर्न किसके प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव में लिया गया? तीसरी बात यह कि क्या ऐसी घटनाओं से अभिव्यक्ति की आजादी से मूल्यों में गिरावट आती है?
 
इस आयोजन के आयोजक अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल के सचिव ने इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कहा कि उनके आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाई गई और उनका अपमान किया गया. फिर सवाल यह उठता है कि क्यों बाकी लोग और खुद सचिव अपने अपमान में क्यों सरीक हुए? इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि राजनीतिक ताकतें किसी को अपमानित करने में हिस्सा क्यों ले रही हैं? इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि आयोजन समिति के कुछ लोग खुद को झटका झेलनेवाले के तौर पर खुद ही पेश कर रहे थे. क्योंकि इससे उनकी पेशेवर और राजनीतिक महत्वकांक्षाएं पूरी हो रही थीं. महत्वकांक्षाओं की इसी मजबूरी में आयोजकों ने निमंत्रण रद्द करने पर होने वाली आलोचनाओं को झेलने का काम किया. इसके अलावा आयोजकों ने राज्य सरकार के झटकों को भी झेला.
 
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने आयोजन समिति के निर्णय से खुद को अलग कर लिया. यह संभव है कि उदघाटन भाषण रद्द करने के निर्णय में सरकार की कोई भूमिका नहीं हो. लेकिन इस तथ्य को कोई दरकिनार नहीं कर सकता कि इस निर्णय से सरकार को फायदा होगा.
राज्य सरकार इस बात की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती कि उसने आयोजकों के सामने अपमानजनक स्थिति पैदा की. मराठी साहित्य के प्रमुख लोगों ने जब इस फैसले की तीखी आलोचना शुरू की तो महाराष्ट्र के सत्ताधारी गठबंधन ने झटके झेलनेवालों की आड़ में बचने की कोशिश की. ऐसे लोगों का राजनीतिक उत्पादन यह दिखाता है कि कैसे पार्टी और सरकार के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट आई है.
 
सहगल के भाषण में सत्ता के सामने सच बोला गया था. लेकिन केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार वैध आलोचना सुनने तक की स्थिति में नहीं है. इस संदर्भ में इसी आयोजन के 1975 के 51वें संस्करण को याद किया जा सकता है. कराड़ में आयोजित उस कार्यक्रम में उस वक्त दुर्गा भागवत ने आपातकाल लगाए जाने की कठोर आलोचना की थी. केंद्रीय मंत्री वाई.बी. चव्हाण भी कार्यक्रम में उपस्थित थे. सत्ताधारी वर्ग द्वारा बहस-मुबाहिसों में शामिल नहीं होना दिखाता है कि जो मुद्दे चल रहे हैं, उनमें उनकी कितनी दिलचस्पी है. ये लोग सिर्फ सत्ता में काबिज होने के विषयों में दिलचस्पी लेते हैं. बराबरी, न्याय और आत्मसम्मान जैसे लोकतांत्रिक विषयों में उनकी रुचि नहीं है. जबकि इन विषयों पर विचार-विमर्श जरूरी हैं. अगर कोई किसी विषय पर बाहर के लोगों से बातचीत के लिए तैयार नहीं है तो उसे कम से कम अपने लोगों में इन विषयों पर बातचीत करनी चाहिए. लेकिन हमें नहीं पता कि सत्ताधारी पार्टी में इन विषयों पर बातचीत होती है या नहीं। ऐसे में विचारधारा के आधार पर दूसरे के विरोध करना का ही विकल्प बचता है, क्योंकि दूसरे लोग इनकी सोच को चुनौती देते हैं. भीम राव आंबेडकर ने 1936 के जात-पात-तोड़क मंडल के लाहौर में आयोजित सालाना सम्मेलन के उदघाटन भाषण में ऐसा करने की कोशिश की थी. लेकिन वे भी भाषण नहीं दे पाए थे और अब सहगल के साथ ऐसा ही हुआ.
 
सहगल के पक्ष में आयोजकों के विरोध में साहित्य जगत उठ खड़ा हुआ. इन लोगों ने इस बात का भी विरोध किया कि सहगल की जगह किसी और साहित्यकार से उदघाटन कराया जाए. इससे पता चलता है लोकतांत्रिक मूल्यों के बचाव में खड़ा होने वाले लोगों की चेतना बनी हुई है. इससे यह भी पता चलता है कि जो लोग अभिव्यक्ति की आजादी के विरोधी हैं, वे ढलान पर हैं.

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