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शोध कार्यों का सरकारीकरण

प्रबुद्ध सरकार को शोध कार्यों को विस्तार देना चाहिए न कि इस पर सरकारी सोच हावी कर देनी चाहिए
 

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पिछले पांच सालों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में गहरी और विविध सोच को बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं किया है। शिक्षा को लेकर उनकी जो सोच है वह विश्वविद्यालय की मूल अवधारणा के ही खिलाफ जाती है। 15 दिसंबर, 2018 को सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के बीच एक बैठक हुई। इसमें यह तय किया गया कि शोध कार्यों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाएगा। इससे शोध कार्यों को प्रभावित करने की कोशिश की गई है। केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय ने इस आशय के प्रस्ताव को लागू करने में अतिरिक्त तेजी दिखाई है। यह प्रस्ताव न सिर्फ अलोकतांत्रिक है बल्कि यह बौद्धिकता को बढ़ावा देने वाला भी नहीं है।
 
इस प्रस्ताव में जो शर्त रखे गए हैं, उसके मुताबिक शोध करने वालों को राष्ट्र की एक खास अवधारणा के हिसाब से काम करना होगा। इसके तहत राष्ट्र और सरकार को एक तरह से देखा जा रहा है। ऐसा करने में समाज की असमानता, गैरबराबरी और अन्याय पर बातचीत की कोई जगह नहीं बचती। सरकार से किसी भी असहमति को राष्ट्रविरोधी माना जाता है। इतिहास और सामाजिक हकीकतों से संबंधित पाठों को एनसीईआरटी की पुस्तकों से हटाया जा रहा है। ऐसे में अगर शोध को भी सीमित कर दिया गया तो बहुसंख्यक सोच का मुकाबला कर पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि राष्ट्र को लेकर अलग-अलग अवधारणाएं सामने आएंगी।
 
मौजूदा विश्वविद्यालयी व्यवस्था में उन शोधों को रोकने की पर्याप्त व्यवस्था है जो मानकों के अनुकूल नहीं हैं। ऐसे में नए शर्तों के जरिए विश्वविद्यालयों को ‘अप्रासंगिक क्षेत्रों’ के शोध को रोकने का अवसर मिल जाएगा। ये उन शोध प्रस्तावों को नहीं स्वीकृत करेंगे जो ‘सुरक्षित’ नहीं हों। जैसे विमुद्रीकरण के ‘लाभों’ का अध्ययन या फिर स्वच्छ भारत अभियान का सामाजिक-पर्यावरणीय मूल्य का आकलन आदि। शोध कार्यों में प्रासंगिकता से अधिक महत्व इस बात का होता है कि शोध करने वाले समूहों और अकादमिक जगत के लिए किसी विषय का क्या महत्व है। आदर्श स्थिति तो यह है कि शोध का विचार उन प्रश्नों से उठता है जिससे एक शोधार्थी गुजरता है। इसमें जिज्ञासा में सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे विषयों पर एक शोधार्थी अपनी सृजनात्मकता, आलोचनात्मक क्षमता और मूल्यांकन क्षमता का इस्तेमाल करता है। इसलिए शोध करने वालों को ऐसा माहौल चाहिए जहां वे कितने भी सवाल मुक्त होकर पूछ सकें।
 
इस प्रस्ताव में पहले से निर्धारित विषयों की एक सूची दी गई है। इससे शोध का मकसद पूरा नहीं होता। क्योंकि शोध में तो नए-नए सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश होती है। ऐसे में सरकार, काॅरपोरेट या यहां तक की अकादमिक जगत से भी शोध के विषय थोपने का काम होगा तो इससे शोध का मूल मकसद पूरा नहीं होगा। रूटीन के और सुरक्षित विषयों पर शोध करने का आखिर क्या लाभ होगा? शोध करने वाले विश्वविद्यालयों का काम सिर्फ यह नहीं होता कि वे अभी की चुनौतियों का अध्ययन करें बल्कि उनका काम यह भी होता है कि वर्तमान की सीमाओं से परे जाकर भी शोध करें।
 
केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा जारी परिपत्र से यह संकेत मिलता है कि सरकार ने जिन विषयों का चयन किया है, उन पर शोध के लिए ही पैसे दिए जाएंगे। इसका मतलब यह हुआ कि फंडिंग से या तो विचारों को प्रभावित किया जाएगा या फिर इसमें आलोचनात्मक सोच के लिए कोई जगह नहीं होगी। पहले भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 60 विश्वविद्यालयों को स्वायत्त घोषित करके अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों से बचने का काम किया है। उन्हें एक तरह से कहा जा रहा है कि अपने लिए संसाधनों की व्यवस्था खुद करें। इस वजह से ये संस्थान वाणिज्यिक पाठ्यक्रम शुरू कर रहे हैं और काॅरपोरेट जगत पर निर्भर होते जा रहे हैं। कई सामाजिक विज्ञान केंद्रों को दिए जा रहे पैसों में की गई कटौती भी इसी दिशा में बढ़ा कदम है। यह दुर्भाग्यपूर्ण और देश हित के लिए नुकसानदेह है कि सामाजिक विज्ञान में शोध को इस तरह से नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
 
शोध कार्यों को नियंत्रित करने की कोशिश पढ़ने, लिखने, सोचने, सपना देखने और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए नुकसानदेह है। शोध के कार्यों में ये आजादी शोध करने वालों को उसी तरह से मिलते हैं जिस तरह से लोकतंत्र में जनता को। अगर सत्ता पक्ष यह तय करने लगे कि शोध करने वालों को क्या पढ़ना और सोचना चाहिए तो विश्वविद्यालयों से सिर्फ वही अध्ययन बाहर आ पाएंगे जो सरकार या काॅरपोरेट जगत के अनुकूल हों। एक खास तरह के विचारों का प्रसार विश्वविद्यालयों का काम नहीं है। बल्कि इनका काम यह है कि विचारों और दृष्टि की विविधता को ये बढ़ावा दें और एक बेहतर समाज, अलग राजनीति और राष्ट्रवाद से संबंधित विविध विचारों में शोध को प्रोत्साहित करें। 

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