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भारतीय मतदाताओं को भावुक बनाना

सफलता की वाजिब वजहें होती हैं जबकि नाकामी को सही ठहराने के लिए भावनाओं का सहारा लिया जाता है
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

लोकसभा चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दल सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की नाकामियों को मुद्दा बनाकर वोट जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्षी दलों के इन आरोपों में तथ्यात्मक और नैतिक तौर पर काफी दम है। विपक्षी दलों को भावनात्मक अपील करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनके बातों के समर्थन वाले तथ्य हैं। जबकि दूसरी तरफ भाजपा और उसके सहयोगी दल भावनात्मक बातों को केंद्र में रखकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। अगर इन लोगों ने 2014 में किए वादों को पूरा किया होता तो इन्हें यह काम नहीं करना पड़ता। भावुक बातें करके भाजपा और उसके सहयोगी दल मूल मुद्दों से मतदाताओं का ध्यान भटकाना चाहते हैं। इसमें जंगी राष्ट्रवाद की बात हो रही है। आचार संहिता का उल्लंघन किया जा रहा है। इलैक्ट्राॅनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर कब्जा जमाकर भाजपा मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। प्रिंट मीडिया में भी पार्टी अपना खूब प्रचार करा रही है।
 
भाजपा को लगता है कि व्यापक प्रचार से उसे लोगों का समर्थन मिलेगा। लेकिन एक सच यह भी है कि जो सोचने-समझने लोग हैं, वे इस बात का फर्क कर लेंगे कि किस तरह का प्रचार स्वाभाविक है और किस तरह का प्रचार बनावटी है। हाल के समय में यह दिखा है कि मतदाता अब तार्किक भाषणों और भावनात्मक भाषणों में अंतर करने लगे हैं। अगर ऐसे दलों को फिर से शासन का मौका मिलता है तो भाषणा में कटुता और बढ़ेगी। सत्ताधारी पार्टी विपक्ष को बदनाम करने का कोई भी अवसर नहीं गंवाती। इस तरह के हमले वाजिब वजहों पर नहीं आधारित होते। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे-वैसे जुबानी हमले तेज हो जाते हैं। जिस तरह से मतदाताओं को भावुक बनाने की कोशिश हो रही है, उससे जुड़ा अहम सवाल यह है कि भाजपा मतदाताओं के बारे में आखिर क्या सोचती है? खुद मतदाता अपने बारे में क्या सोचते हैं? क्या राजनीतिक दल मतदाताओं के लिए मुद्दे तय करेंगे और अगर ऐसा है तो मतदाता क्यों ऐसी स्थिति चलने देंगे?
 
यहां भाजपा तय कर रही है कि कौन से मुद्दे मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनके लिए प्राथमिकता में होने चाहिए। लेकिन सच्चाई तो यह है कि उसकी प्राथमिकता जनता की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए। ऐसी एकतरफा घोषणाओं से जनता को उसके अधिकार से वंचित किया जा रहा है कि कौन से मसले उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, यह भी एक स्थिति है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में लोगों को जीवन में कठिनाई का अहसास हुआ है।
 
भाजपा इसलिए मतदाताओं को अतार्किक समझते हुए खुद और अपने सहयोगियों के पक्ष में वोट हासिल करना चाहती है क्योंकि वह पिछले पांच सालों में अपने वादों को पूरा करने में नाकाम रही है। ऐसे में मतदाताओं को तार्किक और सही निर्णय लेना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि वैसी पार्टी में फिर से विश्वास दिखाने का कोई मतलब नहीं है जिसमें काम करने की क्षमता नहीं है। पहले भी मतदाताओं ने इस बात को समझा है और इस बार भी समझेंगे। वे यह समझेंगे कि उन्हें ऐसी पार्टी के साथ खड़ा होना है जिसके पास कहे को पूरा करने की क्षमता है और जिसमें यह नैतिक क्षमता भी है कि अगर कोई काम नहीं किया तो उसके लिए माफी मांग सके।
 
यह मतदाताओं की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे पार्टियों का मूल्यांकन करते रहें। उन्हें पार्टियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन बीच-बीच में करते रहना चाहिए न कि पांच साल में एक बार।
 
गरीबों की जो अनिवार्य जरूरतें हैं, उसमें वे उस पार्टी को पांच साल और देने का प्रयोग नहीं कर सकते जिसने झूठे वादे किए और इन्हें पूरा नहीं कर पाई। ऐसी पार्टी को फिर से पांच साल देने का मतलब यह होगा कि हम नासमझ हैं और हम खुद को ही धोखा दे रहे हैं।
 
वंचित लोगों के लिए ऐसी सरकार होनी चाहिए जो संसाधनों के पुनर्वितरण का काम ठीक से करती हो। क्योंकि बाजार उनकी स्थितियों को सुधारने में नाकाम रहा है। उन्हें यह समझना होगा कि जाति, भाषा और धर्म के आधार पर वोट देकर वे ऐसी पार्टियों को मजबूत करेंगे जो ऐसी सरकार बनाएंगी जो न सही होगी और न संवेदनशील। व्यक्तिगत हित भी तब ही सुरक्षित रहेंगे जब सामूहिक तौर पर सही, संवेदनशील और जिम्मेदार सरकार चुनने के लिए वोट दिया जाए। जो व्यक्तिगत हितों को सामूहिक लाभों में बदलकर लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करे।
 

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