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छल से वन अधिकारों का दमन

भारतीय वन कानून, 2019 का मसौदा बुनियादी संवैधानिक अधिकारों और सिद्धांतों का माखौल उड़ाने वाला है

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वन अधिकार कानून, 2019 के मसौदे में वन क्षेत्र में काम कर रही ब्यूरोक्रेसी को पुलिसिंग का अधिकार देने का प्रस्ताव है। देश के 7,08,273 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र पर शासन का दायित्व अब इनका होगा। नव-उदारवादी नीतियों पर चलते हुए वनों के व्यवसायीकरण का प्रस्ताव भी इसमें है। 
 
नए मसौदे में ऐसे प्रस्ताव किए गए हैं जो 2006 के वन अधिकार कानून के प्रावधानों को नुकसान पहुंचाने वाले साबित होंगे। साथ ही इसमें राज्य सरकारों के वैधानिक और कार्यकारी शक्तियों को प्रभावित करने वाले संशोधन भी सुझाए गए हैं। इस मसौदे को राज्यों के पास उनकी प्रतिक्रिया के लिए भेजा गया है। यहां इसका उल्लेख जरूरी है कि यह मसौदा 13 फरवरी के सुप्रीम कोर्ट के उस विवादास्पद आदेश के बाद आया है जब केंद्र सरकार वन अधिकार कानून को बचाव करने में नाकाम रही थी। यह भी एक विडंबना है कि लोकसभा चुनावों के ठीक पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने एक ऐसे कानून लाने की कोशिश की जिससे सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों के हक नकारात्मक तौर पर प्रभावित होंगे।
 
नए मसौदे के तहत भारतीय वन कानून, 1927 में बड़े संशोधन किए जा रहे हैं। वन अधिकार कानून के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए नए कानून के तहत वन अधिकारियों को कई विशेषाधिकार देने का प्रस्ताव किया गया है। वन अधिकारियों को अर्द्ध-न्यायिक अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा उन्हें वन से संबंधित उल्लंघनों को रोकने के लिए आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल करने की अनुमति देने का प्रस्ताव भी नए मसौदे में शामिल है। वन से संबंधित अपराधों के संदेह पर वन अधिकारियों को गोली चलाने, तलाशी लेने, संपत्ति जब्त करने और लोगों को गिरफ्तार करने का अधिकार दिया गया है। जबकि खुद को निर्दोष साबित करने का पूरा बोझ आरोपित पर लाद दिया गया है। वहीं दूसरी तरफ वन अधिकारों को उसी तरह की कानूनी सुरक्षा दी जा रही है जिस तरह की सुरक्षा सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून, 1958 के तहत संघर्ष वाले क्षेत्रों में तैनात जवानों को मिली हुई है।
 
वन अधिकार कानून को नुकसान पहुंचाने वाला एक और विवादास्पद प्रावधान यह है कि केंद्र सरकार से विचार-विमर्श करके राज्य सरकार वन से संबंधित अधिकारों का कम कर सकती है अगर इससे संरक्षण का काम प्रभावित हो रहा हो। यह काम वनों पर आश्रित लोगों को या तो जमीन देकर किया जाएगा या उन्हें पैसे दिए जाएंगे। इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें जंगल से निकाला जाएगा। साफ है कि जिस तरह से जंगल में रहने वाले लोगों के हकों की उपेक्षा ऐतिहासिक तौर पर हुई है और चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों ने भी किया है, वह चीज आगे भी बरकरार रहेगी।
 
मसौदे में यह भी कहा गया है कि अगर केंद्र सरकार और राज्य सरकार के कानूनों के बीच कोई विरोधाभास होगा तो केंद्र का कानून प्रभावी होगा। यह संविधान में मुहैया कराई गई संघीय व्यवस्था के खिलाफ जाता है। ‘ग्रामीण वन’ का प्रस्ताव करके ग्राम सभा की भूमिका की अनदेखी करने की योजना भी इसमें शामिल है। इससे विकेंद्रीकरण की भावना प्रभावित होगी। स्पष्ट है कि अगर ये संशोधन लागू हो जाते हैं तो संविधान में जो अधिकार आम लोगों को मिले हुए हैं, उनका उल्लंघन होगा।
 
जंगलों के निजीकरण का प्रस्ताव भी इसमें शामिल है। साथ ही ‘उत्पादन वन’ की अवधारणा भी लाई गई है। इससे वन अधिकार कानून के तहत मिले अधिकार प्रभावित होंगे। इससे स्थानीय लोगों के अधिकार की जगह वनों पर निजी लोगों का अधिकार विकसित होगा।
 
अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों केंद्र सरकार जंगलों में रहने वाले लोगों के बुनियादी अधिकारों को चोट पहुंचाने वाला कानून लाना चाह रही है और जंगलों को संघर्ष क्षेत्र में तब्दील करना चाह रही है? हैरानी तो इस बात से भी होती है आखिर कैसे इतने महत्वपूर्ण कानून को बगैर व्यापक राजनीतिक विमर्श और जनता से संवाद किए बिना संशोधित किया जा रहा है।
 
एक ऐसे देश में जहां आदिवासी इलाकों में गरीबी काफी अधिक है, ऐसी कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा लगता है कि जंगलों का सही प्रशासन किसी राजनीतिक दल के लिए मुद्दा नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन से संबंधित विषयों पर कुछ नहीं कहा गया है। जबकि कांग्रेस के घोषणापत्र में यह जिक्र है कि वह जंगलों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों की व्यापक भागीदारी के लिए एक तंत्र विकसित करेगी।
 
जंगलों पर आश्रित समुदायों के हित में यह जरूरी है कि दमनकारी और गलत संशोधनों को खारिज कर दिया जाए और जंगलों के प्रशासन में गरीबपरस्त और लोकतांत्रिक रवैया अपनाया जाए। अगर ये संशोधन लागू हो जाते हैं तो इससे नए तरह की असमानता पैदा होगी और सरकार की मदद से जंगलों को आश्रित रहने वाले लोगों को कई स्तर पर बेदखल करने की शुरुआत हो जाएगी।

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