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श्रम बल में महिलाओं की घटती भागीदारी

ग्रामीण महिलाओं की घटती भागीदारी के लिए मांग और आपूर्ति दोनों स्तर पर कई वजहें जिम्मेदार हैं
 

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उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में महिला श्रम बल भागीदारी दर भारत में सबसे कम है। इसमें लगातार गिरावट आ रही है। 2011-12 में जहां यह दर 31.2 फीसदी थी, वहीं 2017-18 में यह घटकर 23.3 फीसदी हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों में यह गिरावट और अधिक 11 फीसदी है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रा में पुरुष श्रमिकों की भागीदारी में कमी आई है लेकिन महिलाओं के मामले में यह गिरावट और अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के जो अवसर उपलब्ध भी हैं, उनमें भी महिलाओं पुरुषों से पिछड़ रही हैं। ऐसे में इस मसले को गहराई को समझना जरूरी है।
 
भारत में श्रम बल में महिलाओं की घटती भागीदारी की वजह के तौर पर रोजगार के अवसरों में कमी, शिक्षा का बढ़ता स्तर, घरेलू आय में बढ़ोतरी और आंकड़ा जमा करने संबंधित समस्याओं को गिनाया जाता है। ग्रामीण भारत में श्रम बल की मांग को लेकर भी समस्याएं हैं। खेतों में काम करने वाले श्रमिकों की मांग घटी है। वहीं गैर कृषि रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। कृषि और गैर-कृषि कार्यों में मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से भी रोजगार के अवसर कम हुए हैं।
 
ग्रामीण महिलाओं अपने घर के पास और अपनी इच्छा की समयावधि में काम को तरजीह देती हैं। ऐसे में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के तहत उन्हें पहले से तय मजदूरी की दर पर 100 दिनों का रोजगार देने का प्रावधान है। लेकिन 2018 में एक सर्वेक्षण से पता चला कि घर में या समाज में महिलाओं द्वारा वैसे काम जिसके बदले पैसे नहीं मिलते हैं, उनकी वजह से कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी कम हो रही है। ग्रामीण समाज में यह अधिक स्पष्ट तौर पर दिखता है। परिवार का आकार घटने और दबाव में ग्रामीण पुरुषों के होने वाले पलायन की वजह से महिलाओं के बगैर भुगतान वाले काम बढ़ गए हैं।
 
ओईसीडी के मुताबिक भारतीय महिलाएं हर दिन औसतन 352 मिनट घरेलू कामों में लगाती हैं। पुरुष बगैर भुगतान वाले काम में जितना वक्त लगाते हैं, उसके मुकाबले यह 577 फीसदी अधिक है। यह आपूर्ति की समस्या है जिसका समाधान किया जाना चाहिए। यह अहम इसलिए भी है कि इसकी मार गरीबों पर अधिक पड़ती है। बगैर भुगतान वाले कार्यों में लगे होने की वजह से महिलाओं रोजगार के लिए शिक्षा और कौशल नहीं हासिल कर पाती हैं। इससे वे कार्यबल से लगातार बाहर बनी रहती हैं। ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों की देख-रेख के लिए केयर होम बनने चाहिए ताकि श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ सके।
 
ऐसी कुछ नीतियां आई हैं। लेकिन ये सभी संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए हैं। मातृत्व लाभ कानून के तहत संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए 26 हफ्ते का पेड अवकाश देने का प्रावधान किया गया है। 50 से अधिक महिला कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में क्रेच की स्थापना अनिवार्य कर दी गई है। असंगठित क्षेत्र में ये सुविधाएं बेहद सीमित हैं। रोजगार गारंटी योजना के तहत महिलाओं के बच्चों की देख-रेख की व्यवस्था कार्यस्थल के आस-पास करने का प्रावधान तो है लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा है। केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय क्रेच योजना की फंड में जबर्दस्त कटौती की वजह से देश भर के क्रेच बंद हो रहे हैं।
 
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि रोजगार गारंटी योजना और एकीकृत बाल विकास सेवाओं पर खर्च बढ़ाया जाए। साथ ही पेशेवर प्रशिक्षण पर भी ध्यान दिया जाए ताकि तेजी से बदल रहे उत्पादन प्रक्रियाओं के हिसाब से महिलाओं कौशल हासिल कर सकें। रोजगार में आरक्षण और उन्हें कर्ज देने जैसे उपायों से भी उनकी भागीदारी बढ़ेगी।
 
ग्रामीण भारत में इस समस्या के समाधान के लिए यह जरूरी है कि श्रमिकों की मांग से संबंधित समस्याओं का समाधान किया जाए। साथ ही इसके लिए लैंगिक जरूरतों के हिसाब से नीतियां बनाने की भी जरूरत है। ताकि महिलाओं पर बगैर भुगतान वाले कार्यों का बोझ कम हो। क्योंकि इस तरह के कामों का बोझ उन पर संरचनात्मक खामियों की वजह से भी है। इसलिए इसका समाधान किए बगैर श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना आसान नहीं होगा।

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