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आतंक और कानूनी प्रक्रिया

एनआईए को अपनी स्वीकृत भूमिका को निभाते हुए जांच के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना चाहिए
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

2007 में समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा के पानीपत के पास विस्फोट हुआ था। इसमें 68 यात्रियों की मौत हुई थी। इनमें 44 पाकिस्तानी नागरिक थे। इस मामले में हाल ही में आरोपितों को रिहा कर दिया गया। इसके बाद विरोधाभासी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने फैसले को ऐतिहासिक बताया है। वहीं पाकिस्तान का कहना है कि यह न्याय का आघात है। इस मामले में राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी यानी एनआईए की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। एनआईए कोर्ट की बातों से भी इसका पता चलता है। अदालत ने माना कि सबूतों के अभाव में हिंसा के इस जघन्य अपराध में सजा नहीं हो पा रही है। जज ने सबूतों के अभाव में अपने निर्णय पर पहुंचते हुए ‘गहरा दुख और गुस्सा’ जाहिर किया।
 
बरी किए गए चार आरोपितों में से एक नब कुमार सरकार उर्फ स्वामी असीमानांद हैं। उन्हें 2007 के अक्टूबर में हुए अजमेर विस्फोट मामले से भी एनआईए कोर्ट ने 2018 में बरी कर दिया था। ऐसे ही मई, 2007 में हैदाराबाद के मक्का मस्जिद विस्फोट मामले से भी वे बरी हो चुके हैं। उस विस्फोट में नौ लोगों की जान गई थी। इन दोनों मामलों की भी जांच एनआईए ने ही की थी और दोनों मामलों में सबूतों के अभाव में उन्हें बरी किया गया। हैदराबाद विस्फोट मामले में स्थानीय पुलिस ने पहले वहीं के मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें टाॅर्चर करने के बाद छोड़ दिया गया। महाराष्ट्र के मालेगांव में 2006 में हुए बम विस्फोट के मामले में भी यही नतीजा निकला। हालांकि, वहां जांच की जिम्मेदारी एनआईए के पास नहीं थी।
 
लंबे समय से मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और प्रगतिशील मीडिया के लोग कहते आए हैं कि मुस्लिम समाज के लोगों और कानून का क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियों के बीच विश्वास की घोर कमी है। 1992-93 के मुंबई दंगों के संदर्भ में आई श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट से लेकर बाबरी मस्जिद के गिराए जाने तक के मामलों से मुस्लिम समाज को यह लगा है कि उन्हें जानबूझकर कसूरवार मानकर परेशान किया जाता है।
 
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आम जनता को यह पता ही नहीं चल पाता कि आखिर हुआ क्या था। समझौता विस्फोट मामले में अगर देखें तो यह पता नहीं चलता है कि 68 निर्दोष पाकिस्तानियों और हिंदुस्तानियों की जान लेने के लिए विस्फोटक किसने रखे थे? वे कौन सी ताकतें हैं जो यह चाहती हैं कि दोनों देशों के संबंध ठीक नहीं हों और दोनों एक दूसरे के दुश्मन बने रहें? समझौता एक्सप्रेस के नाम से ही इसके मकसद का पता चलता है। यह ट्रेन इसलिए चलाई गई थी ताकि दोनों देशों के लोग आवाजाही कर सकें। लेकिन इस विस्फोट में न सिर्फ जानें गईं बल्कि इससे आपसी गतिरोध भी बढ़ा। इस मामले की जांच से उन परिवारों को कोई राहत नहीं मिली जिन्होंने अपने परिजनों को इस हमले में खोया था। इस फैसले से पाकिस्तान को यह कहने का मौका मिला कि इससे भारतीय अदालतों की खराब विश्वसनीयता का पता चलता है।
 
भारत के अंदर एनआईए पर ऐसे आरोप लग रहे हैं कि हिंदुत्व आतंकी संदिग्धों की भूमिका के जांच के मामले में वही पिछले कुछ सालों में ढीली पड़ गई है। इस तरह के आरोपों को तब बल मिलता है जब विशेष अदालतें जांच की खामियों को सामने रखती हैं। आतंकवाद से निपटने में इसकी केंद्रीय भूमिका होने की वजह से यह जरूरी है कि इसे एक पेशेवर एजेंसी के तौर पर लोग देखें। समझौता विस्फोट के 12 साल के अब तक के समय में एक आरोपित की मौत हो गई और 224 गवाहों में से 51 पलट गए। एसआईटी जांच हरियाणा के जिस शीर्ष पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में हुई थी, उसने साफ तौर पर कहा है कि आरोपित हिंदू अतिवादियों के खिलाफ स्पष्ट प्रमाण थे। केंद्रीय गृह मंत्री को मीडिया ने यह कहते हुए उदघृत किया कि चार आरोपितों को रिहा करने के फैसले को चुनौती नहीं दी जाएगी और न ही इस मामले में कोई नई जांच होगी।
 
इस स्थिति में सरकार की आलोचना करते हुए लोग गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना का उदाहरण देंगे। जिसमें मुस्लिम आरोपितों के खिलाफ तेजी से न सिर्फ सुनवाई हुई बल्कि उन्हें सजा भी हो गई। इसी तरह की तुलना मुंबई दंगे और मुंबई बम विस्फोट के मामलों की हो सकती है। पहले में अधिकांश आरोपित पुलिस वाले और हिंदू समाज के लोग थे और दूसरे में मुस्लिम समाज के लोग आरोपित थे।
 
अपने विजन और मिशन लक्ष्यों में एनआईए ने एक लक्ष्य यह भी रखा है- निस्वार्थ और निडर सेवा से भारत के नागरिकों का विश्वास जीतना। मौजूदा वक्त में यह स्पष्ट है कि एक जांच एजेंसी के तौर पर एनआईए की विश्वसनीयता फिर से बहाल होनी चाहिए और सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए काम करना चाहिए।
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