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परमाणु हथियारों को जिम्मेदारी से रखना

परमाणु हथियारों को लेकर चुनावों में गैरजिम्मेदारी वाले बयान से पारस्परिक भ्रम कायम होगा

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मीडिया में यह खबर आई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान में परमाणु हथियारों के बारे में बगैर जिम्मेदारी वाला एक बयान दिया है। उन्हें यह कहते हुए उदघृत किया गया है, ‘क्या हमने अपने परमाणु हथियार दीवाली के लिए रखे हैं?’ उनके पहले किसी प्रधानमंत्री ने परमाणु हथियारों को लेकर ऐसी बात नहीं की। लेकिन मोदी ने जो बातें कही हैं, वह उनकी छवि के अनुकूल ही है। इससे भारत की परिपक्व और जिम्मेदार परमाणु संपन्न देश होने की छवि कमजोर हुई है।
 
भारत ने 1974 में न्यूनतम परमाणु रक्षा क्षमता हासिल की थी। लेकिन कानूनी, तकनीकी और भूराजनीतिक वजहों से इसे सार्वजनिक नहीं किया था। 1998 में भारत ने खुद को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित कर दिया था और परमाणु तिकड़ी बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए थे। इसके बावजूद भारत ने हमेशा यह संकेत दिया कि वह एक जिम्मेदार परमाणु संपन्न देश हैं और यह क्षमता सिर्फ अपने बचाव के लिए है और भारत कभी पहले इसका इस्तेमाल नहीं करेगा। इसके बावजूद मोदी द्वारा चुनावों में इस तरह की बात करने से उस क्षेत्र पर बुरा असर पड़ेगा जिसे खुद परमाणु संपन्न जटिल क्षेत्र माना जाता है।
 
पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेता इस तरह की बातें पहले करते आए हैं। शीत युद्ध के दौर में परमाणु हथियारों को लेकर हमेशा एक-दूसरे के आमने-सामने रहे अमेरिका और रूस को पीछे हटना पड़ा। फ्रांस और ब्रिटेन के नेता शायद ही कभी सार्वजनिक तौर पर अपने परमाणु हथियारों की बात करते हों। चीन भी इस पर बात नहीं करता। इजरायल के पास सुरक्षा परिषद के पांच सदस्यों के बाद सबसे आधुनिक परमाणु हथियार हैं, इसके बावजूद इसने अभी तक यह स्वीकार नहीं किया है कि 1960 के दशक के अंत में इसने क्या क्षमताएं हासिल की हैं। इसके उलट मोदी की इन बातों को भारत गैरजिम्मेदार देशों की श्रेणी में गिना जाएगा।
 
यह परमाणु हथियार कार्यक्रम के खिलाफ कोई बात नहीं है न ही भेदभाव करने वाले परमाणु अप्रसार संधि के पक्ष में। किसी भरोसेमंद वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण कार्यक्रम के अभाव और पड़ोस में विरोधी परमाणु संपन्न देशों को देखते हुए हर कोई यह मानता है कि भारत के पास सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार होने चाहिए। लेकिन जिन देशों के पास ये हथियार हैं, उन्हें काफी सूझबूझ के साथ चलना होता है और उनके नेताओं को भी काफी होशियारी दिखानी होती है। क्योंकि कोई भी चूक बड़ी त्रासदी ला सकती है।
 
बड़े पैमाने पर होने वाले परमाणु युद्ध से क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होगा। मेडिकल पेशेवरों ने यह चेतावनी दी है कि परमाणु हमले की स्थिति में किसी भी शहर या क्षेत्र का स्वास्थ्य तंत्र पूरी तरह से तहस-नहस हो जाएगा। ऐसे में पीड़ितों का इलाज संभव नहीं होगा और वे मरने के लिए छूट जाएंगे। इससे वैश्विक स्तर पर इस सबसे बेकार हथियार के खिलाफ माहौल बना है जिसके 1945 के बाद कभी नहीं इस्तेमाल किए जाने की लंबी परंपरा बनी है।
 
शीत युद्ध के दौर का परमाणु परिदृश्य भारत और पाकिस्तान के लिए कम प्रासंगिक है। लेकिन अगर सीमित संख्या में भी परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होता है तो इससे भी प्रलयकारी परिणाम सामने आएंगे। दोनों देशों में प्राकृतिक आपदा के बाद तो सरकारें आम लोगों को अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने में ठीक से मदद कर नहीं पातीं। पश्चिमी देशों और रूस का समाज परमाणु हथियारों के खतरों को लेकर जागरूक है लेकिन भारत और पाकिस्तान के समाज में यह स्थिति नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी तौर पर चला आ रहे सीमा विवाद से यह बात भी गलत साबित हुई है कि परमाणु हथियार संपन्न देश एक-दूसरे से सीधे तौर पर नहीं लड़ते। दोनों देशों में परमाणु हथियार वाले संघर्ष को टालने की कोशिश बाहरी हस्क्षेपों से हुई है लेकिन यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि हर बार ऐसा होगा।
 
हमें यह समझना होगा कि पाकिस्तान ने 45 किलोटन के जिस सबसे बड़े परमाणु हथियार का परीक्षण किया है, वह अगर हमारे किसी शहर पर गिराता है तो इससे पांच लाख लोग तुरंत मरेंगे और 12 लाख लोग घायल होंगे। वहीं चीन के पास एक मेगाटन वाले कई परमाणु हथियार हैं। ऐसे हथियार के इस्तेमाल से 25 लाख लोग मरेंगे और 60 लाख लोग घायल होंगे। इस तरह की बात करना सुखद नहीं है लेकिन इसमें उन लोगों की संख्या शामिल नहीं है जो लंबे समय तक विकिरण से प्रभावित होकर मरेंगे या घायल होंगे।
 
परमाणु युद्ध से भारत और पाकिस्तान में कल्पना से परे तबाही होगी। इसलिए दोनों देशों को युद्ध की सोचना तो दूर, इस बारे में लापरवाही से कभी बात भी नहीं करनी चाहिए। शीत युद्ध के दोनों पक्ष यह दावा करते थे कि परमाणु युद्ध में वे दूसरे पक्ष पर भारी पड़ेंगे। लेकिन बाद में उन्हें यह बात समझ में आ गई कि दोनों तबाह हो जाएंगे। इसलिए भारत और पाकिस्तान के नेताओं को भी यह समझना चाहिए कि परमाणु युद्ध की धमकियों से बाज आकर खुद को इसमें विजयी बनाने के भ्रम से बाहर आएं।

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