ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

जीवन और मौत के बीच पुल

मुंबई में पुलों का गिरना यह दिखाता है कि शहरी नियोजन में कितनी खामियां हैं
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

पुल का काम लोगों को जोड़ने का होता है। चाहे वह पुल नदी पर हो या सड़क मार्ग पर, इसका काम आवाजाही की बाधाओं को दूर करके आपस में लोगों को जोड़ने का होता है। लेकिन अब यह परिभाषा अप्रासंगिक लगने लगी है। 15 मार्च, 2019 को मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के सामने फुट ओवरब्रिज गिरने से छह लोगों की मौत हुई और 32 लोग घायल हुए। मीडिया में आने वाली खबरों में ‘पुल’ शब्द अक्सर ‘दुर्घटना’ और ‘मौत’ जैसी शब्दों से जुड़कर आ रहा है। शहरी पुलों और फ्लाओवरों की ये स्थिति बताती है कि हमारे शहरी नियोजन में कितनी खामियां हैं।
 
मुंबई का यह पुल इसलिए बनाया गया था ताकि सड़क पार करने में होने वाली दुर्घटनाओं से लोगों को बचाया जा सके। लेकिन सुरक्षा के इसी उपाय ने लोगों की जान ले ली। कुछ महीने पहले बृहन्नमुंबई म्युनिसिपल काॅरपोरेशन ने इस पुल के ढांचागत आॅडिट का काम किसी निजी कंपनी को दिया था। इसने पुल को क्लीन चीट दे दिया था। अब इस कंपनी के इंजीनियर निदेशक को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस इंजीनियर की यह जिम्मेदारी थी कि वह बीच-बीच में पुल की सुरक्षा आॅडिट करे। इसमें अजीब यह है कि पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि क्या बीएमसी या रेलवे का कोई कर्मचारी भी इसमें संलिप्त था। यह कल्पना कर पाना मुश्किल है कि लोगों की जान को सिर्फ एक इंजीनियर की आॅडिट के भरोसे छोड़ दिया गया था। अगर जिम्मेदारी तय करने वाला कोई मजबूत तंत्र होता तो क्या कोई लापरवाही से रिपोर्ट फाइल करने की हिम्मत कर पाता?
 
यहां भारत के शहरी नियोजन से संबंधित एक और बड़ी खामी का पता चलता है। क्या यह वाकई आम लोगों की जरूरत पर आधारित था या फिर इसमें राजनीतिक सक्रियता सिर्फ ठेकेदारों के लाभ के लिए दिखी थी? लोगों की जरूरतों का ध्यान रखे बगैर बड़ी अवसंरचना परियोजनाएं विकसित की जाती हैं। मुंबई का स्काईवाॅक और मोनोरेल इसके उदाहरण हैं। मीडिया ने कई बार यह पर्दाफाश किया कि कैसे ‘ब्लैकलिस्ट’ किए गए ठेकेदारों को इन परियोजनाओं में शामिल किया गया। क्या यह शर्मनाक है कि बड़ी संख्या में देश के आर्किटेक्ट और इंजीनियर नेताओं के हिसाब से काम करते हैं जिन्हें खुद नागरिकों के हितों से अक्सर कोई मतलब नहीं रहता? ऐसे लोगों की पेशेवर क्षमता का इस्तेमाल लोगों की सेवा में होना चाहिए न कि नेताओं के निहित स्वार्थों को पोषित करने में। शहरी नियोजन की नीतियों में सबसे कम की बोली लगाने वाले को तरजीह दी जाती है न कि सबसे अच्छा काम करने वाले को। अधिकांश सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं में यही दिखता है।
 
शहरी नियोजन के विषय पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता वाहन केंद्रित, सार्वजनिक परिवहन विरोधी और ठेकेदार परस्त नीतियों का अक्सर विरोध करते हैं। जिस तरह से भारत का शहरीकरण अस्त-व्यस्त ढंग से हुआ है, उसी तरह से शहरी अवसंरचना का निर्माण भी हुआ है। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार और जिम्मेदारियों की कमी का दबदबा रहता है। यही वजह है कि मुंबई में विशेषज्ञों की आपत्ति के बावजूद मेट्रो रेल परियोजना और तटीय सड़क मार्ग परियोजना पर काम चल रहा है।
 
3 जुलाई, 2018 को मुंबई के अंधेरी रेलवे स्टेशन के पास रेल लाइन पर एक पुल गिर जाने से दो लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू किया गया। बाद में पता चला कि 2014 से 2017 तक रेलवे ने इस पुल का जो निरीक्षण किया है, उससे संबंधित दस्तावेज ही नहीं हैं। 2017 में एलिफिंसटन रेल पुल पर मची भगदड़ में 23 लोगों की जान गई थी। कई लोग घायल हुए थे। उस भयावह भगदड़ से यह पता चलता है कि बढ़ती आबादी को देखते हुए एजेंसियां जमीन का ठीक से इस्तेमाल करने में नाकाम रही हैं।
 
हाल में गिरे पुल से संबंधित दो और महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली बात तो यह कि शिव सेना ने ऐसी दुर्घटनाओं के लिए बढ़ती आबादी को जिम्मेदार ठहराया। यह जिम्मेदारी से बचने का बेतुका तर्क है। अपनी रोजगार देने की क्षमता की वजह से मुंबई ने सदियों से प्रवासियों को आकृष्ट किया है और आगे भी यह जारी रहेगा। यहां के विकास की नई योजना में खुद 80 लाख नए रोजगारों के सृजन की बात कही गई है। ऐसे में शहरी नियोजन में इस बढ़ने वाली आबादी का ध्यान रखना चाहिए। दूसरी बात यह है कि पिछले दो साल में ऐसी तीसरी दुर्घटना के बावजूद जनता के स्तर पर उतना गुस्सा नहीं दिखता जितना होना चाहिए। इसका एक मतलब यह हो सकता है कि लोगों ने यह मान लिया है इस तरह की दुर्घटनाएं और लोगों की मौतें विकास की कीमत हैं। सरकार ने भी लोगों के विरोध-प्रदर्शन को दरकिनार करते हुए विवादास्पद बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लगातार आगे बढ़ाने का काम किया है।
 
वक्त आ गया है कि अवसंरचना परियोजनाओं को जन सेवा के तौर पर देखा जाए न कि ठेकेदारों और अन्य पेशेवरों को लाभ देने के जरिया के तौर पर इसे देखा जाए। इसके लिए यह जरूरी है कि नागरिक लगातार सवाल पूछें और इनका जवाब मांगें।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top