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भाजपा की ‘राष्ट्रीय एकता’ पर सवाल

स्वस्थ्य चुनावी राजनीति में व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हितों में पारस्परिकता का भाव होता है न कि एक पर दूसरे की प्रमुखता का
 

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उम्मीद के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल अपने चुनाव प्रचार अभियानों में राष्ट्रवाद की बात अपने ढंग से कर रहे हैं। पुलवामा हमले तक यह सैन्यवादी और जंगी रहा। भाजपा राष्ट्रवाद की जो राजनीति करती है, उसमें वह खुद से लोकतांत्रिक ढंग से असहमति जताने वालों को दुश्मन साबित करने लगती है। इसमें एक छोर पर वह भारत को रखती है तो दूसरे छोर पर दुश्मन देश पाकिस्तान को। देश की जंगी छवि को मजबूत करने का काम काम कुछ हिंदी समाचार चैनल और प्रिंट मीडिया संगठन भी कर रहे हैं। ये लोग वार, पलटवार और बड़ा हमला जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों नाटकीय ढंग से यह घोषणा की कि भारत ने सैटेलाइट को मार गिराने वाली मिसाइल विकसित की है। इससे भाजपा के राष्ट्रवाद के विमर्श को और मजबूती मिली है। लोकसभा चुनावों के पहले इसका स्वरूप और बिगड़ते जा रहा है। यह भाजपा नेताओं के बयानों से भी स्पष्ट है, जिसमें वे कह रहे हैं, ‘अगर आप भाजपा को वोट नहीं देते हैं तो आप उन्हें वोट देंगे जो भारत को टुकड़ों में बांटने की बात करते हैं।’ भाजपा कांग्रेस के रूप में एक आंतरिक दुश्मन खड़ा करना चाहती है। यह इससे भी पता चलता है कि भाजपा प्रवक्ता कांग्रेस घोषणापत्र की आलोचना में इसे राष्ट्र-विरोधी बताते हैं। सच्चाई तो यह है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने राष्ट्रवाद के अपने संस्करण के जरिए हर लोकतांत्रिक विरोध के स्वर  को दबाने का काम किया है।
 
वहीं कुछ अन्य मौकों पर भाजपा भारत के राष्ट्रवाद को पाकिस्तान के साथ संबंधों के संदर्भ में परिभाषित करना चाहती है। चुनावों के दौरान इसे पाकिस्तान की आलोचना से जोड़ा जा रहा है। इस संदर्भ में भाजपा के प्रचार अभियान से संबंधित तीन सवाल उठते हैं।
 
पहला सवाल यह है कि भाजपा सिर्फ राष्ट्रीय एकता का विमर्श क्यों चला रही है और इसके जरिए लोगों से भावनात्मक आधार पर वोट क्यों मांग रही है? तार्किक मसलों को वह क्यों नहीं उठा रही है? दूसरी बात यह कि भाजपा क्या चाहती है कि लोग किसे तरजीह दें, वैसी राष्ट्रीय एकता को जो वास्तविकता से अधिक अभासी है या फिर उस राष्ट्र को जहां हाशिये के समुदाय बगैर किसी राजनीतिक दल के रहमोकरम के जीवन जी सकें? तीसरी बात यह है कि क्या मतदाता भाजपा की उस अपील को स्वीकार करेंगे जिसमें ये कहा जा रहा है कि लोग अपने व्यक्तिगत हितों का बलिदान दें? क्या कोई भी तार्किक व्यक्ति भाजपा के शासनकाल में देश के लिए पैदा की गई समस्याओं की अनदेखी करते हुए राष्ट्र की भाजपा की अवधारणा के साथ खुद को जोड़ पाएगा?
 
2019 के चुनाव प्रचार अभियान में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जंगी राष्ट्रवाद के भावनात्मकता के अधिक इस्तेमाल करने को बाध्य है। साथ ही यह अपने नेता के लिए यह कहते हुए सहानुभूति हासिल करना चाह रही है कि ‘हिंदू आहत’ हैं। क्योंकि अब एनडीए ये नहीं कह सकती है कि हर जन धन खाते में 15 लाख रुपये आएंगे या फिर 2014 में सत्ता में आने के बाद हमने करोड़ों लोगों को रोजगार दिए। इसके बावजूद अगर इस तरह के वादे फिर से किए जाते हैं तो यह कहना गलत नहीं होगा कि इनका मतदाताओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह हर पार्टी के लिए सही है कि उनके द्वारा तोड़े गए वादों की वजह से उनके नए वादों पर लोगों का यकीन नहीं कायम होता। रोजगार जैसे अहम मोर्चों पर एनडीए की सरकार नाकाम रही है। ऐसे में भाजपा और उसके सहयोगी दल यह चाहते हैं कि मतदाता उन्हें ‘राष्ट्रीय एकता’ के नाम पर वोट दें।
 
लेकिन इस अपील में राष्ट्रवाद को व्यापक ढंग से नहीं देखा जा रहा है। भाजपा के राष्ट्रवाद में राष्ट्र और उसके नागरिकों में पारस्परिकता का संबंध नहीं है। इसके बावजूद पार्टी चाहती है कि हम उसके राष्ट्रवाद को विमर्श पर यकीन करें। जबकि वह खुद इसमें भय, व्याकुलता, आजादी पर आए खतरों और भीड़ के हमलों पर बात नहीं करना चाह रही है। 
 
सच्चाई तो यह है कि इस बारे के चुनावों में सरकार के गलत निर्णयों से प्रभावित होने वाले लोग चुनाव देते वक्त व्यक्ति और सामाजिक हितों को प्राथमिकता देंगे। चाहे वह नोटबंदी और जीएसटी से प्रभावित लोग हों या बेरोजगारी की मार झेल रहे लोग या फिर हमले झेलने वाले दलित और अल्पसंख्यक समाज के लोग हों। वे राष्ट्र की अवधारणा का मूल्यांकन इस आधार पर करेंगे कि उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ।
 
इसका मतलब यह हुआ कि मतदाता एनडीए की ओर से चलाए जा रहे भावनात्मक अभियानों के झांसे से बचे रह सकते हैं। राष्ट्र में उनकी हिस्सेदारी इस रूप में है कि वे बाजार के उतार-चढ़ाव से लेकर दूसरी मुश्किलों से उन्हें सुरक्षा मिले। उन्हें सरकार से यह गारंटी चाहिए कि वह रोजगार के लिए जरूरी संसाधन जुटाएगी, विस्थापन से बचाएगी, भीड़ के हमले में मारे जाने का भय खत्म करेगी और जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न को खत्म करेगी। सामाजिक तौर पर सजग और मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील सरकार राष्ट्र की परिकल्पना में बहुलतावाद और विविधता के प्रति सम्मान रखती है। कोई भी पार्टी जो सत्ता में आना चाह रही हो, उसके लिए यह जरूरी है कि वह विभाजन करने वाली ताकतों का प्रभाव खत्म करे। यह राष्ट्रीय एकता की वास्तविक अवधारणा होगी।

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