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निर्णय में घातक गलतियां

अपने ही निर्णय से उच्चतम न्यायालय के पीछे हटने के बाद मौत की सजा पर स्थगन की जरूरत है
 

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निचली अदालत द्वारा मौत की सजा दिए जाने पर रोक लगाना उच्चतम न्यायालय के लिए नया नहीं है। यह भी हैरान नहीं करता कि अगर किसी को निचली अदालत ने मौत की सजा दे दी हो और उसे उच्चतम न्यायालय पूरी तरह बरी कर दे। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि उच्चतम न्यायालय ने खुद ही जिसे मौत की सजा दी थी, उससे वह खुद ही पीछे हट गया। यह सजा अंकुश मारुथि शिंदे मामले में सुनाई गई थी।
 
यह मामला दिल दहलाने वाला रहा है। एक गरीब परिवार के यहां डकैती हुए, उनके साथ दुव्र्यवहार हुआ और अंत में उनकी हत्या कर दी गई। पुलिस ने संदिग्धों की पहचान करने की जगह छह निर्दोष लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। सिर्फ इसलिए कि वे एक आपराधिक जनजाति से संबंध रखते थे। अपराध की घटना से उनके संबंध का कोई सबूत नहीं मिला है। मामले के चश्मदीदों ने बार-बार अपने बयान बदले हैं। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने उन्हें कसूरवार माना।
 
ये लोग जेल में बहुत बुरी जिंदगी जी रहे हैं। पिछले एक दशक से ये जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं। जब अपराध हुआ था तो आरोपितों में से एक नाबालिग था लेकिन किसी अदालत ने उसके प्रति भी रहम नहीं दिखाई। जब बाॅम्बे उच्च न्यायालय ने इनमें से तीन की मौत की सजा को रूपांतरित कर दिया तो उच्चतम न्यायालय ने उनका पक्ष सुने बगैर रूपांतरित फैसले को पलटकर उन्हें मौत की सजा सुना दी। इसके बाद उनकी पुनर्विचार याचिका को भी खुली अदालत में सुनवाई के बिना ही उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया।
 
इसके बाद उच्चतम न्यायालय की दूसरी पीठ के समक्ष उपचारात्मक याचिका दायर की गई। तब जाकर ‘गलती’ पकड़ी गई और न्याय के पहिये का घूमना शुरू हुआ। इस मामले से उच्चतम न्यायालय के उस नियम का महत्व पता चलता है जिसमें कहा गया था कि पुनर्विचार याचिका की सुनवाई खुली अदालत में होनी चाहिए ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। अंत में अदालत ने सभी आरोपितों को बरी कर दिया। महाराष्ट्र सरकार को उन्हें मुआवजा देने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की। लेकिन अदालत ने अपनी गलती नहीं स्वीकार की।
 
उच्चतम न्यायालय अक्सर किसी मामले को ‘दुर्लभतम’ बताकर मौत की सजा को सही ठहराता है। कई बार इसमें कानून की भी अनदेखी होती है। निर्भया मामले में मौत की सजा को सही ठहराने वाले फैसले में बातें बहुत हैं लेकिन कानूनी आयाम उतना दुरुस्त नहीं दिखता। जिस पीठ ने जिस दिन अंकुश शिंदे मामले में मौत की सजा को पलटा उसी दिन उसने दूसरे मामले में मौत की सजा सुनाई। खुशविंदर सिंह बनाम पंजाब सरकार के मामले में बहुत अच्छे से यह नहीं बताया गया कि आखिर इस मामले को मौत की सजा के लिए उपयुक्त क्यों समझा गया।
 
हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने हाल के दिनों में करीब-करीब सभी मौत की सजा को रूपांतरित किया। 2018 में 12 मामलों में से 11 में ऐसा किया गया। जबकि निचली अदालतें मौत की सजा देने के मामले में बेहद उत्साहित दिखती हैं। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 2000 के बाद 2018 में सबसे अधिक मौत की सजा ट्रायल कोर्ट ने दी। अंकुश शिंदे में जांच से लेकर ट्रायल तक में जितनी गलतियां दिखती हैं, उनसे पता चलता है कि इनमें से अधिकांश मामलों में गलत ट्रायल की वजह से मौत की सजा सुनाई गई होगी।
 
लोगों की तरफ से मौत की सजा की मांग बढ़ती जा रही है। हर पक्ष के नेता इसे स्वीकार करने के लिए तैयार दिखते हैं। इससे हमारी न्याय व्यवस्था और कमजोर होती जा रही है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि अपराधियों को सजा मिलने के बजाए नए पीड़ित तैयार हो रहे हैं। निचली अदालतें आम लोगों की भावनाओं के साथ बह रही हैं। अपीलीय अदालतें भी अन्याय को दूर करने के बजाए इसे और आगे ही बढ़ा रही हैं। शिंदे मामले से तो यही पता चलता है। अगर उन्हें रिहा भी कर दिया जाए या उनकी सजा रूपांतरित कर दी जाए तो भी हमारी न्याय व्यवस्था उनके साथ जो अन्याय कर चुकी होती है, उसका समाधान नहीं होता।
 
आपराधिक न्याय व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि मौत की सजा संस्थागत हत्या की तरह है। जिसके शिकार दमित और पिछड़े वर्ग के लोग हैं। राजनीतिक नेतृत्व की सुधार के प्रति अनिच्छा को देखते हुए सिर्फ उच्चतम न्यायालय से ही यह उम्मीद बचती है कि वह स्थिति को समझकर मौत की सजा पर स्थगन का निर्णय लेगी।

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