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न्याय का अधिकार

नागरिक अधिकारों को लेकर संवेदनशील लोक संस्थाएं प्रभावी ढंग से आय हस्तांतरण सुनिश्चित कर सकती हैं
 

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कांग्रेस पार्टी ने न्यूनतम आय योजना यानी न्याय की घोषणा की है। इसके तहत देश के सबसे अधिक 20 फीसदी गरीब लोगों की आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव किया है। इस घोषणा की थोड़ी तारीफ की जानी चाहिए। इसने गरीबों की बुनियादी आर्थिक जरूरतों की बात को केंद्र में लाने का काम किया है। यह वादा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा सरकार ने अपने हिसाब से कल्याणकारी योजनाओं को चलाया है और इसमें सामाजिक सुरक्षा की बात कहीं पीछे छूट गई है।
 
पिछले कुछ दिनों से इस वादे की विश्वसनीयता को लेकर विमर्श चल रहा है। इसमें बात यहां तक पहुंची है कि आम लोगों को इसे एक ‘सुरक्षा’ गारंटी के तौर पर देखना चाहिए, मुफ्त की मदद के तौर पर नहीं। इन दोनों बातों में भेद नहीं करने से सरकार के लिए अपनी जिम्मेदारियों से बच निकलने का आसान रास्ता मिल जाता है। लेकिन हमें इस विश्व को और व्यापकता के साथ समझना होगा। हमें यह समझना होगा सामाजिक सुरक्षा और मुफ्त में दी जाने वाली मदद का राजनीतिक महत्व क्या है? यह भी समझने की जरूरत है कि सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए संस्थानिक व्यवस्था क्या है और इससे मानव जीवन और उसका सम्मान कितना प्रभावित हुआ है?
 
इस तरह की कोशिशों में सरकार एक संरक्षक के तौर पर दिखती है। अब सवाल यह उठता है कि किस स्तर तक संरक्षणवाद सही है? वह भी तब जब इसके तहत दी जाने वाली सेवा लोगों के जीवन और जीवनयापन के मौलिक अधिकार से संबद्ध हो। शोधों से इस बात का पता चलता है कि न्यूनतम आय गारंटी जैसी योजनाओं से गरीब लोगों का जीवन स्तर सुधरा है। लेकिन जब ऐसी योजनाओं को संस्थाएं शीर्ष से नीचे की ओर लागू करते हुए जाती हैं तो इसमें गडबड़ियों की आशंका अधिक होती है। पहले भी हमारा अनुभव लक्षित सुरक्षा योजना के साथ यही रहा है। अभी के प्रमाण भी यही बताते हैं कि ऐसी योजनाओं में लीकेज अधिक हैं और लालफीताशाही इन योजनाओं पर हावी है। ये इन योजनाओं को अप्रभावी बनाते हैं। कांग्रेस की न्याय योजना भी सभी के लिए नहीं है बल्कि खास लक्षित वर्ग के लिए है। इसलिए गरीबों का जीवन स्तर सुधारने में इसके प्रभाव को लेकर संदेह है। पहले की योजनाओं के बुरे अनुभवों से ये संदेह और गहराते हैं। 
 
इसके बावजूद इस बात को कोई खारिज नहीं कर सकता है कि कांग्रेस की न्याय योजना का प्रस्ताव उम्मीद जगाती है। खास तौर पर तब जब ‘अच्छे दिन’ का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। अभी जरूरत इस बात की है कि न्याय योजना की व्यावहार्यता और क्रियान्वयन पर बातचीत की जाए। यह समझा जाए कि पांच करोड़ सबसे गरीब परिवारों की पहचान का आधार क्या होगा ताकि उन्हें हर साल 72,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जा सके? कैसे इस योजना को लागू करते हुए भी वित्तीय घाटे को तीन फीसदी पर रखा जाए? केंद्र और राज्यों के बीच खर्चे की हिस्सेदारी का माॅडल क्या होगा? आंध्र प्रदेश और ओडिशा में पहले से ही ऐसी योजना चल रही है तो फिर ये राज्य इसे क्यों अपनाएंगे? क्या इस योजना को ठीक से लागू करने के लिए कोई सांस्थानिक सुधार जरूरी है? क्या यह प्रस्तावित योजना लीकेज वाली सब्सिडी योजनाओं और गरीबी दूर करने वाली दूसरी योजनाओं की जगह लेगी?
 
यह समझने की बात है कि इस तरह की खर्चीली योजना को लागू करने से पहले इसका परीक्षण भी करना होगा। इसके बाद ही कई सवालों का जवाब मिल पाएगा। पार्टी के घोषणापत्र में यह दिखना चाहिए कि यह सिर्फ हवा-हवाई वादा भर नहीं है बल्कि इसके लिए संसाधन उपलब्ध हैं। क्योंकि अगर न्याय में देरी होती है तो फिर लोगों को न्याय नहीं मिल पाता है। इस बारे में जिम्मेदारी उस राजनीतिक दल की अधिक है जिसने यह प्रस्ताव रखा है। इस योजना के लिए सभी जरूरी स्तर पर मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। आम लोगों के साथ मौजूदा और भविष्य की सरकारों को समझना होगा कि न्याय और सम्मान आम लोगों का अधिकार है न कि उन्हें दिया जाने वाला कोई लाभ। इन्हें दूसरी बात यह समझनी होगी कि अधिकार विवेकाधीन या आकांक्षी लक्ष्य नहीं हैं बल्कि लाभार्थियों के कानूनी दावे हैं।

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