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चुनावी घोषणापत्र की राजनीति

सिर्फ लागू किए जा सकने लायक वादों की ही नहीं बल्कि घोषणापत्रों के वैचारिक आयामों की पड़ताल भी जरूरी है
 

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लोकसभा चुनावों के लिए अधिकांश राष्ट्रीय और प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों ने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं। घोषणापत्रों में वादों के दोहराव की वजह से आम लोगों को ये घोषणापत्र रस्म अदायगी लगने लगे हैं। हालांकि, ये दस्तावेज अब भी इस मामले में प्रासंगिक हैं कि इनके जरिए राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं और वैचारिक प्रतिबद्धताओं का पता चलता है। इनसे यह भी पता चलता है कि पिछली बार की गई घोषणाओं में कितने काम पूरे हुए हैं। वादों को पूरा करना और नहीं करना घोषणापत्र पर पार्टियों के प्रदर्शन का एक पैमाना है। हालांकि, यह एक अलग बात है कि मुख्यधारा की मीडिया विपक्षी दल द्वारा किए गए वादों की पड़ताल करने में अधिक दिलचस्पी ले रहा है जबकि उसे सत्ताधारी पक्ष के घोषणापत्र की अधिक पड़ताल करनी चाहिए। एक राजनीतिक दल के घोषणापत्र की पड़ताल सिर्फ पूरा किए जाने लायक वादों के आधार पर ही बल्कि वैचारिक आयामों के पैमाने पर भी की जानी चाहिए?
 
यह स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी घोषणापत्र को गंभीरता से नहीं लेती। क्योंकि इसने 2014 में एक चरण का चुनाव होने के बाद घोषणापत्र जारी किया था। इस बार भी भाजपा का घोषणापत्र कांग्रेस घोषणापत्र की प्रतिक्रिया में जल्दी में तैयार किया गया लग रहा है। भाजपा घोषणापत्र से एक बार फिर संघ परिवार के मूल एजेंडे का पता चलता है। भाजपा के घोषणापत्र की शुरुआत राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले से होती है और विकास की बात इसके बाद आती है। नागरिकता कानून के संशोधन को पूरे देश में लागू करने और अनुच्छेद-370 को हटाने की बात की गई है। इससे राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर भाजपा की सोच का पता चलता है। विकास के एजेंडे पर भी घोषणापत्र रोजगार सृजन की बात नहीं करता। बल्कि उद्यमिता विकास की जुमलेबाजी करता है। जाहिर है कि ऐसा करके सबसे जरूरी काम की अनदेखी की जा रही है। महिला सशक्तिकरण के विषय में समान काम के लिए समान वेतन का उल्लेख नहीं है। लैंगिक समानता की बात सिर्फ मुस्लिम महिलाओं तक सीमित है। अल्पसंख्यकों के बारे में घड़ियाली आंसू बहाते हुए ‘सम्मान के साथ विकास’ दिखावे के तौर पर की गई है। राम मंदिर और सबरीमाला की बात की गई है। इससे पता चलता है कि भाजपा का शासन संवैधानिक लोकतंत्र के लिए किस तरह की चुनौतियां पेश कर सकता है। घोषणापत्र से यह भी पता चलता है कि पार्टी ने आस्था और विश्वास के मामले में संवैधानिक सुरक्षा हासिल करना चाहती है। यह संवैधानिक मूल्यों की उपेक्षा की सोच को दिखाता है।
 
भाजपा के राष्ट्रीय सुरक्षा आधारित रुख के उलट कांग्रेस ने रोजगार, लोगों के जीवनयापन जैसे राष्ट्रीय मसलों पर अधिक जोर दिया है। न्यूनतम आय योजना की बात मूल में है। घोषणापत्र में कृषि क्षेत्र के लिए अलग बजट की बात भी की गई है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस लोकतांत्रिक दबावों के प्रति संवेदनशील है। अच्छी बात यह भी है कि भीड़ के हमलों और मोरल पुलिसिंग को भी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है। क्योंकि यह सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि यह देश की बहुलता के लिए खतरा है। नागरिक स्वतंत्रता के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता या यों कहें कि इसकी अभिव्यक्ति उसे भाजपा से अलग कर रही है। इसने राजद्रोह कानून और आपराधिक मानहानी को हटाने का वादा किया है। साथ ही सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून, 1958 के प्रावधानों की समीक्षा की बात भी की है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस का घोषणापत्र चुनाव अभियान के दौरान एक ऐसा राजनीतिक औजार बन सकता है जिसके जरिए यह विमर्श चल सकता है कि राष्ट्र और इसमें रहने वाले लोगों के बीच किस तरह के संबंध होने चाहिए।
 
वामपंथी दलों के घोषणापत्रों से वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक उपायों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखती है। साथ ही संघ परिवार से भिड़ने की उनकी इच्छा भी दिखती है। वामपंथी दलों की चुनावी ताकत को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उनके घोषणापत्र में किए गए वादों को लागू कर पाने के बजाए जन आंदोलनों को आगे बढ़ाने में इसकी क्या भूमिका होनी चाहिए, यह देखा जाना चाहिए। पहले भी हमने देखा है कि इससे पैदा होने वाले दबाव ने कांग्रेस जैसी पार्टियों को इन घोषणापत्रों की कुछ बातों को मानने को विवश किया है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रीय शहरी रोजगार गारंटी योजना लाने और समाजवादी पार्टी ने बहुत अमीर लोगों पर अतिरिक्त कर लगाने की बात कही है। ये बातें भविष्य में दूसरी पार्टियां मान सकती हैं।
 
राजनीतिक दलों से अलग सफाई कर्मचारी आंदोलन ने भी एक घोषणापत्र जारी किया है। इसके मूल में जीवन का अधिकार है। इस संदर्भ में इसके जरिए राजनीतिक व्यवस्था और समाज से अपील की गई है। अब यह विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को समझाए कि खोखला राष्ट्रवाद की जगह इंसानों को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार अधिक महत्वपूर्ण है।

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