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भारतीय लोकतंत्र में मुफ्त के भागीदार कौन हैं?

विमर्श की राजनीति में शामिल होने से एनडीए का इनकार करना लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना है
 

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हाशिये पर रह रहे समूहों के लोग अगर सम्मानजनक जीवन जीने के लिए विरोध-प्रदर्शन करते हैं तो इससे हमारे लोकतांत्रिक मूल्य ही मजबूत होते हैं। ये प्रदर्शन बिल्कुल लोकतांत्रिक हैं। इनका मकसद गरीबी, बेरोजगारी, ग्रामीण संकट, भय और अवसाद से मुक्ति है। इस तरह के प्रदर्शनों के जरिए विमर्श को आगे बढ़ाया जाता है। आम लोगों से जुड़े विमर्श के मुद्दे भी उनकी जरूरतों से जुड़े होते हैं। यह जरूरत रोजगार पाने की भी हो सकती है। वाल्मिकी समाज के बहुत सारे लोगों को जीवन यापन के लिए मैन होल में उतरकर सफाई का काम करना पड़ता है। ये यह काम करने के लिए असहाय हैं। इन्हें एक तो कोई ढंग का काम नहीं मिलता और दूसरी तरफ इन्हें यह भय सता रहा होता है कि कहीं यह काम भी न हाथ से चला जाए। हालांकि, मजबूरी में वे पलायन करके दूसरी जगह रोजगार खोजने जाते हैं।
 
सत्ता में चाहे कोई भी पार्टी रहे, उसे यह कोशिश करनी चाहिए कि लोगों की परेशानियों, उनके तनाव और उनके अवसाद को वह दूर करे। नागरिकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाली कोई भी सरकार विमर्श ने भाग नहीं सकती। लोकतांत्रिक तौर पर बनी सरकार को इन विमर्शों की तार्किकता को देखना चाहिए। सरकार की ‘कामयाबियों’ का और सशस्त्र बलों के पराक्रम का एकतरफा बखान करने से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाती। इसमें सरकार की नाकामियां भी छिप जाती हैं। हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि लोकतांत्रिक मूल्यों को धता बताते हुए पिछले पांच साल में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार कितनी बार विमर्श से भागी है? ऐसे में क्या यह सरकार लोकतंत्र में मुफ्त की भागीदार नहीं है?
 
विमर्श में मतदाताओं के साथ लोकतंत्र में दोतरफा संवाद होता है। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा रेडियो पर किए जा रहे ‘मन की बात’ से यह लक्ष्य हासिल नहीं होता। इसमें दोतरफा संवाद नहीं है बल्कि इसमें यह सोच है कि प्रधानमंत्री के पास यह विशेष शक्ति है कि वे ‘करोड़ों’ लोगों की मन की बात जान पाएं। जो प्रेस उनसे कड़े सवाल पूछ सकता है, उससे संवाद बंद हो गया। इससे यह लग सकता है कि प्रधानमंत्री लोगों से संवाद कर रहे हैं लेकिन यह संवाद एकतरफा है। संवाद की यही शैली प्रधानमंत्री के ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान में दिख रही है।
 
विमर्शात्मक लोकतंत्र में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की यह जिम्मेदारी होती है कि वे विपक्ष के नेताओं को विमर्श के लिए आमंत्रित करें। लेकिन पिछले पांच साल में इस सरकार और इसके समर्थकों ने विमर्श की संभावनाओं को कुचलने का काम किया है। सोशल मीडिया पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करके विरोधियों पर हमले किए गए हैं। इसके बाद सत्ताधारी पार्टी के लोग यह भी कहते हैं कि ‘मुझे समझा नहीं गया’ या ‘मुझे गलत उदघृत किया गया।’ लेकिन बार-बार इसी गलती को दोहराया जाना यह बताता है कि नैतिक क्षमताएं किस निम्न स्तर पर चली गई हैं। विमर्श को लेकर सरकार का भय इस बात से भी दिखता है कि वह जरूरी जानकारियों को सार्वजनिक नहीं होने देना चाहती।
 
ऐसे में सवाल यह उठता है कि वे नैतिक तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल क्यों करते हैं? इसका उत्तर यह है कि उन्हें विमर्श से डर लगता है। वे विमर्श की राजनीति की जगह संकेतों की राजनीति करना चाहते हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर संकेत की राजनीति मौजूदा सरकार ने गढ़ने की कोशिश की हे। कोई भी राष्ट्र तब ‘ताकतवर’ होता है जब उसके नागरिक ताकतवर हों। यह इस बात पर निर्भर करता है कि देश के लोगों की स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आवास के मोर्चे पर क्या स्थिति है। सही तर्क नहीं होने के आधार पर अपवाद की बात नहीं की जा सकती। हालांकि, ऐसी पार्टी जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों को समृद्ध करने का काम नहीं किया है, वह चुनावी लोकतंत्र को सत्ता का दूसरा कार्यकाल मांगने के लिए इस्तेमाल कर रही है।

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