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लोकतंत्र विरोधी युद्ध का माहौल

सत्ताधारी पार्टी और सरकार ने राजव्यवस्था को युद्ध मशीन में तब्दील कर दिया है

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद वायु सेना द्वारा सीमा पार करके की गई कार्रवाई के बाद सरकार का बर्ताव गैरजिम्मेदाराना और लोकतांत्रिक तकाजों के खिलाफ रहा है. जब ऐसा लग रहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष की काफी ज्यादा संभावना है तो उस वक्त प्रधानमंत्री या सरकार के स्तर पर यह कोशिश नहीं की गई कि देश की जनता को भरोसा में लिया जाए. जब भारतीय वायु सेना का एक पायलट पाकिस्तान की हिरासत में था तो उस वक्त भी प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्री अपने दलगत कामों में लगे रहे. जनता के साथ पारदर्शिता करने के बजाए सरकार उन खबरिया चैनलों पर ही सूचनाओं के प्रसार के लिए आश्रित रही जिन्होंने अपने ‘सूत्रों’ के हवाले से कुछ भी दिखाया और बताया. संघर्ष की स्थिति में जनता के साथ पारदर्शिता रखना अनिवार्य होता है. ताकि लोगों को सही स्थिति का पता चल सके. लेकिन यह सरकार अपने चुनावी फायदे के लिए भ्रम की स्थिति बनाए रखना चाहती है. ऐसा करके सरकार लोगों के बीच अपनी मजबूत छवि बनाने की कोशिश कर रही है. तनाव की उस स्थिति में रक्षा मंत्री का एकमात्र दखल तब दिखा जब उन्हें भारतीय पायलट के छोड़े जाने के बाद एकजुटता का आह्वान करते हुए ट्विट किया.
 
एक तरफ जहां सरकार खुद संकट की घड़ी में देश को राजनीतिक नेतृत्व देने से बचती रही वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी पार्टी ने वायु सेना की कार्रवाई का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिशें कीं. सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने इस कार्रवाई को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया. कुछ उसी तरह से जिस तरह से 2016 में हुए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद किया गया था. ये कहते हैं कि यह पहली ऐसी सरकार है जिसने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से ‘बदला’ लिया है. राष्ट्रीय सुरक्षा की इकलौती पैरोकार के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश में सत्ताधारी दल के नेताओं ने यह दावा किया कि वायु सेना की कार्रवाई में सैंकड़ों आतंकवादी मारे गए. जबकि वायु सेना ने कहा कि उसके पास कोई ऐसा आंकड़ा नहीं है. जाहिर है कि ऐसे में सैंकड़ांे आतंकवादियों के मारे जाने की बात पर सवाल उठेंगे ही. सत्ताधारी पार्टी इस तरह के दावे करके एक ऐसा राजनीतिक विमर्श खड़ा करना चाहती है जिसमें राष्ट्रीय गर्व और विजय का भाव लोगों के बीच पैदा हो और समाज के एक हिस्से की सैन्य मानसिकता का उसे फायदा मिल सके. इस प्रक्रिया में यह चर्चा नहीं होती कि ऐसी कार्रवाई से किन रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल किया जा सका. ऐसे में युद्ध घरेलू राजनीति में एक औजार बन जाता है. इस सरकार ने जो इस तरह का विमर्श खड़ा किया है उसमें तार्किक विमर्श की जगह नहीं बचती. इसमें राष्ट्रीय हितों पर चुनावी फायदे के लिए पार्टी हित भारी पड़ने लगते हैं.
 
इसलिए सरकार संभावित संघर्ष में पूरे देश में एक राय बनाने की कोशिश करने की बजाए प्रतिकूल दृष्टिकोण अपनाते हुए दिखती है. जब विपक्ष की ओर से यह पूछा जाता है कि कार्रवाई में कितने लोग मारे गए और आतंकवादी ढांचे को क्या नुकसान पहुंचा तो सरकार ने सेना को रक्षा कवच की तरह इस्तेमाल किया. किसी लोकतांत्रिक मंच पर इन सवालों का जवाब देने के बजाए सरकार ने हर मंच से विपक्ष पर यह कहते हुए हमला किया कि वे सेना पर संदेह कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि लोकतंत्र में सैन्य बल भी सवालों के दायरे से परे नहीं हैं. इसलिए सेना पर संदेह करने की बात उठाना ठीक नहीं है. लेकिन जब सत्ताधारी पार्टी चुनावों को भी एक युद्ध की तरह देखती हो तो फिर ऐसे विमर्श के दुष्परिणाम उसे चिंतित नहीं करते होंगे.
 
राजव्यवस्था को युद्ध के मशीन के तौर पर देखने वाली राजनीतिक दृष्टि सरकार और सत्ताधारी पार्टी में गहरा पैठ जमाए हुए है. यही वजह है कि विमुद्रीकरण को सरकार ने काला धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताया और इस पर सवाल उठाने वाले को गद्दार कहा गया. हालांकि, सरकार ने युद्ध का जो माहौल बना रखा है, उसमें निशाने पर विपक्ष है. इससे यह भी पता चलता है कि सत्ताधारी पार्टी कैसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की परवाह किए बगैर सिर्फ सत्ता में काबिज रहने के लिए प्रयासरत है. वायु सेना की कार्रवाई का राजनीति लाभ लेने और सवाल पूछने वालों को दुश्मन करार देने की मानसिकता भाजपा में संघ परिवार से आई है. इसका मकसद ही अंदर के तथाकथित दुश्मनों से निपटने का है. लोकतंत्र में जनता को हमेशा युद्ध के लिए गोलबंद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि विमर्श में लगाना चाहिए. मौजूदा सरकार सार्थक विमर्श शुरू कर पाने में सक्षम नहीं दिखती और इस वजह से राजनीतिक विमर्श का सैन्यीकरण हो रहा है.

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