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डिजिटल चुनाव अभियानों पर निगरानी

सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार को लेकर निर्वाचन आयोग का रुख सभी को बराबरी का अवसर देने वाला नहीं है
 

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इस बार के लोकसभा चुनावों में पहले के मुकाबले सबसे अधिक डिजिटल चुनाव प्रचार हो रहा है। विभिन्न राजनीतिक दल सोशल मीडिया, मोबाइल एैप्लीकेशन, आॅनलाइन फोरम और एक बार कई लोगों तक संदेश पहुंचाने वाली तकनीक का इस्तेमाल प्रचार के लिए कर रहे हैं।
 
पिछले हफ्ते सोशल मीडिया कंपनियां अपनी स्वैच्छिक आचार संहिता लेकर आईं। यह काम इन कंपनियों ने इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन आॅफ इंडिया के साथ मिलकर किया। इसके लिए इन लोगों ने भारत निर्वाचन आयोग से परामर्श भी किया। इसके तहत फेसबुक, गूगल, ट्विटर और अन्य कंपनियां उन राजनीतिक विज्ञापनों पर कार्रवाई करेंगी जो चुनाव आयोग के निर्देशों का उल्लंघन कर रहे होंगे। इस आचार संहिता में कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी ऐसा कार्य नहीं हो जिससे चुनावों के निष्पक्षता प्रभावित होती हो।
 
पिछले एक दशक में सोशल मीडिया सिर्फ नेटवर्किंग का माध्यम नहीं रहा बल्कि यह एक ऐसा माध्यम बनकर उभरा है जिससे लोगों को सशक्त और शिक्षित बनाया जा सकता है। इसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर दिखने लगा है। कैंब्रिज एनालिटिका मामले में जो बात सामने आई उससे पता चला कि लाखों लोगों से जुड़ी जानकारियां का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए हुआ। भारत में डाटा के दुरुपयोग का खतरा बना हुआ है और फर्जी खबरों का प्रसार जमकर हो रहा है। इससे पता चलता है कि सोशल मीडिया सशक्त बनाने का माध्यम तो हो सकता है लेकिन यह एक गैरबराबरी वाला मंच है जिसमें पहुंच पैसा और ताकत पर निर्भर है।
 
निर्वाचन आयोग ने अगस्त, 2018 में एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इसमें चुनावी खर्चों पर सीमा तय करने की बात आई। भारतीय जनता पार्टी इकलौती पार्टी थी जिसने इस बात का विरोध किया। हाल में खबरों में यह बात आई कि फेसबुक पर भाजपा सबसे अधिक पैसे खर्च करती है। भाजपा का समर्थन करने वाले फेसबुक पेज जैसे ‘भारत के मन की बात’ और ‘नेशन विथ नमो’ दूसरे फेसबुक पेज के मुकाबले काफी अधिक पैसे खर्च कर रहे हैं। फरवरी, 2019 में भाजपा और उसका समर्थन करने वाले फेसबुक पन्नों ने 2.37 करोड़ रुपये फेसबुक पर विज्ञापन देने में खर्च किए। उस महीने में फेसबुक पर राजनीतिक विज्ञापनों पर जितने पैसे खर्च हुए, यह उसके आधे से भी अधिक है। इस अवधि के दौरान क्षेत्रीय पार्टियों ने 19.8 लाख रुपये खर्च किए और कांग्रेस ने 10.6 लाख रुपये खर्च किए। सोशल मीडिया पर होने वाला अधिकांश खर्च किसी समर्थक के माध्यम से होते हुए दिखाया जाता है। अधिकांश ऐसे अभियानों में नगद भुगतान होता है और ऐसे में पता लगा पाना बेहद मुश्किल होता है। यह बेहद मुश्किल है कि राजनीतिक दलों के लिए निजी स्तर पर जो लोग विज्ञापन दे रहे हैं, उन्हें रोका जाए। वाॅट्सएैप जैसे इन्क्रीप्टेड प्लेटफाॅर्म का इस्तेमाल भी राजनीतिक संदेश देने के लिए हो रहा है। इससे निगरानी का काम और जटिल हो जाता है।
 
ऐसे में निर्वाचन आयोग भी भूमिका पर सवाल खड़े होते हैं। चुनाव आयोग ने 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले अक्टूबर, 2013 में ही चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को स्वीकार किया था। उस समय निर्देश जारी करते हुए आयोग ने सिर्फ इसके दायरे में उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों, मीडिया और चुनाव पर्यवेक्षकों को रखा था। उसके बाद कई विधानसभा चुनाव हुए हैं लेकिन इन निर्देशों को अपडेट नहीं किया गया है। आयोग ने कोई ऐसे दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं जिससे सोशल मीडिया पर धनबल का इस्तेमाल करके प्रचार करने का काम नियंत्रित किया जा सके।
 
हाल ही में सामने आई स्वैच्छिक आचार संहिता देर से भी आई है और दुरुस्त भी नहीं है। इसमें सिर्फ यह बताया गया है कि पैसे देकर दिए जाने वाले विज्ञापनों के मामलों में आयोग और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच किस तरह से संवाद होगा। सोशल मीडिया कंपनियों को चुनाव आचार संहिता के दायरे में होना चाहिए। खास तौर पर उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों से विज्ञापन हासिल करने के संदर्भ में। 2013 में आयोग ने जो निर्देश जारी किए थे, उसमें यह बताया गया है कि सोशल मीडिया पर विज्ञापन देने से पहले आयोग से अनुमति लेनी होगी। लेकिन यह काम अब हो रहा है और वह भी स्वैच्छिक तौर पर। इससे आयोग के हीलाहवाली का पता चलता है। कुल मिलाकर देखें तो आॅनलाइन और आॅफलाइन दोनों स्तर पर निर्वाचन आयोग बराबरी का अवसर मुहैया कराने में नाकाम रहा है। 
 
डिजिटल जगत भौतिक, सामाजिक और राजनीतिक जगत से अलग नहीं है। इसलिए इसे अलग करके देखना ठीक नहीं है। हम मुश्किल में इसलिए हैं क्योंकि हमने इस पर सवाल नहीं उठाया कि कैसे डिजिटल प्लेटफाॅर्म और तकनीक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को प्रभावित कर रहे हैं। इससे चुनावों पर भी असर पड़ रहा है। दुनिया के सबसे बड़े चुनाव के महीने भर पहले स्वैच्छिक आचार संहिता लाना सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा की जनसंपर्क की एक कवायद है। होना तो यह चाहिए था कि पिछले कुछ सालों में चुनाव आयोग को सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर अध्ययन करना चाहिए था। इससे उसे इस चुनौती से निपटने में सुविधा होती। अगर आयोग चाहता है कि 2024 के चुनावों में वह सोशल मीडिया की चुनौतियों से निपटने में सक्षम बने तो उसे अभी से शुरुआत करनी होगी।

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